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खूबसूरत लोकेशन से भरपूर डाकुओं की शरणस्थली को 'चंबलवुड' बनाने की आवाज उठी

फिल्म निर्माण के लिहाज से चंबल की घाटी में अथाह खूबसूरत लोकेशेन हैं.
फिल्म निर्माण के लिहाज से चंबल की घाटी में अथाह खूबसूरत लोकेशेन हैं.

चबंल के फिल्मकारों का मानना है कि यह घाटी प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर है. यहां फिल्म निर्माण बहुत अच्छे से किया जा सकता है. इसका एक बड़ा फायदा यह होगा कि यहां के स्थानीय लोगों को रोजगार मिलेगा.

  • News18Hindi
  • Last Updated: December 10, 2020, 5:03 PM IST
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इटावा. कभी कुख्यात डाकुओं के आतंक की वजह उपेक्षा की शिकार बनी चंबल घाटी के विकास के लिए यहां के वासियों ने 'चंबलबुड' के निर्माण की मांग की है. यह मांग उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से की गई है. सीएम योगी दिल्ली से सटे नोएडा में फिल्म सिटी का निर्माण करने की पहल में जुटे हुए हैं. चंबल के लोगों का मानना है कि यहां का नैसर्गिक सौंदर्य फिल्म निर्माण के लिए बहुत बेहतर है. यही वजह है कि सैकड़ो लोकप्रिय फिल्मों का निर्माण भी चंबल में किया जा चुका है. ये फिल्में आज भी मील का पत्थर बनी हुई हैं, जिनका मुकाबला कोई दूसरी फिल्म नहीं कर सकी है.

बताते चलें कि चंबल का जिस तरह से विकास होना चाहिए था, कुख्यात डाकुओं के आतंक के चलते उस ढंग से उसका विकास नहीं हो सका है. लेकिन कई नामचीन फिल्मकार चंबल को शूटिंग के लिए आज से बहुत ही अधिक मुफीद मानते हैं. यह एक बड़ी वजह है कि वे अपनी फिल्मों की शूटिंग के लिए चंबल की वादियों में आते रहे हैं.

डाक्टर कमल कुशवाहा बताते हैं कि उत्तर प्रदेश से मध्य प्रदेश और राजस्थान में फैली चंबल घाटी वास्तव में प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर है. यहां पर फिल्म निर्माण बहुत ही अच्छे से किया जा सकता है. इसका एक बड़ा फायदा यह होगा कि यहां के स्थानीय लोगों को रोजगार मिलेगा और साथ ही साथ अन्य सुविधाएं भी मिलेंगी.



कोरियोग्राफर शैलेंद्र प्रताप सिंह कहते हैं कि थोड़े से सार्थक प्रयास करने भर से चंबल घाटी चंबलबुड के नाम से जानी जा सकती है. नैसर्गिक सुंदरता की पर्याय चंबल घाटी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के फिल्मलैंड के सपने में चार चांद लगाने में मददगार साबित हो सकती है. वैसे चंबल के बीहड़ मायानगरी के निर्माता निर्देशकों के लिए दशकों से आकर्षण का केन्द्र बने रहे हैं. चंबल के दुर्दांत दस्यु सरगनाओं के जीवन पर कई नामी गिरामी फिल्मों की शूटिंग यहां हो चुकी है. यहां की नैसर्गिक सुंदरता कश्मीर की वादियों को कई मायनों में टक्कर देती हैं. फिल्म निर्माण से जुड़ी कई हस्तियों का मानना है कि प्राकृतिक तौर पर बेहद आंनदमयी चंबल घाटी को फिल्मलैंड के रूप मे स्थापित कर फिल्मकारों के लिए एक नया रास्ता खोला जा सकता है.
तेलंगाना के जानेमाने फिल्मकार, गजलकार डॉ. गजल श्रीनिवास का कहना है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से आग्रह है कि अगर फिल्मसिटी चंबल घाटी में बनाई जाती है, तो फिल्मकारों को शूटिंग के लिहाज से बहुत ही अधिक फायदा होगा. क्योंकि यहां के लोकेशन बहुत ही शानदार हैं, जो किसी भी फिल्म के लिए सबसे महत्वपूर्ण है. श्री निवास कहते हैं कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पांच नदियों के संगम स्थल पशनंदा को पर्यटकस्थल बनाने का फैसला भी कर चुके हैं. ऐसे में चंबल को अगर फिल्मलैंड की ओर ले जाया जाता है तो निश्चित है यह कोशिश चंबल के लिहाज से बहुत ही सार्थक होगी.

