ब्रजभाषा विशेष - चलौ चलैं, यादिन मेंईं घूमि आबें अपने ब्रज बारे गाम की गलीन में
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ब्रजभाषा विशेष -  चलौ चलैं, यादिन मेंईं घूमि आबें अपने ब्रज बारे गाम की गलीन में
उधो मोहि ब्रज बिसरत नाहीं- प्रतीकात्मक फोटो न्यूज 18

ब्रज के गामन में अब नाय रई पैलैं सी अल्हड़ रवानी, खतम सौ है गौयै पशुधन, अब नाय बहि रई ऐं घर-घर दूध-दही की नदियां, खेतन में नाय फूल्त हर फसल के फूल, ब्रज की सुगंध बचानी ऐ, तौ नए सिरे तैं तै कन्नी परैगी ग्राम देवता की कल्पना! ब्रज कूं बचानौ ऐ, तौ बल्दनी परैगी ब्रजवासिन की मानसिकता!

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  • Last Updated: August 31, 2020, 4:19 PM IST
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कोरोना चल्लौए.. दुनिययूं चल्लई ऐ. परि अबई भौत सारे लोग मारै डरि कैं घरन में ईं बंदएं. जब तक भौत जरूरी न होय, हमऊं घत्ते नाय निकर रए. सो सोचिबे कौ भौत बखत मिल रौ ऐ. कबऊ-कबऊ जिंदगी में पीछै लौटि के जानौ ऊ चइए.. जब कोरोना नै भौत कछू ठैराय सौ दयो ऐ, तौ बीते दिनन की चंचलता की यादि मन में घुमड़ति रहति ऐ. बालपन ब्रज में बीतौ. पिताजी की सरकारी नौकरी लगी, तौ शहर जानौ भयो. तबऊ भौत साल तक गर्मियन की छुट्टियन में गांम आनौ-जानौ लगौ रहौ. कुनबा-खानदान में कोई शादी-ब्याहु होतौ, कोई गमी होती, तबऊ सपरिवार गाम आनौ होतुइयो.

पढ़ाई-लिखाई पूरी करिकै मेरीउ नौकरी शहर में लग गई, ब्याहु है गयौ, बालक-बच्चे है गये, तौ फिर ब्रज की मिठास जीवन में दूर-दूर ते ई चढ़ती रई. घर-परिवार के काऊ काम ते कबऊ-कबार गाम जानौ भयो भी, तौ बचपन जैसौ आनंद न महसूस कर पायौ. बचपन के सखान मेंऊ बु गरमी नाय दिखाई देति. कछू तौ दिहाड़ी कमाइबे शहर चले जात एं, सो मेल-मुलाकाति होति ई नाय, कछू नसे में डूबबौ सीखि गए ऐं. खेत-क्यार करिबौ ज्यादातरन नै छोड़ि दयो ऐ. खेत आधबटाई पै दै कैं खाय रये ऐं, पी रये ऐं, बर्बादी कर रये ऐं. अब सोचतूं कि जा ब्रज में दूध-मलाई, लौनी-मठा की नदियां बहतीं, वा ब्रज में जि का है रयो ऐ? ब्रज बदलि गयो ऐ, तौ चौं? कोरोना के बखत में लड़कपन की यादें सताय रई ऐं, तौ कछु ठोस कारणऊ समझ में आय रये ऐं कि ब्रज चौं बदलि गयौ ऐ. जब आप इकेले हौ और करिबै कौ कछु ठोस कामऊ न हो... बस सोचिबौ और सोचिबौई काम हो, तौ भौत से विचार सामने आइकैं नाचिबे लगत ऐं... ठुमकिबे लगत ऐं. जा के साथई सूरदास बाबा की लाइनेंऊं मन में कुलबुलाइबे लगति ऐं-
मेरौ मन अनत कहां सुख पावें,
जैसे उड़ि जहाज को पच्छी पुनि जहाज पै आवे....

