Ground report: गाजीपुर में मनोज सिन्हा के विकास पर क्या है दलित वोटरों की राय

मनोज सिन्हा की पहचान प्रधानमंत्री मोदी के करीबी नेताओं में होती है. ऐसे में पूरे देश की नजर इस सीट पर है लेकिन यहां भी सवाल यही है कि क्या 5 साल में गाजीपुर की तस्वीर बदली है? यदि हां, तो कितनी बदली?

Anil Rai | News18 Uttar Pradesh
Updated: May 17, 2019, 1:54 PM IST
Ground report: गाजीपुर में मनोज सिन्हा के विकास पर क्या है दलित वोटरों की राय
अफजाल अंसारी (बाएं) और मनोज सिन्हा
Anil Rai
Anil Rai | News18 Uttar Pradesh
Updated: May 17, 2019, 1:54 PM IST
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी से करीब 20 किलोमीटर आगे चलने पर गाजीपुर की सीमा शुरू होती है, ये लोकसभा सीट भी अंतिम चरण की हॉट सीट में से एक है. भारत सरकार के रेल राज्य मंत्री और संचार मंत्री मनोज सिन्हा यहां से बीजेपी उम्मीदवार हैं. मनोज सिन्हा की पहचान प्रधानमंत्री मोदी के करीबी नेताओं में होती है. ऐसे में पूरे देश की नजर इस सीट पर है लेकिन यहां भी सवाल यही है कि क्या 5 साल में गाजीपुर की तस्वीर बदली है? यदि हां, तो कितनी बदली?

इसकी सबसे पहली झलक मिलती है गाजीपुर से वाराणसी के रास्ते पर. आम लोगों की माने तो 2014 के पहले वाराणसी से गाजीपुर पहुंचना अपने आप में एक मुश्किल भरा काम था. वैसे तो गाजीपुर पहुंचने में 4 घंटे लगते थे लेकिन अगर रेलवे फाटक बंद मिला तो ये समय 5-6 घंटे का भी हो सकता था लेकिन अब हालात बदले हैं. हमें वाराणसी से गाजीपुर पहुंचने में करीब 2 घंटे का समय लगा. ये हालात तब हैं, जब अभी हाईवे का काम चल रहा है. ऐसे में अगर ये काम पूरा हो जाता है तो वाराणसी से गाजीपुर की दूरी शायद एक से डेढ़ घंटे में सिमट जाएगी.



बात करें मनोज सिन्हा के दावे की तो तीन हजार करोड़ से बन रही गाजीपुर-मऊ-ताडीखाट रेल लाइन सह सड़क पुल, 100 विद्यालयों को जीर्णोद्धार, गाजीपुर में मेडिकल कालेज, पासपोर्ट सेवा केन्द्र, गाजीपुर से मुम्बई, माता वैष्णो देवी समेत तमाम शहरों के लिए ट्रेनों के परिचालन, रेलवे के जोनल ट्रेनिंग सेंटर का निर्माण समेत 75 कामों का की लिस्ट है. मनोज सिन्हा अपने भाषणों में 40 हजार करोड़ के विकास कार्यों का लेखा-जोखा जनता को देते हैं.

विकास बनाम माफिया होती जा रही है गाजीपुर की लड़ाई

मनोज सिन्हा विकास के मुद्दे पर चुनाव लड़ना चाहते हैं लेकिन उनके खिलाफ खड़े बीएसपी उम्मीदवार अफजाल अंसारी इस पूरे चुनाव का जाति पर ले जाते दिखते हैं. ऐसे में मनोज सिंहा विकास के साथ-साथ अपने मंच से माफिया मुख्तार और अफजाल अंसारी से गाजीपुर को मुक्त कराने की बात भी करते हैं लेकिन यहां सवाल ये उठता है कि क्या गाजीपुर में जाति का गणित टूटेगा? इस सवाल का जवाब हमने गाजीपुर की सीमा में प्रवेश करते ही तलाशना शुरू कर दिया.

सबसे पहले हम महाराजगंज के पास एक दलित बाहुल्य गांव में पहुंचे और सीधा सवाल पूछा- आखिर आप लोग किसे वोट कर रहे हैं और क्यों? जवाब अंदाज से अलग था. गांव का बुजुर्ग जहां कुछ बोलने से कतरा रहे थे, वहीं कुछ ऐसे युवा मिले जो मुम्बई और सूरत से सिर्फ बीजेपी को वोट करने आए हैं. उनका कहना है कि यहां से चली ट्रेनों के कारण ही हम हर त्यौहार पर अपने घर आ पाते हैं. ऐसे में लोकतंत्र के सबसे बड़े त्यौहार में कैसे नहीं आते? मुस्लिम बस्तियों में भी मनोज सिन्हा और उनके विकास की बात तो खूब हो रही है लेकिन वोट के नाम घरों में सहमति नहीं बन पाई है लेकिन गाजीपुर में सबकी नजर जिस वोट बैंक पर है. वो है यादव वोट बैंक, क्या यादव बीजेपी को वोट करेगा.

इस सवाल का जवाब जानने के लिए हमने महराजगंज के गांव के प्रधान हर वंस यादव से बात की. हरवंस यादव कभी एसपी नेताओं के करीबी माने जाते थे लेकिन इस बार वो विकास ओर माफिया राज के खिलाफ वोट कर रहे हैं. उनका दावा है दिल्ली की सरकार चुननी है तो वो मनोज सिंहा और बीजेपी के साथ हैं. शहर में भी कुछ यही हाल है. हालांकि शहरी मतदाता मीडिया के सामने खुलकर बोलने को तैयार नहीं दिख रहा है लेकिन गाजीपुर पहुंचते-पहुंचते एक बात का अंदाजा साफ लग गया कि यहां इस चुनाव में विकास भी एक बड़ा मुद्दा है.
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