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EXCLUSIVE: BHU विवाद पर गोरखपुर यूनिवर्सिटी में 32 साल संस्कृत पढ़ाने वाले असहाब अली बोले- टीचर को क्लास के अन्दर करें जज

Ramgopal Diwedi | News18 Uttar Pradesh
Updated: November 22, 2019, 3:27 PM IST
EXCLUSIVE: BHU विवाद पर गोरखपुर यूनिवर्सिटी में 32 साल संस्कृत पढ़ाने वाले असहाब अली बोले- टीचर को क्लास के अन्दर करें जज
गोरखपुर यूनिविर्सिटी के संस्कृत विभाग के एचओडी रहे प्रोफेसर असहाब अली ने बीएचयू में टीचर की नियुक्ति के विरोध का गलत बताया है.

गोरखपुर के पंडित दीन दयाल उपाध्याय विश्वविद्यालय (DDU University Gorakhpur) में 32 सालों से अधिक समय तक संस्कृत पढ़ाने वाले और संस्कृत विभाग के एचओडी रह चुके प्रोफेसर असहाब अली का कहना है कि बीएचयू (BHU) में जो छात्र विरोध कर रहे हैं, वो गलत कर रहे हैं. किसी भी अध्यापक को क्लास के अंदर जज किया जाता है न कि बाहर. जाति, धर्म और मजहब के हिसाब से जज करना तो बिल्कुल गलत है.

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गोरखपुर. बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी (BHU) के संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय में असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. फिरोज खान (Dr. Feroz Khan)  की नियुक्ति को लेकर छात्रों का विरोध प्रदर्शन जारी है. मामले में छात्र लगातार धरने पर हैं, वहीं विश्वविद्यालय प्रशासन मामले में कोई निर्णय नहीं ले सका है. उधर इसी मसले पर News18 ने गोरखपुर के पंडित दीन दयाल उपाध्याय विश्वविद्यालय, गोरखपुर (DDU University Gorakhpur) में 32 सालों से अधिक समय तक संस्कृत पढ़ाने वाले और संस्कृत विभाग के एचओडी रह चुके प्रोफेसर असहाब अली (Professor Ashab Ali) की राय जानी.

बता दें प्रोफेसर असहाब अली 2011 के जून महीने में रिटायर हुए हैं. प्रो असहाब अली का कहना है कि बीएचयू में जो छात्र विरोध कर रहे हैं, वो गलत कर रहे हैं. किसी भी अध्यापक को क्लास के अंदर जज किया जाता है न कि बाहर. जाति, धर्म और मजहब के हिसाब से जज करना तो बिल्कुल गलत है.



'मैं दाढ़ी के साथ संस्कृत वाला ही हूं'

बता दें प्रोफेसर असहाब अली ने इंटरमीडिएट परीक्षा में संस्कृत में टॉप किया था, इसके बाद उन्होंने ग्रेजुएशन संस्कृत में किया और फिर पोस्ट ग्रेजुएशन में उनका स्पेशलाइजेशन वेदों पर रहा है. पीएचडी उन्होने वैदिक और इस्लामिक मिथकों के तुलनात्मक अध्यन पर किया है. प्रोफेसर असहाब अली मूल रूप से महराजगंज के जमुनिया गांव के रहने वाले हैं.

गोरखपुर विश्वविद्यालय में वो 1973 से ही रिसर्च के दौरान छाऋो्रं को पढ़ाने लगे थे. 1977 में उनको नियुक्ति मिल गई. तब से लेकर 2011 तक वह विश्वविद्यालय में छात्रों को संस्कृत की शिक्षा देते रहे. रिटायरमेंट के समय प्रोफेसर असहाब संस्कृत विभाग के एचओडी थे. उन्होंने एक वाकया याद करते हुए कहा कि एक बार वो सिबली कॉलेज में सिलेक्शन के लिए गये थे. तब वहां पर किसी ने कहा कि संस्कृत के लिए सिलेक्शन करना है न कि फारसी के लिए. तब असहाब अली ने हाजिर जवाबी में कहा कि मैं दाढ़ी के साथ संस्कृत वाला ही हूं.
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क्लास में देखें कि जिसे आप भगाना चाहते हैं वो किस कैलिबर का आदमी है?
प्रोफेसर असहाब अली संस्कृत को वैश्विक भाषा बताते हैं. वह बीएचयू में हुए बवाल पर कहते हैं कि जो लोग विरोध कर रहे हैं, गलत कर रहे हैं वो लोग अपने भविष्य के लिए भी, संस्कृत के लिए भी और देश के लिए भी कुठाराघात कर रहे हैं. उनको ऐसा नहीं करना चाहिए. उन्होंने अपील की कि अपने, संस्कृत और देश के हित में विरोध को वापस ले लें और क्लास में जाकर देखें कि जिसको आप भगाना चाहते हैं वो किस कैलिबर का आदमी है?

