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OPINION: राम मंदिर पर इस मास्‍टर प्‍लान की वजह से खामोश है बीजेपी

(File Photo)

(File Photo)

अभी लोकसभा चुनावों में करीब-करीब 6 महीने का वक्त बचा है. इन 6 महीनों तक राम मंदिर आंदोलन का लय बनाए रखना आसान नहीं होगा. जबकि कुंभ के अंतिम शाही स्नान के बाद चुनावों में 3 महीने से भी कम का वक्त बचेगा.

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लक्ष्य कुछ और है जरिया राम हैं. वैसे तो राम भवसागर पार करने का जरिया रहे हैं, लेकिन आज के जमाने का भवसागर तो चुनाव जीतना और सत्ता पाना ही है. लिहाजा अयोध्या का माहौल गर्म हो चुका है, हालांकि बीजेपी के वे बड़े चेहरे, जिनकी पहचान अयोध्या से रही है, वे अभी कहीं नजर नहीं आ रहे. उन चेहरों में सिर्फ विनय कटियार ही हैं, जो अयोध्या पर यदा कदा बयान देकर ये जताने की कोशिश में दिखते हैं कि अयोध्या और राम से और बीजेपी का उनसे नाता बना हुआ है.

लेकिन ऐसा हो क्यों रहा है? राम के नाम पर दोबारा सत्ता पाने की राह देख रही बीजेपी अभी इतनी शांत क्यों है? सूत्रों की मानें, तो बीजेपी की तैयारी प्रयागराज में कुंभ के बाद अयोध्या का माहौल गर्म करने की थी, लेकिन शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने बीजेपी को हड़बड़ी करने पर मजबूर कर दिया. उद्धव की अपनी राजनीतिक लड़ाई है. वाजपेयी-आडवाणी वाली बीजेपी के मुकाबले मोदी-शाह वाली बीजेपी से न सिर्फ शिवसेना प्रमुख असहज हैं, बल्कि जब भी मौका मिला तो इस सीनियर सहयोगी को घेरने का मौका भी नहीं चूकते.

बहरहाल, ऐसे में बीजेपी जनवरी तक इंतजार नहीं कर सकती थी. बीजेपी के अंदरूनी सूत्रों की मानें तो पार्टी इस कार्यक्रम में उतनी ही शिरकत करेगी, जितने-से दूसरी किसी पार्टी या संगठन को अयोध्या मामले में आगे बढ़ने का मौका न मिले और असली आंदोलन तो कुंभ मेले से ही शुरू होगा. कुंभ में आंदोलन शुरू करने के पीछे बीजेपी आलाकमान की सोच बजट से भी जुड़ी है.

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दरअसल, पार्टी का शीर्ष नेतृत्व अपने अंतिम और अंतरिम बजट से पहले कोई हंगामा खड़ा करना नहीं चाहता, क्योंकि चुनाव भले ही जाति और धर्म पर हो, लेकिन चुनावों में बात विकास की भी करनी पड़ती है और इस सरकार को तो करनी ही होगी. ऐसे में सरकार में बैठी कोई भी पार्टी ये नहीं चाहेगी कि उसका अंतिम बजट भाषण हंगामे की भेट चढ़ जाए.

बात करें चुनावी फायदे की, तो अभी लोकसभा चुनावों में करीब-करीब 6 महीने का वक्त बचा है. इन 6 महीनों तक राम मंदिर आंदोलन का लय बनाए रखना आसान नहीं होगा. जबकि कुंभ के अंतिम शाही स्नान के बाद चुनावों में 3 महीने से भी कम का वक्त बचेगा और कुंभ से लकर चुनावों तक आंदोलन की धार को बनाए रखना बीजेपी और दूसरे मंदिर समर्थक संगठनों के लिए आसान होगा.

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हिन्दू धर्म में कुंभ सबसे बड़ा आयोजन है. ऐसे में वहां भीड़ जुटाने की जिम्मेदारी भी बीजेपी नेताओं के कंधे पर नहीं होगी. कुंभ के शाही स्नान की बात करें, तो वहां एक करोड़ से ज्यादा लोगों के इकठ्ठा होने की उम्मीद है और ये लोग देश के अलग-अलग हिस्सों से आते हैं. इस लिहाज से भी यहां पर हुई किसी भी घोषणा को देश भर में पहुंचाना बड़ा आसान होगा.

साफ है कि बीजेपी मंदिर को लेकर 6 दिसंबर तक भले ही आक्रामक भाषा का इस्तेमाल करें, लेकिन पार्टी का शीर्ष नेतृत्व ये कभी नहीं चाहेगा कि कुंभ से पहले अयोध्या में कोई बड़ा और हिंसक आंदोलन खड़ा हो. बीजेपी इस वक्त यही उम्मीद लेकर चल रही है कि फिलहाल खबरों में छा रहे उद्धव की आवाज कुंभ के उद्घोष में अपने आप खो जाएगी. बीजेपी की योजना सिरे चढ़ी तो तब सिर्फ बीजेपी होगी, उनके सहयोगी संगठन होंगे और होगा मंदिर का एक और बड़ा आंदोलन.

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