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1990 में मुलायम सिंह यादव ने क्यों चलवाई थी गोली?

इस सीरीज़ की 14वीं कहानी में पढ़िये कि यूपी के तत्कालीन सीएम मुलायम सिंह यादव ने कारसेवकों पर गोली क्यों चलवा दी...

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अयोध्या को भगवान राम के नाम से जाना जाता है. ऐसे में यहां भक्ति की बात होनी चाहिए, पर अब भक्ति से ज्यादा अयोध्या विवाद के कारण मशहूर है. इस शहर में आमतौर पर सब कुछ शांत रहता है. साल भर श्रद्धालु आते रहते हैं, राम की बात होती है, लेकिन 6 दिसंबर आते-आते शहर का माहौल गर्म होने लगता है, श्रद्धालु कम होने लगते हैं और नेता बढ़ने लगते हैं. धर्म से ज्यादा चर्चा विवाद की होने लगती है. इस साल इस तादाद और चर्चा दोनों में तेजी आई है. हो भी क्यों नहीं, आखिर यह चुनावी साल जो है.

न्यूज़18 हिंदी एक सीरीज़ की शक्ल में अयोध्या की अनसुनी कहानियां लेकर आ रहा है. इसमें 6 दिसंबर तक हम आपको रोज एक ऐसी नई कहानी सुनाएंगे, जो आपने पहले कहीं पढ़ी या सुनी नहीं होगी. हम इन कहानियों के अहम किरदारों के बारे में भी बताएंगे.

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अयोध्या के इतिहास को देखें तो आजादी के बाद तीन अहम पड़ाव हैं. पहला, 1949 जब विवादित स्थल पर मूर्तियां रखी गईं, दूसरा, 1986 जब विवादित स्थल का ताला खोला गया और तीसरा 1992 जब विवादित स्थल गिरा दिया गया. 1992 के बाद की कहानी सबको पता है, लेकिन 1949 से लेकर अब तक ऐसा काफी कुछ हुआ है जो आपको जानना चाहिए.

इस सीरीज़ की 14वीं कहानी में पढ़िये कि यूपी के तत्कालीन सीएम मुलायम सिंह यादव ने कारसेवकों पर गोली क्यों चलवा दी...



30 अक्टूबर 1990 अयोध्या के आंदोलन के सबसे अहम पड़ावों में से एक था. 1987 में विवादित स्थल का ताला खोले जाने के बाद से ही लगातार अयोध्या में राम मंदिर बनाने की मांग जोर पकड़ रही थी.

आंदोलन के लगातार बढ़ते दबाव के बाद 1989 में चुनावों की आहट के बीच केंद्र की राजीव गांधी सरकार और उत्तर प्रदेश की नारायण दत्त तिवारी सरकार ने मंदिर निर्माण के लिए शिलान्यास तो करा दिया, लेकिन 1989 के चुनावों में ये मुद्दा धार्मिक के साथ-साथ राजनीतिक भी हो गया.

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राम मंदिर आंदोलन के बहाने 2 सीट से 85 सीट पर पहुंचने वाली बीजेपी और उसके तत्कालीन अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी इस मुद्दे को किसी भी कीमत पर छोड़ना नहीं चाहते थे. लालकृष्ण आडवाणी ने संतों के इस आंदोलन को बीजेपी का आंदोलन बताते हुए रथयात्रा शुरू कर दी. यानी मंदिर आधिकारिक तौर पर अब चुनावी मुद्दा हो गया. दूसरी ओर संत भी इस आंदोलन को छोड़ना नहीं चाहते थे और अयोध्या में कारसेवा की तारीख रखी गई 30 अक्टूबर 1990.

1989 में जनता दल की सरकार भले ही बीजेपी के सहयोग से बनी, लेकिन पार्टी के 2 बड़े नेता और उत्तर प्रदेश और बिहार की कमान संभाल रहे मुलायम सिंह यादव और लालू प्रसाद यादव बीजेपी की इस चाल से परेशान थे. उन्हें कभी भी ये मंजूर नहीं था कि उनके सरकार में रहते देश में इस तरह की राजनीति हो. राम मंदिर आंदोलन में लगातार हो रहे ध्रुवीकरण को देखते हुए दोनों ने कड़ा फैसला लिया.

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बिहार में जहां लालकृष्ण आडवाणी का रथ रोकते हुए उन्हें गिराफ्तार कर लिया गया, वहीं अयोध्या में विवादित स्थल का ढांचा बचाए रखने के लिए कारसेवकों पर गोली चला दी गई. कारसेवा समिति के अध्यक्ष जगदगुरु शंकराचार्य वासुदेवानंद सरस्वती बताते हैं कि 30 अक्टूबर 1990 को लाखों की तादाद में कारसेवक अयोध्या पहुंचे चुके थे. उन्हें सरकार से इस तरह की सख्ती का अनुमान नहीं था. हालांकि, तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के विवादित स्थल पर ‘पंरिदा भी पर नहीं मार सकेगा’ के बयान के बाद लोगों को अनुमान हो गया था कि हालात ठीक नहीं हैं, लेकिन तब तक अयोध्या में इतनी भीड़ जमा हो चुकी थी कि उन्हें काबू में नहीं किया जा सकता था. निश्चित समय पर कारसेवा शुरू हो गई और कारसेवकों ने विवादित स्थल पर ध्वज लगा दिया और उसके बाद पुलिस फायरिंग में कई लोग मारे गए. कारसेवा रद्द कर दी गई.
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भाग 7- अयोध्या: मंदिर में ताला किसने लगाया?
भाग 8- अयोध्या: किसने दिया पूजा शुरू करने का आदेश?
भाग 9- नेहरू को अयोध्या आने से किसने रोका?

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भाग 11- अयोध्या: CM वीर बहादुर और महंत अवैद्यनाथ की सीक्रेट बैठक में क्या हुआ था तय
भाग 12 - अयोध्याः किसने बिगाड़ी मंदिर बनाने की योजना?
भाग 13- शिलान्यास के बाद भी क्यों नहीं बना राम मंदिर? 

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