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गाम का अधचला मठा और बरोसी में पकौ गाढ़ौ लाल दूध
मन में बचपन के गाम की यादि भलेई आय रई हो, परि अब बु गाम कहां बचे ऐं. अब तौ उन गामन में बस कल्पना करिकै ईं जाइ सकत ऐं. आजकल के बच्चा तौ पुरानी छटा देखियू नाय सकता. ब्रज में बीते बचपन के 10-12 बरस और बाके बाद के चार दशकन की जिंदगी मेरे काजै द्वै युगन की भांति ऐ. एक ऐसौ अबोध युग, जामैं मस्ती की अनगिन कलगियां लहलहाती भई आसपास महसूस होति रहतिईं... जब चाहौ तब नन्हीं उंगरियन की कोमल पोरन ते उन्हें छूकै सहलाइ लेउ और खुसी ते ... बाके बाद के 40 ते जादा साल पतौई न चलौ कि अंबर और धरती में फरक का होतु ऐ.... अपने गाम या ननसार में चाची या माईं के मां अधचला मठा और बरोसी में पकौ गाढ़ौ लाल दूध पीबे में जो आनंद आबतुओ, वैसौ न मुंबई में छप्पन भोग खाइबे में आयौ, न दिल्ली में... न और कहूं.... मट्टी के चूल्हे में गुरचनी के चून की पानी के हाथ की रोटी की सुगंध आजकल खूब याद आइ रई ऐ. परि अब वे गाम नाय रहे.
असलि में ब्रज भौत बड़ौ इलाकौ ऐ. जिला मथुरा, आगरा, अलीगढ़ औरु उनते सटे दूसरे कई जिला ब्रज कहावत ऐं. ब्रज में कहावत मसहूर ऐ-
कोस-कोस पै बदलै पानी,
कोस-कोस पै बानी....

पानी के स्वाद के संग कोस-कोस पै बानी या भाषा भलेई बदल जाइ, मन में बसी ब्रज की अनूठी सुगंध नाय बदलै. अब ब्रज पहले जैसौ नाय रहौ. ब्रज भाषा पैऊ सहर की भाषा कौ रंग चढ़िबे लगौ ऐ. गामन के बाहिर पब्लिक स्कूल खुलि गये ऐं. आगरा के जौरें हमारौ गाम अलीगढ़ रोड पै पत्तु ऐ. मां सड़क पै सरकारी सराब के ठेका खुलि गए ऐं. गाम की नौजवान पीढ़ी पहिलै अखाड़ेन में जोर आजमावती, परि अब नसा में चून रहिबे लगी ऐ. खेती मसीनन ते हैबे लगी ऐ. एकाध घर के नौहरे पै ई गाय-भैंस बंधी पगुराती दिखाई देती ऐ. पशु बिक गए, उनके चारे की चिंता ऊ खतम है गई ऐ. आसपास के निमंग गामन में खेत में आलू की पैदावार ई है रई ऐ. हमाए बचपन में बाबा सारी फसल लेते रए. हमें पतौ ऐ कि अरहर, मूंग, उड़द, चना, तिल, मटर के पौधा कैसे होतए. आजकलि के बच्चन नें तौ जिऊ नाय पतौ कि चना को पेड़ होतु ऐ या पौधा. हां, आलू के पौधा बे जरूर पहचानिबे लगे ऐं. जा सीजन आलू पिटे, वा साल आंखि नटिर जाति ऐं. बालक पाउडर के दूध कौऊं तरसबे लगत ऐं. अब कौ समझाबै, कैसे समझाबै कि फसल चक्र खराब करिकैं, बस कैशक्रॉप के चक्कर में परिकैं मट्टी को भविष्य खराब मति करौ.

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सारी साग-सब्जी, अन्न खेतन कैं
हमाए बचपन में गाम के घरन में बस नौन, मिच्च, मसाले ई पैंठ ते खरीदि कैं लाइबे पत्ते. बाकी सारी साग-सब्जी, अन्न खेतन में उगायौ जातो. जिनकैं जो चीज कम पत्ती, दूसरे के घर ते लै लेतए. अब तौ गाम जाऔ, तो सारी अटरम-सटरम बाहर ते खरीद कै लै जानी पत्ती ऐ. लगतुई नाय कि हम बई गाम में आए ऐं, जामें हमाऔ बचपन बीतौ ऐ. मीठे पाईं के द्वै कुआं पतौ नाय, कबके सूख गए ऐं. पानीउ अब तौ खरीदनौ पत्तु ऐ. विकास तौ है रौए, सड़कऊं बन्नई ऐं, परि ब्रज में खेती कौ पुरानौं ढर्रो खतम है गौए. अब नए सिरे तें सोचिबे की जरूरत ऐ. पर नई पीढ़ी ऐ खेती और मट्टी के माध्यम ते विकास की परिभाषा को समझाबै! मोदी सरकार कोसिस कत्तौ रई ऐ, परि हमाए गाम में बे कोसिसें कब रंग लांगी, नाय पतौ. अबई तौ कोरोना चल्लौए... पतौ नाय कब तक चलैगौ? चलौ, भलौ होय जा कोरोना कौ... मोय गाम तौ याद दिलायौ. नाय तौ फुरसती नाई कि गाम की पुरानी यादिन की गांठि खोलि पामें. गाम छोड़ि कैं दूरि-दूरि मजदूरी काजैं गए लोग, तो भौत पैलैं घर लौटि गए, हम नाय लौटि सकत, हम तौ बस्सि गाम ऐ सोचि सकत ऐं. कैसी मजबूरी ऐ रे भाई! राधे-राधे!!
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