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अयोध्या: किसने दिया पूजा शुरू करने का आदेश?

सीरीज की आठवीं कहानी अयोध्या में विवादित स्थल पर पूजा शुरू करने के आदेश से जुड़ी हुई है. इस कहानी में पढ़िए कि किसने विवादित स्थल पर पूजा शुरू करने का आदेश दिया था?

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अयोध्या को भगवान राम के नाम से जाना जाता है. ऐसे में यहां भक्ति की बात होनी चाहिए, पर अब भक्ति से ज्यादा अयोध्या विवाद के कारण मशहूर है. इस शहर में आमतौर पर सब कुछ शांत रहता है. साल भर श्रद्दालु आते रहते हैं, राम की बात होती है, लेकिन 6 दिसंबर आते-आते शहर का माहौल गर्म होने लगता है, श्रद्धालु कम होने लगते हैं और नेता बढ़ने लगते हैं. धर्म से ज्यादा चर्चा विवाद की होने लगती है. इस साल तादाद और चर्चा दोनों में तेजी आई है. हो भी क्यों नहीं, आखिर यह चुनावी साल जो है.

न्यूज़18 हिंदी एक सीरीज़ की शक्ल में अयोध्या की अनसुनी कहानियां लेकर आ रहा है. इसमें 6 दिसंबर तक हम आपको रोज एक ऐसी नई कहानी सुनाएंगे, जो आपने पहले कहीं पढ़ी या सुनी नहीं होगी. हम इन कहानियों के अहम किरदारों के बारे में भी बताएंगे.

अयोध्या के इतिहास को देखें तो आजादी के बाद तीन अहम पड़ाव हैं. पहला, साल 1949 जब विवादित स्थल पर मूर्तियां रखी गईं. दूसरा, साल 1986 जब विवादित स्थल का ताला खोला गया और तीसरा साल 1992 जब विवादित स्थल गिरा दिया गया. साल 1992 के बाद की कहानी सबको पता है, लेकिन साल 1949 से लेकर अब तक ऐसा काफी कुछ हुआ है जो आपको जानना चाहिए.

इस सीरीज की आठवीं कहानी अयोध्या में विवादित स्थल पर पूजा शुरू करने के आदेश से जुड़ी हुई है. इस कहानी में पढ़िए कि किसने विवादित स्थल पर पूजा शुरू करने का आदेश दिया था?

साल 1947 में देश आजाद होने के साथ ही अयोध्या में मंदिर निर्माण की चिंगारी सुलगनी शुरू हो गई थी. जिस तरह देश के बंटवारे के दौरान दंगे हुए थे उसे देखते हुए अयोध्या को सांप्रदायिक दंगों से मुक्त रखना पुलिस और प्रशासन के सामने बड़ी चुनौती थी.



22 दिसंबर 1949 को विवादित परिसर में भगवान राम की मूर्तियां रखे जाने के बाद से हिंदू पक्ष लगातार वहां पूजा करने की इजाजत मांग रहा था, लेकिन प्रशासन विवादित परिसर में मूर्तियां रखे जाने के बाद जरूरत से ज्यादा सतर्क था. वो ऐसा कुछ भी नहीं होने देना चाहता था जिससे अयोध्या और उसके आस-पास के इलाकों में सांप्रदायिक तनाव फैले.

इस बीच सरकार की सख्ती को देखते हुए हिन्दू नेताओं को विवादित स्थल से मूर्ति हटाये जाने का डर भी सताने लगा. इन सबके बीच गोपाल सिंह विशारद ने अयोध्या के सिविल जज की अदालत में मुकदमा दायर कर विवादित परिसर से मूर्तियां न हटाने और पूजा करने की इजाजत मांगी.

इस दिन मिली इजाजत

16 जनवरी 1950 को अदालत ने अपने फैसले में पूजा की इजाजत दे दी, लेकिन आदेश के स्पष्ट न होने के कारण अदालत को तीन दिन बाद यानि 19 जनवरी 1950 को अपने पुराने फैसले को संशोधित करना पड़ा. 19 जनवरी को फैजाबाद के सिविल जज ने पूजा के अधिकार की मांग कर रही दोनों अर्जियों का निपटारा करते हुए अपने आदेश में मूर्तियां हटाने पर रोक लगाते हुए इन मूर्तियों के रख-रखाव और हिंदुओं को बंद दरवाज़े के बाहर से ही इन मूर्तियों के दर्शन करने की इजाजत दे दी.

अपने फैसले में सिविल जज ने अदालत ने मुसलमानों पर पाबंदी लगा दी कि वे इस 'विवादित मस्जिद' के तीन सौ मीटर के दायरे में न आएं. यहां यह बताना जरूरी है कि 22 दिसंबर 1949 को विवादित स्थल पर मूर्तियां रखे जाने के बाद मुस्लमानों ने यहां अपनी नमाज बंद कर दी थी.

आगे पढ़ें- साल 1949 - नेहरु को अयोध्या आने से किसने रोका

देश आजाद होने के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू अयोध्या आना चाहते थे लेकिन उन्हें इजजात नहीं मिली, किसने रोका प्रधानमंत्री को अयोध्या आने से और क्या थे हालात बताएगें कहानी की अगली किश्त में...

यहां पढ़ें सीरीज की अन्य कहानियां

भाग 1- राजीव गांधी नहीं, इस शख्स ने खुलवाया था ताला

भाग 2- एक साधु की ललकार सुन मंदिर मामले पर सुनवाई को मजबूर हुए थे फैजाबाद के जिला जज

भाग 3- कौन था वो काला बंदर जो अयोध्या पर फैसले के दिन हर जगह नजर आया

भाग 4- अयोध्या पर फैसला देने वाले जज साहब की जान को किससे था खतरा?

भाग 5- अयोध्या के अनसुने किस्सेः मुलायम ने कैसे रोका जिला जज पांडे का प्रमोशन?

भाग 6- अयोध्या: रिटायरमेंट के बाद किसने कराया जज साहब का प्रमोशन

भाग 7- अयोध्या: मंदिर में ताला किसने लगाया?

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