Analysis: गोरखपुर सीट पर कोई रिस्क लेने को तैयार नहीं योगी, इस मास्टर प्लान के सहारे देंगे गठबंधन को पटखनी

2009 में योगी आदित्यनाथ ने बीएसपी के विनय शंकर तिवारी को 22000 से ज्यादा वोटों से हराया. 2014 में योगी ने ये सीट एसपी के राजमती निषाद से तीन लाख से ज्यादा वोटों से जीती.

Anil Rai | News18 Uttar Pradesh
Updated: April 13, 2019, 11:43 PM IST
Analysis: गोरखपुर सीट पर कोई रिस्क लेने को तैयार नहीं योगी, इस मास्टर प्लान के सहारे देंगे गठबंधन को पटखनी
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ
Anil Rai
Anil Rai | News18 Uttar Pradesh
Updated: April 13, 2019, 11:43 PM IST
उत्तर प्रदेश की सबसे चर्चित सीट गोरखपुर पर बीजेपी (BJP) अब तक अपने उम्मीदवार की घोषणा नहीं कर पाई है. परम्परागत लोकसभा सीट होने के कारण इस सीट पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है. उपचुनाव में बीजेपी की हार के बाद से इस सीट के बहाने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर लगातार हमले हुए. ऐसे में इस चुनाव में योगी इस सीट पर कोई रिस्क लेना नहीं चाहते हैं. लेकिन सवाल ये है कि आखिर एक उप-चुनाव में ही ऐसा क्या हो गया कि ये परम्परागत लोकसभा सीट खतरे में आ गई, क्या इसका कारण एसपी-बीएसपी गठबंधन है या कुछ और?

इस कारण को तलाशने के लिए गोरखपुर लोकसभा सीट और योगी आदित्यनाथ के राजनीतिक इतिहास को खंगालना होगा. बात करें योगी आदित्यनाथ के पहले लोकसभा चुनाव की तो 1998 में हुए इस चुनाव में उनका मुकाबला समाजवादी पार्टी के यमुना प्रसाद निषाद से था. योगी ये चुनाव तो जीए गए लेकिन जीत का अंतर था 26206 वोट. इसके एक साल बाद 1999 में भी योगी के मुकाबले में यमुना प्रसाद निषाद ही थे और इस बार जीत का अंतर रहा सिर्फ 7339 वोट. 2004 के लोकसभा चुनाव में भी योगी ने इस सीट से फिर यमुना प्रसाद निषाद को हाराया और अंतर बढ़कर हो गया 1,42,309 वोट.



2009 में योगी आदित्यनाथ ने बीएसपी के विनय शंकर तिवारी को 22000 से ज्यादा वोटों से हराया. 2014 में योगी ने ये सीट एसपी के राजमती निषाद से तीन लाख से ज्यादा वोटों से जीती. इन आंकड़ों के ये आंकड़े बताते हैं कि योगी लगातार मजबूत हो रहे हैं लेकिन इसका एक दूसरा पहलू भी है. जब-जब मैदान में योगी के खिलाफ अकेला निषाद उम्मीदवार रहता है तो जीत का अंतर बहुत कम हो जाता है. लेकिन अगर निषाद अकेला है तो मुकबला कांटे का हो जाता है.

File Photo


2004 और 2014 दोनों चुनावों में निषाद उम्मीदवार से जीत का अंतर इसलिए बढ़ा क्योंकि दोनों चुनाव में बीएसपी ने भी निषाद उम्मीदवार मैदान में उतारा था. इस बार एसपी-बीएसपी गठबंधन ने पहले ही निषाद उम्मीदवार मैदान में उतारकर कर योगी आदित्यनाथ को इस सीट पर सीधी चुनौती दी है.

बात करें इस सीट के जातीय गणित की तो यहां करीब उन्नीस लाख मतदाताओं में सबसे ज्यादा करीब लाख से ज्यादा निषाद वोटर हैं. 
गोरखपुर के वरिष्ठ पत्रकार संतोष सिंह का मानना है कि उप चुनाव की हार के बाद गोरखपुर के सबसे बड़े वोट बैंक निषाद को बीजेपी के पाले में लाने के लिए योगी आदित्यनाथ ने कई बड़े राजनीतिक दांव खेले हैं. जिनमें अपने सबसे पुराने प्रतिद्वंदी यमुना प्रसाद निषाद की पत्नी और बेटे को बीजेपी में शामिल करा लिया है. साथ ही उप चुनाव में पटकनी देने वाले निषाद पार्टी के साथ गठबंधन कर लिया.


संतोष सिंह का दावा है कि बीजेपी पिपराइच से विधायक और ओबीसी नेता महेन्द्र पाल को टिकट दे सकती है. तय डील के तहत बीजेपी महेन्द्र पाल की खाली सीट पर यमुना निषाद के बेटे को विधानसभा उप चुनाव में उतारेगी. जबकि गोरखपुर के सांसद प्रवीण निषाद को भदोही से टिकट दिया जा सकता है और उनके पिता निषाद पार्टी के अध्यक्ष डॉक्टर संजय निषाद को राज्यसभा भेजा जा सकता है. यानी योगी के मास्टर प्लान के हिसाब से निषाद वोटर पूरी तरह बीजेपी के पाले में है और ओबीसी उम्मीदवार ओबीसी वोट की भी अपने पाले में कर लेना चाहते हैं. तैयारियों से साफ है मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इस सीट पर इस बार कोई चांस नहीं लेना नहीं चाहते हैं.ये भी पढ़ें:

मेनका के 'मुस्लिम मतदाता' वाले बयान पर हेमा का पलटवार, बोलीं- इस तरह की भावना मुझमें नहीं

चाय बांटकर PM मोदी के हमशक्ल ने किया लखनऊ से 2019 के जीत का दावा

वाराणसी से PM मोदी के खिलाफ प्रियंका को उतारने की सोच रही है कांग्रेस- सूत्र

एक क्लिक और खबरें खुद चलकर आएंगी आपके पास, सब्सक्राइब करें न्यूज़18 हिंदी WhatsApp अपडेट्स
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर

News18 चुनाव टूलबार

चुनाव टूलबार