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बड़ा सवालः गोरखपुर उपचुनाव में क्यों अदृश्य रही CM योगी की हिंदू युवा वाहिनी?

NAVEEN LAL SURI | News18Hindi
Updated: March 13, 2018, 10:29 AM IST
बड़ा सवालः गोरखपुर उपचुनाव में क्यों अदृश्य रही CM योगी की हिंदू युवा वाहिनी?
सीएम योगी आदित्यनाथ की फाइल फोटो.

योगी के मुख्यमंत्री बनने के बाद पिछले 11 महीनों में हिंदू युवा वाहिनी की सार्वजनिक या राजनीतिक अभिव्यक्तियां न के बराबर हैं और चुनाव में भी वह कहीं नहीं दिखाई दे रही है.

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गोरखपुर उपचुनाव के नतीजे के नतीजे 14 मार्च को आएंगे, लेकिन पिछले 16 सालों में सीएम योगी की राजनीतिक कैरियर में अह्म भूमिका निभाने वाली और गोरखपुर की सड़कों पर ताकत दिखाने वाली हिंदू युवा वाहिनी उपचुनाव प्रचार में पूरी तरह से नदारद रही. सबसे बड़ा सवाल है कि आखिर ऐसा क्यों हुआ?

कहा जाता है वर्ष 1999 के चुनाव में बेहद नजदीकी मुकाबले में जीत दर्ज करने के बाद योगी आदित्यनाथ ने गोरखपुर इलाके पर पैठ बनाने के लिए हिंदू युवा वाहिनी का गठन किया था, जो पार्टी के सांगठनिक ढांचे के साथ-साथ योगी की निजी फौज है और पिछले कई चुनावों से उनके लिए समर्पित भाव से जमीन तैयार करती आ रही है.

उल्लेखनीय है हिंदू युवा वाहिनी ने बहुत कम समय में पूर्वी उत्तर प्रदेश के तकरीबन हर हिस्से में अपना सांगठनिक ढांचा खड़ा करने में कामयाब रही, जिसका लाभ योगी को अपने हर चुनाव और अभियान में ठीक से मिलती रही है.

हालांकि सूबे के मुखिया बनने के बाद से सीएम योगी ने हिंदू युवा वाहिनी को एक सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन की लक्ष्मण रेखा के भीतर नियंत्रित कर दिया है. यही कारण है कि पिछले 11 महीनों में हिंदू युवा वाहिनी की सार्वजनिक या राजनीतिक अभिव्यक्तियां न के बराबर हैं और चुनाव में भी वह कहीं नहीं दिखाई दे रही है.

गोरखपुर चुनाव में वाहिनी की रही है अह्म भूमिका
हिंदू युवा वाहिनी के प्रदेश प्रभारी पीके मल्ल ने न्यूज18 हिंदी से बातचीत में हालांकि इससे इनकार किया है. उन्होंने बताया कि चुनाव से पहले संगठन की एक बैठक हुई थी. जिसमें यह निर्देश दिए गए थे कि चुनाव के दौरान हिंदू युवा वाहिनी के कार्यकर्ताओं को बीजेपी प्रत्याशी उपेन्द्र दत्त शुक्ल की जीत सुनिश्चित करने के लिए अपील की गई थी.

हिंदू युवा वाहिनी के प्रदेश प्रभारी पीके मल्ल की फाइल फोटो.
मल्ल बताते हैं कि चुनाव के दौरान कई बूथों पर हिंदू युवा वाहिनी के कार्यकर्ताओं को पोलिंग एजेंट भी बनाया गया था. वहीं, गोरखपुर उपचुनाव के दौरान वाहिनी के अदृश्य होने के सवाल पर मल्ल चुप्पी साध लिया.

बकौल मल्ल,  ऐसा नहीं है. पहले प्रदेश में हमारी सरकार नहीं थी, तो हम लोगों को लोकतांत्रिक तरीके से धरना प्रदर्शन करना पड़ता था. अब अपनी सरकार है तो कार्यकर्ता सरकार की योजनाओं को घर-घर तक पहुंचाने के लिए काम कर रहे है. इस चुनाव में भी हर कार्यकर्ता ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया.

