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अयोध्या पर फैसला देने वाले जज साहब की जान को किससे था खतरा?

राय साहब बताते हैं कि जिला जज के पास औसतन 30 से 35 चिट्ठियां रोज आने लगीं. इनमें 2-3 चिट्ठियों को छोड़ दिया जाए तो बकाया सभी में उन्हें धमकियां दी गई थीं.

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अयोध्या विवाद (Ayodhya Case) सालों पुराना था. आजादी के बाद से ही ये मामला और तेजी से सुलग रहा था. ये एक ऐसा विवाद था जिस पर आने वाला फैसला देश की आजादी के बाद सांप्रदायिक सौहार्द को बिगाड़ सकता था. ऐसे में तत्कालीन जिला जज के एम पांडे (M Pandey) ने भले ही जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक से फैजाबाद जिले में शांति व्यवस्था के हालात की रिपोर्ट ले ली हो, लेकिन ये मामला सिर्फ फैजाबाद तक ही सीमित नहीं था, बल्कि पूरी दुनिया में बसे हिंदुओं और मुसलमानों की जिंदगियों पर असर डाल सकता था. जज साहब भी इससे अछूते नहीं थे. फैसले के बाद से तत्कालीन जिला जज के एम पांडे को धमकियां मिलनी शुरू हो गईं.

पांडे जी के साथ सीजेएम रहे सी डी राय बताते हैं कि फैसला देने के करीब एक हफ्ते बाद पांडे जी को धमकी भरे खत मिलने शुरू हो गए. राय साहब बताते हैं कि जिला जज के पास औसतन 30 से 35 चिट्ठियां रोज आने लगीं. इनमें 2-3 चिट्ठियों को छोड़ दिया जाए तो बकाया सभी में उन्हें धमकियां दी गई थीं.

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अफगानिस्तान, सऊदी अरब समेत तमाम देशों और तमाम अलग-अलग भाषाओं में धमकी भरे पत्र उनके पास आ रहे थे. ऐसे में उनकी सुरक्षा को लेकर जिला प्रशासन के साथ-साथ उनके साथी अफसर भी चिंतित होने लगे. ये वो दौर था जब जिला जज के पास सुरक्षा तो क्या कहें ऑफिस आने-जाने के लिए वाहन भी नहीं होते थे. फैसले वाले दिन तो जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक ने खुद उन्हें घर तक छोड़ा, लेकिन इतनी भारी तादाद में धमकी भरे खत मिलने के बाद जिला प्रशासन से लेकर लखनऊ में बैठे गृह विभाग के अफसरों को भी उनकी सुरक्षा की चिंता सताने लगी.



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इसके बाद सरकार ने उनकी सुरक्षा के लिए नियमावली में संशोधन किया और तत्काल उन्हें सरकारी वाहन उपलब्ध कराया गया. घर से लेकर दफ्तर तक उनकी सुरक्षा कड़ी कर दी गई. स्थानीय लोग भी उनकी सुरक्षा को लेकर चिंतित रहते थे. कई बार तो जिला अदालत में संदिग्ध दिखने पर स्थानीय लोग भी उसके पीछे पड़ जाते थे, लेकिन धीरे-धीरे खतों का आना कम हो गया और करीब 6 महीनों बाद जज पांडे को धमकी भरे खत आने बंद हो गए, लेकिन उसके बाद भी उनके साथ सुरक्षा लगातार बनी रही.

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