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अयोध्या: यहां और भी गम हैं मंदिर-मस्जिद के सिवा

अयोध्या: यहां और भी गम हैं मंदिर-मस्जिद के सिवा

प्रतीकात्मक तस्वीर

प्रतीकात्मक तस्वीर

जिस अयोध्‍या के नाम पर सियासी रोटियां सेंकी जाती हैं उसकी बेबसी और लाचारी पर्यटक और स्‍थानीय लोग रोज देख रहे हैं.

    अयोध्या वर्षों से भारतीय जनमानस के दिल-ओ-दिमाग पर छाया रहा है. जिस अयोध्या के मंदिर मस्जिद विवाद ने देश की राजनीतिक धुरी को बदल दिया वहां क्या बदला है. बाबरी मस्जिद और राम मंदिर के बीच फंसी अयोध्या में इसके सिवा भी कई दर्द हैं जो यहां के लोगों की जिंदगी को प्रभावित करते हैं.

    अध्योध्या की सबसे बड़ी समस्या क्या है? यह सवाल पूछने पर अवध पीपुल्स फोरम के संयोजक गुफरान सिद्दीकी कहते हैं "सियासत और सियासी लोग." "जिस दिन सुप्रीम कोर्ट यह रोक लगा देगी कि कोई भी मंदिर-मस्जिद मसले पर राजनीति नहीं कर सकता, उसी दिन सारी समस्याएं खत्म हो जाएंगी."

    सिद्दीकी कहते हैं कि "यह धार्मिक नगरी सिर्फ राजनीतिक मोहरा बनकर रह गई है. यहां न तो साफ-सफाई है और न ही पार्किंग और परिवहन की अच्‍छी सुविधा. आम लोगों के मन में अयोध्या के विकास की दौड़ में पीछे छूट जाने की टीस है. उनके सामने हिंदू-मुसलमान से अलग शिक्षा, स्‍वास्‍थ्‍य और रोजगार जैसे बड़े सवाल हैं."

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    "जिस अयोध्‍या के नाम पर सियासी रोटियां सेंकी जाती हैं उसकी हालत दिनों दिन खराब होती जा रही है. इस नगरी की बेबसी और लाचारी पर्यटक और स्‍थानीय लोग रोज देख रहे हैं, जबकि सियासी लोग सिर्फ श्रीराम का नाम बेच रहे हैं."

    क्या अयोध्या सिर्फ सियासी प्रयोगशाला है?

    सिद्दीकी कहते हैं "इतनी बड़ी धार्मिक मान्‍यता के बाद भी पर्यटन की हालत इतनी खराब है कि यहां थ्री स्‍टार होटल भी नहीं हैं. यहां जातियों और प्रदेशों के हिसाब से धर्मशालाएं बनी हैं जिनमें लोग रुकते हैं. करीब तीन हजार मंदिर हैं. लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ कि बाहर के पर्यटक आकर्षित हो सकें. मथुरा, वृंदावन, तिरुपति बाला जी, वैष्‍णो देवी और साईं मंदिर की तरह यहां भक्‍त नहीं पहुंचते, न ही सुविधाएं हैं जबकि श्रीराम हिंदुओं के आराध्‍य हैं. दरअसल, यह धार्मिक नगरी सिर्फ एक सियासी प्रयोगशाला है."

    अयोध्या में दरिद्रता और गरीबी का दर्द है जो चौतरफा नजर आती है. यहां विकास के नाम पर कुछ नहीं हुआ है. रोजगार है नहीं. मुख्य सड़कों से हटकर गलियों में चलिए तो वहां अजीब सी उदासी और वीरानेपन का मंजर मिलता है.
    डॉ. अनिल सिंह, एसोसिएट प्रोफेसर, हिंदी विभाग, साकेत कॉलेज


    डॉ. सिंह बताते हैं कि यहां बंदरों की समस्या है. बंदर बच्चों को काटते हैं लेकिन प्रशासन उन्हें हटाने की जगह कहता है कि ये तो धार्मिक मामला है. शिक्षा के नाम पर शिक्षा माफियाओं का कब्जा है. मंदिर-मस्जिद विवाद न होता तो इसका स्वाभाविक विकास हो चुका होता.

