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एक साधु की ललकार सुन मंदिर मामले पर सुनवाई को मजबूर हुए थे फैजाबाद के जिला जज

अयोध्या में विवादित स्थल का ताला खोलने का आदेश तो 1 फरवरी 1986 को हो गया. जिला जज के आदेश के बाद लोगों ने ताला खोल भी दिया, लेकिन आखिर जिला जज के एम पांडे को क्यों लेना पड़ा ये फैसला?

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अयोध्या को भगवान राम के नाम से जाना जाता है. ऐसे में यहां भक्ति की बात होनी चाहिए, पर अब भक्ति से ज्यादा अयोध्या विवाद के कारण मशहूर है. इस शहर में आमतौर पर सब कुछ शांत रहता है. साल भर श्रद्धालु आते रहते हैं, राम की बात होती है, लेकिन 6 दिसंबर आते-आते शहर का माहौल गर्म होने लगता है, श्रद्धालु कम होने लगते हैं और नेता बढ़ने लगते हैं. धर्म से ज्यादा चर्चा विवाद की होने लगती है. इस साल इस तादाद और चर्चा दोनों में तेजी आई है. हो भी क्यों नहीं, आखिर यह चुनावी साल जो है.

अयोध्या के इतिहास को देखें तो आजादी के बाद तीन अहम पड़ाव हैं. पहला, 1949 जब विवादित स्थल पर मूर्तियां रखी गईं, दूसरा, 1986 जब विवादित स्थल का ताला खोला गया और तीसरा 1992 जब विवादित स्थल गिरा दिया गया. 1992 के बाद की कहानी सबको पता है, लेकिन 1949 से लेकर अब तक ऐसा काफी कुछ हुआ है जो आपको जानना चाहिए. News18 Hindi अयोध्या की इन्हीं अनसुनी कहानियों के लिए आपके लिए एक स्पेशल सीरीज लाया है.

इस सीरीज की दूसरी कहानी में उस दिलचस्प वजह का जिक्र है जिसके चलते विवादित स्थल का ताला खोलने का फैसला लेना पड़ा था...

क्यों लेना पड़ा ताला खोलने का फैसला?

क्या था एक साधु का चैलेंज जिसने फैजाबाद के तत्कालीन जिला जज के एम पांडे को ताला खोलने का फैसला लेने पर मजबूर कर दिया?

अयोध्या में विवादित स्थल का ताला खोलने का आदेश तो 1 फरवरी 1986 को हो गया. जिला जज के आदेश के बाद लोगों ने ताला खोल भी दिया, लेकिन आखिर जिला जज के एम पांडे को क्यों लेना पड़ा ये फैसला?

राम मंदिर और बाबरी मस्जिद का विवाद सैकड़ों साल पुराना है. अंग्रेजों के जमाने में या यूं कहें कि अंग्रेजों के पहले से इस जगह के मालिकाना हक को लेकर विवाद चल रहा था.

सीरीज की पहली कहानी पढ़ें: राजीव गांधी नहीं, इस शख्स ने खुलवाया था ताला

आजादी के बाद के करीब 40 सालों में फैजाबाद की अदालत में एक दर्जन से ज्यादा जिला जज आए और स्थानांतरित होकर चले गए. ये मुकदमा उनके सामने भी आया, लेकिन किसी ने इस मुकदमे पर फैसला नहीं लिया. सबने सिर्फ तारीख लगाई और अपना कार्यकाल पूरा किया. लेकिन, जिला जज के एम पांडे ने फैजाबाद के जिला जज की कुर्सी पर बैठने के एक साल के भीतर ही इस पर फैसला सुना दिया. जज के एम पांडे के साथ काम करने वाले तत्कालीन सीजेएम सीडी राय इसके पीछे एक दिलचस्प किस्सा बताते हैं.



दरअसल, अयोध्या में जिला न्यायाधीश की कुर्सी संभालने के बाद के एम पांडे रामलला के दर्शन करने गए थे. दर्शन के बाद जब जज साहब निकले तो उन्होंने बाहर खड़े एक साधु से रामलला के बंद दरवाजे के बारे में पूछा. साधु का जवाब जज साहब को परेशान करने वाला था. साधु ने रामलला के बंद दरवाजे के पीछे अदालत और राजनेताओं को जिम्मेदार बताया. जज साहब के कुछ बोलने पर उस साधु ने जज साहब को विवादित स्थल का दरवाजा खोलने की चुनौती दे डाली. जिला जज पांडे को ललकारते हुए उस साधु ने कहा कि हिम्मत है तो इस मामले में अपना फैसला सुना दो.

उस साधू की बात ने जज साहब को अंदर तक झकझोर दिया और उन्होंने तय किया तो वह जल्द से जल्द इस मामले की सुनवाई पूरी करेंगे और हुआ भी यही. इस मामले में जज साहब ने अपनी सुनवाई करीब 1 महीने में पूरी कर ली और 1 फरवरी 1986 को ताला खोलने का फैसला सुना दिया.

यह भी पढ़ें: अयोध्या राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद: जानिए कब-कब क्या-क्या हुआ?

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