साथ ही उन्होंने कहा कि उनके विद्यार्थी जीवन में और उनके टीचर रहते हुए कभी भी ऐसी बात नहीं आई कि मुसलमान संस्कृत से जुड़ा हुआ है तो एक बुरी बात हो गयी. बल्कि इसमें मुझको प्रोत्साहित ही किया जाता रहा है. वह कहते हैं कि लोग मुझे उत्साहित करते थे और ये उत्साहवर्द्धन तब और हुआ जब मैं अध्यापक हो गया. विवि में 6 साल तक असिस्टेंट प्रॉक्टर रहा. विवि के सभी अध्यापकों को मैं जानता था. सबसे मित्रवत और बड़े लोगों से मैं गुरुवत मिलता था.

हम दाराशिकोह को भूल रहे हैं
वेद पर स्पेशलाइजेन के मुद्दे पर प्रोफेसर असहाब ने कहा कि वेद पढ़ते वक्त उन्हें कभी झिझक नहीं थी. जितने ब्रांच विभाग में पढ़ाये जाते हैं वो मैं सब में पढ़ाता था. लेकिन मैं स्पेशलाइज था वेद का, इसलिए वेद को मैं और अधिक गंभीरता से पढ़ाता था. जब जरूरत पड़ी तो किताब भी लिखी उपनिषद पर. मैं ही पढ़ाता था उसको. उन्होंने कहा कि कोई भी विद्यार्थी ऐसा नहीं था, जिसको कभी भी ऐसा लगा हो कि मुसलमान से पढ़ रहा हूं बल्कि उसको लगता था कि मुसलमान बेहतर पढ़ा रहा है. मैं धर्म और दर्शन को ज्यादा भाव से पढ़ाता था. कभी-कभी मैं संस्कृत पढ़ाते हुए इस्लाम का भी उदाहरण देता था कि देखो कलम्पा में क्या लिखा है?

प्रोफेसर कहते हैं कि हम दाराशिकोह को भूल रहे हैं. दाराशिकोह शाहजहां का पुत्र था और संस्कृत का बहुत बड़ा विद्वान था. उसने उपनिषद लिखा है. क्या अब किसी को दाराशिकोह नहीं बनने देंगे? मैंने कभी ऐसा सुना नहीं कि किसी का विरोध मुसलमान होने के कारण हो रहा हो.

हाईस्कूल में पढ़ चुका था रामायण, महाभारत, सुखसागर, विश्रामसागर
संस्कृत से जुड़ाव के मुद्दे पर असहाब अली ने कहा कि मैं धर्म के प्रति बड़ा प्रतिबद्ध हूं. मैं हाईस्कूल में जब पढ़ रहा था. तभी रामायण महाभारत, सुखसागर, विश्रामसागर सब मैं पढ़ चुका था और हिन्दु माइथालजी में जितनी कहानियां थीं, उसमें मैं पारगंत था. कोई बात किसी को खटकती थी तो वो मुझसे पूछता था. तब मेरे पुरोहित द्विवेदी जी ने कहा कि इसका मूल संस्कृत में है, तब मैं सस्कृत पढ़ने लगा. इंटर में मैने संस्कृत लिया, जिस कॉलेज में मैंने संस्कृत लिया 24 सालों में वहां कोई रिकार्ड नहीं तोड़ पाया था. मैं पहला था जिसने प्रथम स्थान प्राप्त करते हुए रिकॉर्ड तोड़ दिया. तब एक पर्चा छपा था, जिसमें लिखा था कि असहाब अली ने रिकॉर्ड तोड़ दिया, मोटे अच्छरों में लिखा था.

मुसलमान होकर भी संस्कृत में टॉप किया. गोरखपुर को भगवा गढ़ कहे जाने पर कभी उन्हें कोई दिक्कत तो नहीं हुई. बीएचयू में जो चल रहा है वो बहुत गलत हो रहा है. वो एक बड़ा अपराध है संस्कृत के खिलाफ, देश के खिलाफ, शिक्षण के खिलाफ.



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First published: November 20, 2019, 6:51 PM IST
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