सीएम योगी की भावनाओं से जुड़े हैं लोग
कभी सीएम योगी के साथ हनुमान की भूमिका में नज़र आने वाले हिंदू युवा वाहिनी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सुनील सिंह का मानना है कि गोरखपुर में चुनाव जाति के अधार पर कभी नहीं जीता जा सकता, यहां जब भी योगी आदित्यनाथ चुनाव लड़ते थे, तो लोग भावनाओं से जुड़कर योगी जी को वोट देते थे. वाहिनी के अदृश्य होने के सवाल पर सुनील सिंह दावे के साथ कहते है कि हिंदू युवा वाहिनी के कार्यकर्ताओं ने किनती मेहनत की है इसकी तस्वीर आने वाली 14 मार्च को साफ हो जाएगी.

गोरक्षनाथ पीठ का रहा है दबदबा
गोरखपुर सीट बीजेपी के लिए खासकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के लिए प्रतिष्ठा का सवाल है. योगी यहां से 5 बार सांसद चुने जा चुके हैं. 1952 में पहली बार गोरखपुर लोकसभा सीट के लिए चुनाव हुआ और कांग्रेस ने जीत दर्ज की. इसके बाद गोरक्षनाथ पीठ के महंत दिग्विजयनाथ 1967 में निर्दलीय चुनाव जीता. उसके बाद 1970 में योगी आदित्यनाथ के गुरु अवैद्यनाथ ने निर्दलीय जीत दर्ज की.

क्यों अह्म हैं उपचुनाव में जीत?
उपचुनाव के नतीजे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के लिए शायद सबसे ज्यादा अह्म हैं. यदि अपनी अगुवाई में वे जीत दिलाते हैं तो राष्ट्रीय राजनीति में उनके कद में जबरदस्त इजाफा होगा. देश के सबसे बड़े सूबे के मुख्यमंत्री बनने के बाद वैसे भी पार्टी ने उन्हें गुजरात, त्रिपुरा और कर्नाटक जैसे दूरवर्ती क्षेत्रों में भी स्टार प्रचारक के बतौर भेजा है.

उपचुनाव में मिली जीत उन्हें पार्टी में और ताकतवर नेता का दर्जा देगी और राष्ट्रीय स्तर पर खासतौर पर 2019 की चुनावी रणनीति में मोदी और शाह के बाद शायद पार्टी के वो सबसे चमकीले चेहरे के तौर पर पहचाने जाएंगे.

निषाद बाहुल्य क्षेत्र
गोरखपुर संसदीय क्षेत्र में गैर-यादव ओबीसी खासकर निषाद समुदायों का बाहुल्य है. इस तथ्य को ध्यान में रखकर गोरखपुर में समाजवादी पार्टी ने बीजेपी के उम्मीदवार और पूर्वांचल में ब्राह्मण चेहरा उपेंद्र दत्त शुक्ला के खिलाफ प्रवीण निषाद को मैदान में उतारा है. प्रवीण निषाद, निषाद पार्टी के अध्यक्ष संजय निषाद के पुत्र हैं.

5 विधानसभा सीटों पर भाजपा का कब्ज़ा
गोरखपुर में 19 लाख मतदाताओं में से आधे से कुछ अधिक जनसंख्या पिछड़ी जातियों के हैं. दलितों की भी गोरखपुर और फूलपुर दोनों में काफी संख्या है. वर्तमान समय में गोरखपुर में पड़ने वाली सभी 5 विधानसभा सीटों पर भाजपा का कब्ज़ा है. इसके अलावा योगी आदित्यनाथ की इस क्षेत्र में काफी पकड़ है. इसे देखते हुए बीजेपी के जीतने की संभावनाएं प्रबल है, लेकिन जीत के अंतर में वोटों की संख्या बीजेपी के लिए निराशाजनक हो सकती है.

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First published: March 13, 2018, 10:29 AM IST
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