यूपी पंचायत चुनाव: चंबल घाटी में सिर्फ रह गई है डाकुओं के फरमानों की यादें!

सांकेतिक फोटो.

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पंचायत चुनाव (Panchayat Chunav) की डुगडुगी काफी तेजी से बज रही है. ऐसे मे चंबल मे डाकू फरमानों की चर्चा किये बिना नहीं रहा जा सकता है. मुहर लगाओ,,,,,,,,,,वरना गोली खाओ छाती पर,,,,,,,,, कभी चंबल घाटी मे चुनाव के दौरान ऐसे नारो की गूंज हुआ करती थी.

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इटावा. पंचायत चुनाव की डुगडुगी काफी तेजी से बज रही है. ऐसे मे चंबल मे डाकू फरमानों की चर्चा किये बिना नहीं रहा जा सकता है. मुहर लगाओ,,,,,,,,,, वरना गोली खाओ छाती पर,,,,,,,,, कभी चंबल घाटी मे चुनाव के दौरान ऐसे नारो की गूंज हुआ करती थी, लेकिन आज इस तरह के नारे इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गए हैं. क्योकि खूखांर डाकुओं के खात्मों ने इन फरमानों पर विराम लगा दिया है. चंबल का इतिहास इस बात की गवाही देता है कि कई चुनाव खूंखार डाकुओं के फरमानों के कारण असरदायक रहे है. इसलिए पुलिस प्रशासन की पूरी निगाह हमेशा रहती आई है और चुनाव के दरम्यान खास करके रहती भी है. बेसक आज की तारीख मे चंबल से डाकुओ. का सफाया पूरी तरह से कर दिया गया है, लेकिन पुराने डाकुओं के नाते रिश्तेदार और उनकी करीबियों की गतिविधियों पर निगरानी रखने के लिए संबधित थानों की पुलिस को सचेत किया गया है.

हर चुनाव मे दिखा फरमानों का असर

भले ही फतबे ना हों लेकिन इन फरमानों की चर्चा किए बिना कोई भी घाटी वासी रह नहीं पा रहा है. आज भले ही डाकुओं के फरमान नहीं हैं. फिर भी फरमानों को याद करके घाटी वासियो की रूह आज भी कांप जाती है. चंबल घाटी मे डकैतों का यह फरमान दो दशक तक कमोवेश हर लोकसभा या विधानसभा चुनाव के साथ साथ पंचायत चुनावो में जारी होता रहा है.

फरमानों में दिखा जातीय असर
डाकुओं के फरमान की शुरूआत चंबल घाटी मे जातिय आधार पर पंचायत चुनाव मे 1990 से शुरू हुई. उसके बाद इसका प्रभाव बढ़ करके विधानसभा से होते हुए लोकसभा चुनाव तक आ पहुंचा. 1996 में लखना विधानसभा सीट से चुनाव मे मैदान मे उतरी सपा प्रत्याशी के पक्ष मे डाकू रज्जन गूर्जर आदि डकैतों ने फरमान पहली बार जारी किया, जिसका प्रभावी असर देखने को मिला कि सपा प्रत्याशी की जीत हुई.

राजनैतिक दलों के पक्ष मे हुए फरमान

सपा प्रत्याशी से पराजित हुए भाजपा प्रत्याशी बताते है कि प्रचार के दौरान दर्जनों गांव के ग्रामीणों ने इस बात की पुख्ता शिकायत करके उनको अवगत कराया कि फरमान के चलते सपा के पक्ष मे मतदान करना उनकी मजबूरी बन गई है. फरमान का असर इस कदर हुआ कि रात के समय डर के वजह से प्रचार कर पाना संभव नहीं हो सका. नतीजतन पराजय का मुंह देखना पड़ा. इस बात की शिकायत चुनाव आयोग से भी की गई, लेकिन पुलिस मतदाताओ पर अपनी पकड़ नहीं बना पाई और फरमान हावी रहे.



फक्कड़ ने शुरू किया था फरमान

1998 के लोकसभा मे भाजपा के टिकट पर उतरी प्रत्याशी के पक्ष मे उस समय के कुख्यात डाकू रामआसरे उर्फ फक्कड़ ने चंबल इलाके के कई मतदान केंद्र पर बूथ लूटे थे, जिसके नतीजे मे भाजपा इटावा संसदीय सीट जीतने मे कामयाब हो गई. लेकिन जिन शर्तों पर फक्कड़ ने भाजपा प्रत्याशी की मदद की वो चुनाव जीतने के बाद कामयाब नहीं हुई. बाद मे फक्कड ने अपने गैंग के करीब नौ साथियो के साथ साल 2004 मे मध्यप्रदेश के भिंड मे सर्मपण कर दिया था.

1991 के बाद दिखा फरमानों का असर

1991 में हुए विधानसभा चुनाव में दस्यु रामआसरे फक्कड़ ने जिस राजनीतिक दल के समर्थन में प्रचार किया. इतना ही नहीं चुनावी रंजिश ने बीहड़ी रंजिश को भी जन्म दिया. दस्यु लालाराम और फक्कड़ के बीच टकराव हुआ. ये दोनों बड़े गिरोह जब आपस में टकराए  तो चंबल की वादियों में तमाम नए दस्यु गिरोहों का जन्म हो गया. ये सभी गिरोह अपने-अपने क्षेत्र में इतने प्रभावी हो गए कि लोगों को फरमान जारी करने लगे. राजनीतिक लोग भी इन डकैतों की मदद लेने लगे और अपने पक्ष में फरमान जारी करवाने की जुगत भिड़ाने लगे. इन डकैतों ने अपने फरमानों से जिन लोगों को चुनाव जितवाया.

