OPINION: 56 साल बाद राज्यसभा पहुचंने वाली इटावा की दूसरी बहू बनीं गीता शाक्य

बीजेपी की नवनिर्वाचित राज्यसभा सांसद गीता शाक्य (फाइल फोटो)
बीजेपी की नवनिर्वाचित राज्यसभा सांसद गीता शाक्य (फाइल फोटो)

वर्ष 1964 में समाजवादी खेमे से सबसे पहले सरला भदौरिया (Sarla Bhadauriya) ने इटावा से राज्यसभा में दस्तक दी थी. इसके बाद अब गीता शाक्य (Geeta Shakya) को बीजेपी ने राज्यसभा भेजकर यहां की राजनीतिक मिजाज में गर्मी ला दी है. यह गर्मी ऐसे ही नहीं आई है बल्कि इसके पीछे कई वजहें मानी जा रही हैं

  • News18Hindi
  • Last Updated: November 9, 2020, 5:59 PM IST
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इटावा. समाजवादी पार्टी (Samajwadi Party) के गढ़ के रूप में पहचान रखने वाले उत्तर प्रदेश के इटावा (Etawah) से 56 साल बाद गीता शाक्य (Geeta Shakya) ने राज्यसभा में दस्तक देकर एक नई राजनीति की जन्म दिया है. गीता के राज्यसभा सांसद (Rajya Sabha MP) बनने पर बीजेपी के दिग्गज नेता चमत्कार की उम्मीद लगाए हुए हैं. वर्ष 1964 में समाजवादी खेमे से सबसे पहले सरला भदौरिया (Sarla Bhadauriya) ने यहां से राज्यसभा में दस्तक दी थी. इसके बाद वर्ष 2020 में गीता शाक्य को बीजेपी ने राज्यसभा भेजकर यहां की राजनीतिक मिजाज में गर्मी ला दी है. यह गर्मी ऐसे ही नहीं आई है बल्कि इसके पीछे कई वजहें मानी जा रही हैं.

यमुना नदी के किनारे बसे इटावा की पहचान वैसे तो डाकुओं के प्रभाव वाले जनपद के तौर पर होती है लेकिन इसके बावजूद यहां समाजवाद की जड़ें काफी मजबूत रही हैं. इसी समाजवाद के बल पर जहां पुरूषों ने राजनीति ने अपने पैर पसारे तो महिलाए भी इसमें पीछे नहीं रहीं. पहली दफा यहां से राज्यसभा का सफर तय कर सरला भदौरिया ने हर किसी को अचरज में डाल दिया था.

वर्ष 1964 में सरला भदौरिया बनीं थी राज्यसभा सदस्य 



यह बात वर्ष 1964 की है जब समाजवादी पुरोधा डॉ. राममनोहर लोहिया के आर्शीवाद से सरला भदौरिया राज्यसभा पहुंची थीं. सरला की ही तरह इटावा की दूसरी बहू गीता शाक्य ने भी राज्यसभा की दहलीज तक पहुंचकर सबको अचरज में डाल दिया है. गीता चंद रोज पहले बीजेपी से राज्यसभा सदस्य के रूप में निर्वाचित हुई हैं.
सरला और गीता दोनों के राज्यसभा पहुंचने के किस्से बड़े दिलचस्प हैं. जहां सरला सर्वण वर्ग से ताल्लुक रखती थीं वहीं गीता पिछड़ी जाति से आती हैं. समाजवादियों के गढ़ इटावा से राज्यसभा के लिए निर्वाचित होने के बाद गीता शाक्य चर्चा के केंद्र में हैं. इसके पीछे उनका प्रारंभिक राजनीतिक जीवन का समाजवादी होना माना जा रहा है. वहीं दूसरी ओर सरला मूल रूप से समाजवादी ही रही हैं. गीता के सुर्खियों मे रहने की वजह उनके अंत्योदय वर्ग से जुड़े हुए लोगों को मजबूती प्रदान करने का उनका अटल इरादा है.

पहली समाजवादी महिला राज्यसभा सदस्य थीं सरला भदौरिया

सरला की तरह बीजेपी से राज्यसभा पहुंचने वाली गीता शाक्य भी अपने प्रारंभिक काल मे समाजवादी पार्टी का झंडा उठाया करती थीं. दोनों में केवल यही एक समानता नहीं है बल्कि यह दोनों इटावा की बहू भी हैं.  सरला के राज्यसभा में जाने के वक्त उनका परिवार राजनीति मे स्थापित हो चुका था. लेकिन गीता राजनीति में अभी संधर्ष वाली भूमिका में ही हैं इसलिए उनके राज्यसभा पहुंचने से पार्टी के लोगों के साथ-साथ अन्य दलों के नुमाइंदे भी अचरज महसूस करते हैं. सरला और गीता दोनों के परिवार खेती-किसानी से जुड़े हुए हैं.

