भारत में पहली बार सदियों पुरानी घोड़ों की नालबंदी की यूपी में शुरू हुई पढ़ाई, यूनिवर्सिटी दे रही प्रमाण-पत्र

यूपी की वेटरिनरी यूनिवर्सिटी में पहली बार घोड़ों की नालबंदी को लेकर ट्रेनिंग दी गई है.

यूपी की वेटरिनरी यूनिवर्सिटी में पहली बार घोड़ों की नालबंदी को लेकर ट्रेनिंग दी गई है.

ब्रुक इंडिया के एनिमल हेल्‍थ एंड वेलफेयर हेड डॉ. निधीश भारद्वाज बताते हैं कि घोड़े के पैरों में ह 10 दिन में नई नाल लगवानी पड़ती है. अगर हूफ के डेड पार्ट की जगह लाइव पार्ट में कील ठोक दी जाए तो घोड़ा लंगड़ा हो जाता है. इतना ही नहीं अगर सही तरीके से नाल न लगाई जाए तो भी घोड़ा लंगड़ा हो जाता है.

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  • Last Updated: March 18, 2021, 9:25 PM IST
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नई दिल्‍ली. भारत में जब भी पालतू, घरेलू या आजीविका कमाने के लिए काम आने वाले जानवरों की बात होती है जो गाय, भैंस, बैल, बकरी या भेड़ को ही गिना जाता है. ऐसा कम ही होता है कि गधे, घोड़े और खच्‍चरों को भी इन जानवरों में शामिल किया जाए. जबकि देश के अधिकांश राज्‍यों के गांवों से लेकर शहरों में इनका इस्‍तेमाल माल ढुलाई से लेकर आजीविका कमाने तक में किया जाता है. बावजूद इसके इन जानवरों के संरक्षण और जरूरतों को भी नजरअंदाज किया जाता है.

हालांकि देश में पहली बार घोड़ों की सबसे बड़ी जरूरत को लेकर अब पढ़ाई शुरू की गई है. उत्‍तर प्रदेश के मथुरा में स्थित पंडित दीनदयाल उपाध्‍याय पशु चिकित्‍सा विज्ञान विश्‍वविद्यालय और ब्रुक इंडिया ने मिलकर घोड़ों के पैरों में की जाने वाली नालबंदी को लेकर ट्रेनिंग प्रोग्राम शुरू किया है. पहली बार है कि परंपरागत रूप से घोड़ों की नालबंदी कर रहे लोगों को अब ट्रेंड, हुनरमंद और मान्‍यता प्राप्‍त बनाया जा रहा है.

मथुरा दुवासू में ब्रुक इंडिया और यहां के प्रोफेसर की मदद से 8 मार्च से 17 मार्च तक ट्रेनिंग दी गई है. जिसमें फैरियर स्‍कूल, यूनिवर्सिटी के एनाटोमी विभाग, सर्जरी विभाग, लाइव स्‍टॉक प्रोडक्‍शन एंड विभाग, वेटरिनरी एक्‍सटेंशन डिपार्टमेंट के प्रोफेसर और फैरियर ट्रेनर शामिल हैं. वहीं इस ट्रेनिंग में यूपी,राजस्‍थान, हरियाणा और उत्‍तराखंड से 10 नालबंदी करने वाले या लोकल स्‍ट्रीट फेरिअर्स बुलाए गए हैं जिन्‍होंने यहां प्रोफेशनल ट्रेनिंग ली है.

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घोड़ा बहुत भारी वजन लेकर पथरीली जमीन पर चलता है. जिससे उसके पैरों की डेड स्किन के अंदर का भाग छिलता जाता है और घाव बन जाता है. थोड़े समय बाद घोड़ा लंगड़ा हो जाता है. इससे बचाव के लिए घोड़ों की नालबंदी की जाती है और पैरों की डेड स्किन में नाल फिट की जाती है. फोटो सौ. (ट्विटर- @PraveenIFShere)

नालबंदी ठीक न हो तो लंगड़ा हो जाता है घोड़ा

न्‍यूज 18 हिंदी से बातचीत में ब्रुक इंडिया के एनिमल हेल्‍थ एंड वेलफेयर प्रमुख डॉ. निधीश भारद्वाज ने कहा कि भारत में जानवरों का इस्‍तेमाल तो भरपूर किया जाता है लेकिन उनकी जरूरतों को तवज्‍जों नहीं दी जाती. इसकी एक वजह यह भी है कि देश में गधे, घोड़े, खच्‍चर आदि रखने का चलन गरीब इलाकों में है जहां लोग इनसे अपनी आजीविका चलाते हैं. यही वजह है कि घोड़े के पैरों में लगने वाली नाल या कहें कि लोहे के जूते को लेकर बहुत जागरुकता नहीं है. जबकि इस पर घोड़े का जीवन टिका है. अगर सही तरीके से घोड़े की नालबंदी नहीं की गई तो वह जीवनभर के लिए लंगड़ा हो सकता है.

