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राजीव गांधी नहीं, इस शख्स ने खुलवाया था ताला

आम धारणा ये है कि विवादित स्थल (बाबरी मस्जिद) का ताला तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी (Rajiv Gnadhi) के आदेश पर खोला गया, लेकिन तथ्यों पर नजर डालें तो ताला खुलवाने में राजीव गांधी की कोई भूमिका नहीं थी.

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अयोध्या (Ayodhya) को भगवान राम के नाम से जाना जाता है. ऐसे में यहां भक्ति की बात होनी चाहिए, पर अब भक्ति से ज्यादा अयोध्या विवाद  (Ayodhya case) के कारण मशहूर है. इस शहर में आमतौर पर सब कुछ शांत रहता है. साल भर श्रद्धालु आते रहते हैं, राम की बात होती है, लेकिन 6 दिसंबर आते-आते शहर का माहौल गर्म होने लगता है, श्रद्धालु कम होने लगते हैं और नेता बढ़ने लगते हैं. धर्म से ज्यादा चर्चा विवाद की होने लगती है. इस साल अयोध्या आने वाले लोगों की तादाद और चर्चा दोनों में तेजी आई है. हो भी क्यों नहीं, आखिर यह चुनावी साल जो है.

अयोध्या के इतिहास को देखें तो आजादी के बाद तीन अहम पड़ाव हैं. पहला, 1949 जब विवादित स्थल पर मूर्तियां रखी गईं, दूसरा, 1986 जब विवादित स्थल का ताला खोला गया और तीसरा 1992 जब विवादित स्थल गिरा दिया गया. 1992 के बाद की कहानी सबको पता है, लेकिन 1949 से लेकर अब तक ऐसा काफी कुछ हुआ है जो आपको जानना चाहिए. News18 Hindi इस मामले के अनजाने पहलुओं को एक एक सीरीज की शक्ल में आप तक पहुंचा रहा है.

इस सीरीज़ की पहली कहानी है एक फ़रवरी 1986 की, जब विवादित स्थल का ताला खोला गया था.

पहली कहानी

क्या हुआ था 1 फरवरी 1986 को
6 दिसंबर आने के साथ-साथ अयोध्या एक बार फिर चर्चा में है. देश और दुनिया की नजर अयोध्या पर है, लेकिन अयोध्या में बहुत कुछ ऐसा है जो दुनिया की नजरों के सामने नहीं है. मसलन, आखिर विवादित स्थल का ताला किसने खुलवाया?

आम धारणा ये है कि विवादित स्थल का ताला तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के आदेश पर खोला गया, लेकिन तथ्यों पर नजर डालें तो ताला खुलवाने में राजीव गांधी की कोई भूमिका नहीं थी.

जनमोर्चा अखबार के संपादक और अयोध्या पर सबसे ज्यादा करीबी नजर रखने वाले पत्रकारों में एक शीतला सिंह ने अपनी एक मुलाकात का हवाला देते हुए बताया कि राजीव गांधी ने खुद इस बात से इनकार किया था कि उनकी राम मंदिर का ताला खुलवाने में कोई भूमिका थी.

तो आखिर कैसे खुला राम मंदिर का ताला? यह जानने के लिए हमने बात की उस समय फैजाबाद के सीजेएम रहे सी डी राय से और यह जानने की कोशिश की आखिर क्या हुआ था 1 फरवरी 1986 को?
सीडी राय बताते हैं कि मामला पुराना था, लेकिन लगातार सुनवाई के बाद अयोध्या और आसपास के लोगों को पूरी उम्मीद की थी अयोध्या मामले पर फैसला आ जाएगा, जज साहब ने भी तैयारी पूरी कर रखी थी. उन्होंने फैसला देने से पहले तत्कालीन जिला जज के एम पांडे ने उस समय के जिलाधिकारी इंदु कुमार पांडे और पुलिस अधीक्षक कर्मवीर सिंह को अपने पास तलब किया.



दोनों अधिकारियों ने फैसले के बाद कानून व्यस्था के हालात पर चर्चा की और जब दोनों ने जिला जज को आश्वस्त कर दिया कि किसी तरह के फैसले से कानून-व्यवस्था के हालात पर कोई असर नहीं पड़ेगा तो जज साहब ने दोनों अधिकारियों से इस वादे को लिखित में कोर्ट में दाखिल करने को कहा.

दोनों अधिकारियों के लिखित आश्वासन के बाद अदालत ने शाम 4.40 बजे अपना फैसला सुनाया. फैसले में जिला जज ने प्रशासन को यह साफ-साफ आदेश दिया कि जब तक अदालत से विवादित स्थल पहुंचा जा सके उतनी देर में ताला खोल दिया जाए, यानी एक घंटे से भी कम का वक्त.

अदालत के फैसले के बाद इतने लोगों को काबू करना मुश्किल था. फैसले की कापी के बाद जब तक पुलिस और प्रशासन उस विवादित स्थल तक पहुंचता, हजारों की तादात में लोग वहां पहुंच चुके थे और विवादित स्थल का ताला तोड़ दिया गया. ताला किसने खोला इसका कोई रिकॉर्ड नहीं है क्योंकि जब तक प्रशासन और पुलिस की टीम वहां पहुंचती ताला खुल चुका था. ये सब कुछ अदालत के फैसले के बाद हुआ इसलिए पुलिस या प्रशासन ने यह जांच करने की कोशिश भी नहीं की कि आखिर ताला किसने खोला.

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