पिछड़ी जाति से आती है गीता शाक्य

सरला भदौरिया जहां संपन्न परिवार से आती थीं वहीं गीता शाक्य गरीब परिवार से संबंध रखती हैं. सरला बसेरहर इलाके के लुहिया गांव की वासी थीं जबकि गीता भर्थना इलाके के सिंहुआ गांव की रहने वाली हैं. गीता शाक्य पूर्व में औरैया से बीजेपी की जिला अध्यक्ष रह चुकी हैं. इसके अलावा वो वर्ष 2000 से 2010 तक प्रधान भी रहीं थीं जबकि उनके पति मुकुट सिंह भी प्रधान रह चुके हैं.

गीता शाक्य ने वर्ष 2009 में उपचुनाव में समाजवादी पार्टी की टिकट पर बिधूना विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा था. बिधूना में शाक्य वोटों को प्रभावित करने के लिए एसपी ने उन्हें टिकट दिया था हालांकि बाद में वो एसपी छोड़कर बीजेपी में शामिल हो गई थीं. यहां वो दो साल तक बीजेपी की जिला अध्यक्ष रही थीं. इसके बाद गीता ने वर्ष 2012 में बीजेपी की ही टिकट पर चुनाव लड़ा और नतीजों में तीसरे नंबर पर रहीं.

सरला के पति कंमाडर अर्जुन सिंह भदौरिया आजादी के आंदोलन में चंबल में लालसेना के जन्मदाता माने जाते हैं. वर्ष 1957 में कंमाडर के पहली बार सांसद बनने के बाद इस इलाके मे समाजवाद का परचम लहराना शुरू हो गया था, इसके बाद वो 1962 और 1977 में भी सांसद रहे.

गीता शाक्य के रूप में समाजवाद के गढ़ इटावा से 56 साल फिर कोई महिला नेता राज्यसभा के लिए निर्वाचित हुई है (फाइल फोटो)


सरला भदौरिया के बेटे की बयानगी

सरला के बेटे सुधींद्र भदौरिया बताते हैं कि वर्ष 1964 में उनकी मां सरला भदौरिया को समाजवादी पुरोधा डॉ. राम मनोहर लोहिया ने राज्यसभा चुनाव के लिए मैदान में उतारा था. उनके मुकाबले में जवाहर लाल नेहरू ने जेड.ए.अहमद को उतारा था. सरला के चुनाव संचालन की व्यवस्था दिग्गज समाजवादी राजनारायण ने देखी थी इसी वजह से उनकी मां की जीत संभव हुई. सरला भदौरिया को समाजवादी विचाराधारा की पहली महिला राज्यसभा सदस्य कहा जाता है. उन्होंने राष्ट्रीयता, समाजसेवा का पाठ गांधीजी के वर्धा आश्रम से सीखा. मां और बापू की स्नेह छांव में आज सत्य, निष्काम, सेवा, भावना, सादगी और कर्तव्य परायणता के प्रशिक्षण में आजीवन रचनात्मक संघर्ष के पद पर सक्रिय रखा है.

आजादी के बाद महिलाओं, दलितों और किसानों के अधिकारों को लेकर उन्होंने कच्छ रण गुजरात की रक्षा और भ्रष्टाचार उन्मूलन आंदोलन, बिहार तक नेतृत्व करते हुए 13 बार जेल यात्राएं की. सरला भदौरिया वर्ष 1964 से 1970 तक राज्यसभा सांसद, और बाद में 1977-80 तक उत्तर प्रदेश महिला समाज कल्याण बोर्ड की अध्यक्ष चुनी गईं. भारतीय सांसद के रूप में सरला भदौरिया ने दक्षिण अफ्रीका की महिलाओं की दशा के अध्ययन हेतु विदेश यात्रा भी की थी.

वहीं गीता शाक्य की काबलियत के बारे मे पूर्व केंद्रीय मंत्री और इटावा के सांसद प्रो. रामशंकर कठेरिया कहते हैं कि पिछड़े वर्ग से ताल्लुक रखने वाली गीता संसद के उच्च सदन की सदस्य बन गई हैं. उनके भविष्य में प्रगति करते रहने की पूरी संभावनाए हैं

अपनी जाति के 14 फीसदी वोटों को एकजुट करने का लक्ष्य

बीजेपी की नवनिर्वाचित राज्यसभा सांसद गीता शाक्य कहती हैं कि राज्यसभा सदस्य बनने के बाद अपनी जाति के 14 फीसदी मतों को बीजेपी के पक्ष में लामबंद करना उनकी पहली प्राथमिकता होगी. उन्होंने कहा कि बीजेपी ने राज्यसभा के लिए उनका चयन कर के अंत्योदय वर्ग को आगे बढ़ने का मौका दिया है. अपने राज्यसभा तक पहुंचने का श्रेय वो बीजेपी को देती हैं. उन्होंने कहा कि बीजेपी में जो काम करता है पार्टी उसको सम्मान देने मे कभी भी पीछे नहीं रहती. शाक्य बाहुल्य इलाके से आज तक किसी भी राजनीतिक दल ने इस जाति के किसी भी व्यक्ति को राज्यसभा नहीं भेजा है. बीजेपी ने उनके जरिए शाक्य जाति को यह सम्मान दिया है जो उनके लिए गर्व की बात है.
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