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डॉ. निधीश बताते हैं कि ब्रुक इंडिया ने दुवासू के साथ मिलकर पहली बार लोकल स्‍ट्रीट फैरिअर्स को ट्रेंड किया है. ये लोग घोड़े के पैरों के लिए लोहे का या सरिया का जूता बनाते हैं. पहले इसे बैलेंस करते हैं, छंटाई करते हैं. फिर इसे घोड़ों के पैरों में फिट किया जाता है. यह इसलिए किया जाता है कि घोड़ा बहुत भारी वजन लेकर पथरीली जमीन पर चलता है. जिससे उसके पैरों की डेड स्किन के अंदर का भाग छिलता जाता है और घाव बन जाता है. थोड़े समय  बाद घोड़ा लंगड़ा हो जाता है. इससे बचाव के लिए घोड़ों की नालबंदी की जाती है और पैरों की डेड स्किन में नाल फिट की जाती है.

देश में सदियों से है नालबंदी का धंधा लेकिन प्रोफेशनलिज्‍म नहीं है

वे बताते हैं कि नालबंदी करना एक पुश्‍तैनी धंधा रहा है. इसके लिए लोग ट्रेनिंग नहीं लेते. यह पीढ़ी दर पीढ़ी सदियों से चला आ रहा है. इसका प्रभाव यह होता है कि पुराने ढर्रे पर चल रहे इस धंधे की वजह से घोड़ों को नई कठिनाइयों के लिए नहीं तैयार किया जा सकता. इसमें कोई प्रोफेशनलिज्‍म नहीं है. इसकी कहीं कोई ट्रेनिंग नहीं होती, जबकि यह काफी जरूरी काम है. यहां तक कि अब तक इसे किसी ठीक-ठाक काम में भी नहीं गिना जाता. यही वजह है कि वेटरनिरी यूनिवर्सिटी में ट्रेनिंग शुरू की गई है.

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नालबंदी की ट्रेनिंग लेने वाले लोगों को यूनिवर्सिटी की तरफ से सर्टिफिकेट भी दिया जाएगासांकेतिक फोटो


वेटरिनरी यूनिवर्सिटी देगी सर्टिफिकेट

उत्‍तर प्रदेश की पंडित दीन दयाल उपाध्‍याय पशु चिकित्‍सा विज्ञान विश्‍वविद्यालय ( दुवासू) में लाइव स्‍टॉक प्रोडक्‍शन एंड मैनेजमेंट में एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. रजनीश सिरोही ने बताया कि नालबंदी के लिए यूनिवर्सिटी में इससे पहले कोई ट्रेनिंग या कोर्स नहीं हुआ था. विवि वेटरिनरी साइंस में पीएचडी तक कराती है. यहां डिप्‍लोमा कोर्सेज भी होते हैं लेकिन नालबंदी एक प्रेक्टिकल है जो पहली बार ही शुरू किया गया है. यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर नालबंदी के बारे में जानते हैं और वेटरिनरी छात्रों को पढ़ाई के दौरान इसके बारे में पढ़ाते और बताते भी हैं लेकिन फैरियर्स को प्रेक्टिकल करके समझाना या नालबंदी सिखाना जैसा कोर्स अभी तक यहां नहीं था. इसके लिए नालबंदी की ट्रेनिंग लेने वाले लोगों को यूनिवर्सिटी की तरफ से सर्टिफिकेट भी दिया जाएगा.

महीने में तीन बार लगती है घोड़े के पैर में नाल

डॉ. निधीश कहते हैं कि नालबंदी की जरूरत इससे समझी जा सकती है कि एक सक्रिय घोड़े के पैरों में हर 10 दिन में नई नाल लगवानी पड़ती है. अभी तक नालबंदी में लोग 10 से 10 मिनट लगाते हैं जबकि सही समय करीब एक घंटा है ताकि घोड़े को तकलीफ न हो और इसमें कोई लापरवाही न हो. अगर हूफ के डेड पार्ट की जगह लाइव पार्ट में कील ठोक दी जाए तो घोड़ा लंगड़ा हो जाता है. इतना ही नहीं अगर सही तरीके से नाल न लगाई जाए तो भी घोड़ा लंगड़ा हो जाता है.

विवि चलाती है ऐसे कई ट्रेनिंग कोर्सेज

डॉ. सिरोही कहते हैं कि यूनिवर्सिटी कई ऐसे कोर्स चलाती है जो मांग पर चलाए जाते हैं. कई बार यूपी सरकार, पैरामिलिट्री फोर्स अन्‍य कई संस्‍थाएं वेटरिनरी की ट्रेनिंग के लिए आते रहते हैं ऐसे में यूनिवर्सिटी उनकी जरूरतों के हिसाब से ट्रेनिंग मॉड्यूल या कैप्‍सूल डिजाइन करके उन्‍हें ट्रेंड करते हैं.

नालबंदी के मामले में ब्रुक इंडिया की तरफ से प्रस्‍ताव आया था जो विवि को अच्‍छा लगा और एक 10 दिन का ट्रेनिंग मॉड्यूल बनाकर तैयार कर दिया गया. यह कोर्स सात मार्च से शुरू होकर 17 मार्च तक चला है. अब अगर ब्रुक इंडिया और भी इस  तरह की ट्रेनिंग कराना चाहता है तो यूनिवर्सिटी ऐसे मिलकर कोर्स चलाएगी.
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