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अयोध्या में 'हिंदू कार्ड' के सियासी इस्तेमाल की ये है कहानी!
Faizabad News in Hindi

ओम प्रकाश | News18Hindi
Updated: November 21, 2018, 3:42 PM IST
अयोध्या में 'हिंदू कार्ड' के सियासी इस्तेमाल की ये है कहानी!
अयोध्या रेलवे स्टेशन

‘आचार्य नरेंद्र देव और बाबा राघव दास के बीच चुनावी जंग को कांग्रेस नेताओं ने राम-रावण लड़ाई बताया. कांग्रेस ने जनता से पूछा था कि क्या आप ऐसे व्यक्ति को वोट देंगे जो राम को भगवान नहीं मानते?’

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अयोध्या में राम मंदिर मामले को लेकर भले ही इन दिनों बीजेपी ने कांग्रेस को घेरा हुआ है, लेकिन दावा ये है कि राम नगरी में 'हिंदू कार्ड' की पहली सियासी फसल कांग्रेस ने ही काटी थी. यानी कभी कांग्रेस ने हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण करके यहां चुनाव जीता था. मंदिर का मुद्दा कांग्रेस के स्थानीय नेतृत्व ने प्रमुखता से उठाया. यह बात 1948 की है. माना जाता है कि आजाद भारत में धर्म निरपेक्षता पर कट्टर हिंदुत्व की यह पहली जीत थी. समय का चक्र अब कांग्रेस से बार-बार हिंदुत्व की परीक्षा ले रहा है.

अयोध्या के वयोवृद्ध पत्रकार शीतला सिंह ने न्यूज 18 से बातचीत में कहा, "आजादी के बाद आचार्य नरेंद्र देव एवं उनके साथ 11 सदस्यों ने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया. साथ ही उत्तर प्रदेश विधानसभा की सदस्यता भी छोड़ दी. आचार्य नरेंद्र देव सोशलिस्ट पार्टी के प्रत्याशी के तौर पर फैजाबाद सीट से उपचुनाव लड़ रहे थे. उनको हराने के लिए कांग्रेस ने खुलकर हिंदू कार्ड खेला."

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"उपचुनाव शुरू हुआ तो कांग्रेस ने धार्मिक मुद्दा उठाया. आचार्य नरेंद्र देव को नास्तिक बताते हुए अयोध्या जैसी धार्मिक नगरी के मनोभावों के खिलाफ बताया गया. उनके खिलाफ देवरिया जिले से बाबा राघव दास नामक साधु को उम्मीदवार बनाया गया. जबकि जवाहरलाल नेहरू चाहते थे कि आचार्य के खिलाफ कोई चुनाव न लड़े. चुनाव में जो बैनर लगे, उनमें इसे राम-रावण की लड़ाई बताया गया."



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शीतला सिंह के मुताबिक “उत्तर प्रदेश के प्रीमियर गोविंद वल्लभ पंत ने कांग्रेस प्रत्याशी बाबा राघव दास के समर्थन में अयोध्या के संतों-महंतों की सभाएं कीं, जिनमें उन्होंने कहा कि राघव दास में तो गांधी जी की आत्मा बसती है, लेकिन आचार्य नरेंद्र देव तो नास्तिक हैं. मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम की नगरी अयोध्या ऐसे व्यक्ति को कैसे स्वीकार कर पाएगी? इस चुनाव में पुरुषोत्तम दास टंडन भी प्रचार में शामिल हुए. उन्होंने भी आचार्य जी की नास्तिकता का सवाल उठाया था.”

“आचार्य नरेंद्र देव के खिलाफ राम-रावण संवाद के नाम से ऐसे पर्चे बांटे गए, पोस्टर लगाए गए, जिनमें रावण रूपी नरेंद्र देव को हराने और राम रूपी बाबा राघव दास को जिताने का आह्वान किया गया था. कहा गया कि जो कांग्रेस का विरोध कर रहे हैं, वे देश के दुश्मन हैं.”

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‘संवेद’ पत्रिका ने जनवरी 2016 के ‘समाजवाद और आचार्य नरेंद्र देव’ विशेषांक में लिखा है “कांग्रेस के अंदर एक ऐसा समूह था जो अघोषित रूप से चाहता था कि भारत हिंदू राष्ट्र बनने की ओर अग्रसर हो....“गोविंदबल्लभ पंत और पुरुषोत्तम दास टंडन जैसे कांग्रेसी नेताओं ने प्रचार अभियान में यह बात फैलाई कि नरेंद्र देव ईश्वर को नहीं मानते. कांग्रेस नेताओं ने सोशलिस्ट पार्टी के प्रत्याशी के खिलाफ जनता से पूछा कि क्या आप अपना वोट ऐसे व्यक्ति को देंगे जो राम को भगवान नहीं मानते? बाबा राघव दास ने खुद घर-घर जाकर तुलसी की माला दी. अंतत: साधु जीत गया और एक संघर्षशील समाजवादी हार गया....इस जीत के बाद ही 1949 में बाबारी मस्जिद में रामलला प्रकट हुए.”

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‘24 अकबर रोड’ नामक किताब लिखने वाले रशीद किदवई कहते हैं “कांग्रेस में हमेशा से एक धड़ा हिंदुत्ववादी और दूसरा मार्क्सवादी, समाजवादी सोच का रहा है. हिंदुत्ववादी सोच के नेताओं में गोविंदबल्लभ पंत और पुरुषोत्तम दास टंडन प्रमुख थे, जो आस्था के प्रखर समर्थक थे. आचार्य नरेंद्र देव के विचार उनसे मेल नहीं खाते थे तो वे अलग हो गए. हालांकि कांग्रेस का हिंदुत्व भाजपा के हिंदुत्व से अलग था. इंदिरा गांधी तो दोनों सोच के नेताओं को बैलेंस करके चलती थीं. लेकिन सोनिया गांधी तक आते-आते कांग्रेस का चेहरा बिल्कुल हिंदू विरोधी के तौर पर उभरा. इसमें परिस्थितियां भी जिम्मेदार थीं. बीजेपी ने इसे भुनाया और खुद को सबसे बड़े हिंदू हितैषी पार्टी के रूप में खड़ा किया.”

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इस बारे में जब कांग्रेस के नेशनल मीडिया कोर्डिनेटर रोहन गुप्ता से बातचीत की गई तो उन्होंने कहा, “कांग्रेस सबको साथ लेकर चलती है. हम धर्म के नाम पर वोट नहीं मांगते. फिलहाल मैं 1948 की बात नहीं बता सकता कि क्या हुआ था. इसके लिए किसी वरिष्ठ नेता से बात करनी होगी.”

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First published: November 15, 2018, 3:30 PM IST
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