पंचायत चुनाव मे भी रहा बोलबाला

क्वारी नदी की गोद में बसे विंडवा कला गांव में दस्यु सलीम गुर्जर ने अपनी बहन को 1995 में प्रधान बनवाया तो 2000 में अपने बहनोई को प्रधानी का ताज पहनवाया. 2005 के चुनाव में जगजीवन परिहार ने चैरेला से अपने एक परिवारी को चुनाव जितवाया तो कुर्छा, कुंवरपुरा, विडौरी, नींवरी, हनुमंतपुरा सहित दर्जनों पंचायतों में दस्यु निर्भय गुर्जर के लोग चुनाव जीत गए. इतना ही नहीं पंचायतों के चुनाव में मात्र 7, 11 और 21 वोटों पर चुनावी प्रक्रिया पूर्ण कर दी गई. इतना ही नहीं क्षेत्र पंचायत सदस्य चुने गए एक जन प्रतिनिधि सत्यनारायण की तो निर्भय गुर्जर ने गांव आकर उसकी नाक इसलिए काट ली. क्योंकि उसने चुनाव लड़ा और स्कूल के लिए जमीन दी. चकरनगर ब्लाक प्रमुख की कुर्सी पर वर्ष 2000 से 2010 तक निर्विरोध चुनाव होता रहा.

निर्भय ने रिर्जव सीट से पिछडी जाति वाले को बनाया प्रधान

साल 2001 मे निर्भय के आंतक के चलते कुवरपुरा कुर्छा गांव के प्रधानपद के लिए कोई भी उम्मीदवार चुनाव मैदान मे नही उतारा परिणामस्वरूप रिर्जव जाति की प्रधान सीट पर निर्भय का खास गुर्जर जाति का बादाम सिंह प्रधान बना दिया गया. जिसकी शिकायत करने पर दुबारा पुलिस सख्ती के कारण चुनाव मे सत्यनारायण के चचेरे भाई खगडजीत प्रधान निर्वाचित हो गये. यह बात भी निर्भय को नागबार लगी. निर्भय के आंतक से दुखी परिवार ने तय किया कि वो कुछ ऐसा करेगा जिससे निर्भय और उसके गैंग की मुश्किले बढे और गांव वालो को राहत मिल सके. इसी बीच शिक्षा विभाग की ओर से गांव मे प्राथमिक स्कूल के निर्माण कराने का निर्णय किया जिसके लिए करीब पौन बीधा जमीन की जरूरत थी. कईयो लोगों से संपर्क करने के बाद जब बात नहीं बनी तो सत्यनारायण परिवार ने स्कूल के लिए अपने खेत की जमीन देने का निर्णय ले लिया. इस निर्णय ने सत्यनारायण परिवार की मुसीबते कुछ और ही बढ़ा दी.

जैसे जैसे स्कूल का निर्माण का कार्य शुरू हो निर्भय गैंग रात को यहाॅ पर आकर इस निर्माण को ध्वस्त करके चला जाये. यह सिलसिला एक दफा नही बल्कि तीन दफा हुआ. निर्भय ने खडगजीत सिंह को प्रधान पद से इस्तीफा देने के लिए उसके चचेरे भाई श्रीराम,मोहन सिंह,रन सिंह और विशुन सिंह का अपहरण कर लिया, लेकिन पुलिस दबाब मे निर्भय को करीब 14 दिन बाद सभी अगवा भाईयो को छोड़ना पड़ गया.

1998 मे डाकुओं ने निकाली थी आंखे

साल 1998 में राम आसरे उर्फ फक्कड़ और कुसमा नाइन ने फरमान ना मानने के एवज में भरेह थाना क्षेत्र में मल्लाह बिरादरी के संतोष और राजबहादुर की आंखें निकालकर के क्रूर सजा दी थी. यह चंबल घाटी में एक ऐसी सजा थी जिसकी कोई दूसरी मिसाल देखने को नहीं मिलती है. वैसे संतोष राज बहादुर औरैया जिले के असेवा गांव के रहने वाले थे लेकिन फरमान ना मानने के एवज में दोनों को घर से उठाकर के 10 किलोमीटर दूर ले जाकर के आंखें निकाल कर के क्रूरतम सजा दी गई.

200 गांव मे रहा है असर

इतिहास पर नजर डाले तो बीहड़ के 200 गांव एक अर्से से दस्यु प्रभावित रहे हैं. ग्रामपंचायत चुनाव से लेकर लोकसभा चुनावों तक यहां खूंखार डाकुओ के फरमान पर मतदाता वोट डालने को विवश हुए हैं. बीहड़ की धरती गवाह है कि जिसने भी दस्यु सरगनाओं की हुक्मउदूली की उसे परिणाम भुगतना पड़ा. बीते दो दशक के दौरान दर्जनो से अधिक कुख्यात डकैत या तो ढेर कर दिए गए या आत्मसर्पण कर जेल पहुंच गए.

डाकुओं का था कभी बोलबाला

दस्यु सम्राट श्रीराम, लालाराम, निर्भय गुर्जर, रामआसरे उर्फ फक्कड़, कुसमा नाइन, फूलन देवी, सलीम उर्फ पहलवान, रज्जन गूर्जर, गंभीर सिंह, चंदन, जगजीवन परिहार ऐसे नाम हैं जो बीहड़ वासियों के लिए वर्षों आतंक का पर्याय बने रहे. आज चंबल मे कोई भी डाकू नही है तो फिर फरमानो का असर कैसे होगा लेकिन डाकुओ के फरमानो की चर्चाए जरूरी सुनाई दे रही है.
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