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    यहां न तो कोई बड़ा और अच्छा इंजीनियरिंग कॉलेज है, न कोई बड़ा अस्‍पताल और न ही पर्यटन के लिहाज से कोई होटल. साल भर में यहां चार मेले लगते हैं. उनमें आने वाले भक्‍त फुटपाथ पर और पार्कों में सोने के लिए मजबूर होते हैं. स्‍वच्‍छ भारत और खुले में शौच से मुक्‍ति की बात करते हैं लेकिन यहां पर्यटक खुले में शौच करने के लिए मजबूर हैं. पब्‍लिक टॉयलेट की कमी है. अयोध्‍या के आम नागरिकों की समस्‍याएं बड़ी हैं लेकिन हमारे देश के सियासतदानों ने कभी यहां के लोगों की परवाह नहीं की.

    तब मुस्लिमों के इमाम-ए-हिंद थे श्रीराम!

    अवध पीपुल्स फोरम के संयोजक गुफरान सिद्दीकी बताते हैं कि "अयोध्या का आम मुस्लिम आज भी मिलने पर जैराम जी की बोलता है. लेकिन जै श्रीराम नहीं बोलता, क्योंकि यह राम मंदिर आंदोलन का नारा था. अयोध्या में मंदिरों का प्रसाद, भगवा ध्वज, मालाएं आदि बनाने वाले करीब 80 प्रतिशत लोग मुस्लिम हैं."

    मोहम्मद इकबाल भगवान राम के बारे में लिखते हैं

    "लबरेज़ है शराबे-हक़ीक़त से जामे-हिन्द, सब फ़ल्सफ़ी हैं खित्ता-ए-मग़रिब के रामे हिन्द.../मशहूर जिसके दम से है दुनिया में नामे-हिन्द, है राम के वजूद पे हिन्दोस्तां को नाज़, अहले-नज़र समझते हैं उसको इमामे-हिन्द....


    यानी इकबाल यह लिखने में बिलकुल नहीं झिझकते कि राम भारतीय सभ्यता से जुड़े हैं न कि किसी धर्म से. इकबाल के मुताबिक भारत को इस पर गर्व है कि श्रीराम ने यहां जन्म लिया.

    लखनऊ के आखिरी नबाव वाजिद अली शाह जब यहां से बेदखल होकर कोलकाता जाने लगे तो अफवाह उड़ी कि अंग्रेज उन्हें लंदन ले जा रहे हैं. फिर वहां की मुस्लिम महिलाओं ने गाया
    ‘हजरत जाते हैं लंदन, कृपा करो रघुनंदन...’


    मुस्लिम महिलाएं बनारस में श्रीराम की आरती करती हैं. नाजनीन अंसारी कहती हैं कि "अयोध्या है हमारी जियारतगाह का नाम, रहते हैं वहां इमाम-ए-हिंद श्रीराम." इस पर कट्टरपंथियों ने ऐतराज किया था.

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    अयोध्या निश्चिंत है, क्योंकि उसे सब पता है

    साकेत कॉलेज में हिंदी के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. सिंह कहते हैं कि "यकीन मानिए, अयोध्या ऐसी है ही नहीं जैसा नेता दिल्ली में माहौल बनाते हैं. अवध का कल्चर बेमिसाल है. यहां हिंदू-मुस्लिमों का रेशा-रेशा जुड़ा हुआ है. अयोध्या पर घाव हुए हैं लेकिन इस वक्त यह नगरी सबसे निश्चिंत है. क्योंकि यहां के लोगों को पता है कि न मंदिर बनना है और न मस्जिद. अयोध्या में 49 मस्जिदें और 70 मजारें हैं, जहां बिना किसी रोकटोक इबादत चलती रहती है."

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