चंबल मे मैला प्रथा पर फिल्म निर्माण कर चुके मास्साब, बंदूक जैसी सम्मानित और पुरस्कृत फिल्मों के लेखक निर्देशक, तेलुगु फिल्मों के सुप्रसिद्ध अभिनेता आदित्य ओम चंबल घाटी को फिल्म निर्माण के लिए सबसे बेहतर मानते हैं. ओम कहते हैं कि चंबल घाटी मे शूटिंग हर लिहाज से बेहतर है, चाहे वह लोकशन हो या फिर कोई और भी जरूरत. चंबल घाटी की नैसर्गिक सुंदरता विदेश के खूबसूरत पर्यटनस्थलों को भी मात देती है. इसी धरोहर को आज न केवल सुरक्षित रखने की जरूरत है बल्कि उसको लोकप्रिय भी बनाना है.

के. ऑफिस चंबल इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिबल के चैयरमैन मोहनदास का मानना है कि अगर चंबल घाटी को फिल्मलैंड का दर्जा मिलता है, तो चंबल में विकास के नये आयाम का सृजन होगा. रोजगार की नई संभावनाए बनेंगी. फिल्मकार प्रो. मोहनदास ऐसा मानते हैं कि चंबल को फिल्म निर्माण के लिए खड़ा करना विकास के लिए बेहतर हो सकता है. यहां निर्मित होने वाली फिल्मों पर खर्च भी कम आयेगा, साथ ही बेहतर फिल्म लोकेशन भी फिल्मकारों को मिलेंगे.

चंबल फाउंडेशन के संस्थापक शाह आलम ने कहा कि एक दौर ऐसा आया, जब देश में बनने वाली हर चौथी फिल्म की कहानी या लोकेशन चंबल घाटी होती रही है. इसी वजह से चंबल घाटी को फिल्मलैंड कहा जाता है. जमींदारों के अत्याचार, आपसी लड़ाई और जर, जोरू और जमीन के झगड़ों को लेकर 1963 में आई फिल्म मुझे जीने दो के बाद इस विषय पर सत्तर के दशक में बहुत सारी फिल्में, चंबल के बीहड़ और बागियों को लेकर बनीं. जिनमें डाकू मंगल सिंह (1966), मेरा गांव मेरा देश (1971), चंबल की कसम (1972), पुतलीबाई (1972), सुल्ताना डाकू (1972), कच्चे धागे (1973), प्राण जाए पर वचन न जाए (1974), शोले (1975), डकैत (1987), बैंडिड क्वीन (1994), वुंडेड (2007), पान सिंह तोमर (2010), दद्दा मलखान सिंह और सोन चिरैया (2019) और निर्भय सिंह आदि प्रमुख हैं. इन फिल्मों में से कुछ फिल्मों में चंबल की वास्तविक तस्वीर बड़ी विश्वसनीयता के साथ अंकित हुई है.

शाह आलम के मुताबिक, यह तो सिर्फ बानगी है कि प्रकृति की इस अद्भुत घाटी को दुनिया भर के लोग सिर्फ और सिर्फ डकैतों की वजह से जानते हैं. यहां की खूबसूरती और इतिहास के कारण बॉलीवुड भी मुंबई की रंगीनियों से हटकर यहां की वादियों की ओर आकर्षित हुआ और फिल्मों ने दुनिया भर के दर्शकों का मनोरंजन किया. चंबल के डकैतों पर आधारित सौ से अधिक फिल्में बन चुकी हैं. बीहड़ न सिर्फ विकास में बल्कि इतिहास में भी उपेक्षा झेलता आया है. आज बीहड़ की पहचान उसकी बदनामी से ही होती है. पीले फूलों के लिए ख्याति प्राप्त यह वादी उत्तराखंड की पर्वतीय वादियों से कहीं कमतर नहीं है. अंतर सिर्फ इतना है कि वहां पत्थरों के पहाड़ हैं तो यहां मिट्टी के पहाड़ हैं. बीहड़ की ऐसी बलखाती वादियां समूची पृथ्वी पर अन्यत्र कहीं नहीं देखी जा सकती हैं.

तिग्मांशु धूलिया बॉलीवुड के ऐसे फिल्मकार हैं जो किसी परिचय के मोहताज नहीं. जहां बॉलीवुड के ज्यादातर डायरेक्टर विदेशी लोकेशन पंसद करते हैं, वही धूलिया का लगाव अपने देश की कुख्यात चंबल घाटी से है. चंबल घाटी के प्रति उनकी दीवानगी का आलम यह है कि वे चंबल घाटी की तुलना अमरीका के ग्रांड कैनीयन से करते हैं. लेकिन चंबल के बदलते मिजाज से परेशान घूलिया यह कहने से भी नही चूकते कि अगर समय रहते चंबल के लिए कुछ किया नहीं गया तो देश के बेहतरीन पर्यटन केंद्र को हमलोग खो देगे.
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