Gorakhpur Election Result 2019: योगी के गढ़ में बड़ी जीत की तरफ बढ़ रहे रवि किशन

चुनाव आयोग द्वारा जारी की गई डिटेल के अनुसार रवि किशन अब तक 249993 वोट हासिल कर चुके हैं, वहीं उनके निकटतम प्रतिद्वंदी गठबंधन प्रत्याशी राम भुआल निषाद 148498 वोट लेकर दूसरे नंबर पर चल रहे हैं.

News18 Uttar Pradesh
Updated: May 23, 2019, 12:13 PM IST
Gorakhpur Election Result 2019: योगी के गढ़ में बड़ी जीत की तरफ बढ़ रहे रवि किशन
चुनाव प्रचार करते रवि किशन
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Updated: May 23, 2019, 12:13 PM IST
लोकसभा चुनाव 2019 में मतगणना जारी है. यूपी की हाईप्रोफाइल सीटों में से एक गोरखपुर सीट से खबर आ रही है कि बीजेपी प्रत्याशी रवि किशन 1 लाख वोटों से आगे चल रहे हैं. चुनाव आयोग द्वारा जारी की गई डिटेल के अनुसार रवि किशन अब तक 249993 वोट हासिल कर चुके हैं, वहीं उनके निकटतम प्रतिद्वंदी गठबंधन प्रत्याशी राम भुआल निषाद 148498 वोट लेकर दूसरे नंबर पर चल रहे हैं.

बता दें बहुत तलाशने के बाद उत्तर प्रदेश की गोरखपुर सीट पर भारतीय जनता पार्टी ने भोजपुरी सुपरस्टार रविकिशन को लड़ाई में उतार दिया. सीट मिलने के बाद रवि किशन लगातार चुनाव प्रचार में व्यस्त हैं और अपनी जीत को लेकर आश्ववस्त नजर आ रहे हैं. वो अपने हर बयान में योगी आदित्यनाथ का जिक्र जरूर करते हैं क्योंकि वो जानते हैं कि इस शहर गोरक्ष मठ का कितना जबरदस्त प्रभाव है. इस प्रभाव की वजह से 1989 से लेकर 2018 तक कोई पार्टी बीजेपी के इस किले को भेद नहीं पाई. 1989 के बाद से यह दूसरी बार है जब मठ के बाहर का कोई आदमी चुनाव मैदान में है. 2018 में हुए उपचुनाव में भी बीजेपी ने उपेंद्र शुक्ला को मैदान में उतारा था. उन्हें प्रवीण निषाद के हाथों हार का सामना करना पड़ा था. हालांकि जीत का अंतर कोई बड़ा नहीं था लेकिन इस सीट पर बीजेपी की हार के बड़े सांकेतिक मायने थे.

लेकिन उस समय एसपी-बीएसपी के सहयोग से चुनाव जीते प्रवीण निषाद का बाद अखिलेश यादव से विवाद बढ़ा तो उन्होंने एनडीए का रुख कर लिया. अब प्रवीण निषाद को संतकबीर नगर की सीट दे दी गई है और बीजेपी ने यही सीट अपने पास रख ली. एसपी-बीएसपी गठबंधन की तरफ से यहां रामभुआल निषाद हैं. समाजवादी पार्टी में रामभुवल को निषाद समुदाय के चेहरे के तौर पर देखा जाता है. माना जा रहा है कि गठबंधन ने यह दांव निषाद पार्टी के बीजेपी की तरफ जाने की वजह से चला है.

कांग्रेस ने भी इस सीट पर एक स्थानीय ब्राह्मण प्रत्याशी खड़ा किया है. पार्टी ने वरिष्ठ अधिवक्ता मधुसूदन तिवारी पर दांव लगाया है. मधुसूदन उत्तर प्रदेश बार काउंसिल के सदस्य हैं. मधुसूदन वकालत पेशे में करीब 40 वर्ष से हैं. ये उनका पहला राजनीतिक चुनाव होगा. कहा जा रहा है कि कांग्रेस के इस ब्राह्मण कार्ड से बीजेपी प्रत्याशी रविकिशन के मुश्किल उठानी पड़ सकती है. ब्राह्मण मतों का बिखराव हो सकता है.

लोकसभा सीट का इतिहास- कब कौन जीता

देश में 1951-52 में पहली बार लोकसभा चुनाव हुए. तब गोरखपुर ज़िले और आसपास के ज़िलों को मिलाकर 4 सांसद चुने जाते थे. 1951-52 में गोरखपुर दक्षिण से सिंहासन सिंह कांग्रेस के सांसद चुने गए. यही सीट बाद में गोरखपुर लोकसभा सीट बनी. 1957 में गोरखपुर लोकसभा सीट से दो सांसद चुने गए. सिंहासन सिंह दूसरी बार सांसद बनें और दूसरी सीट कांग्रेस के महादेव प्रसाद ने जीती.

इसी कड़ी में 1962 के लोकसभा चुनाव में गोरखनाथ मंदिर ने चुनाव में दस्तक दी. गोरक्षापीठ के महंत ब्रह्मलीन दिग्विजय नाथ हिंदू महासभा के टिकट पर मैदान में उतरे. उन्होंने कांग्रेस के सिंहासन सिंह को कड़ी टक्कर दी लेकिन 3,260 वोटों से हार गए. सिंहासन सिंह लगातार तीसरी बार सांसद बनें. 1967 में दिग्विजय नाथ निर्दलीय चुनाव लड़ें और कांग्रेस के विजय रथ को रोक दिया. दिग्विजय नाथ 42,000 से ज्यादा वोटों से चुनाव जीते.
योगी आदित्यनाथ के गुरु महंत अवैद्यनाथ


1969 में दिग्विजय नाथ का निधन हो गया जिसके बाद 1970 में उपचुनाव हुआ. दिग्विजय नाथ के उत्तराधिकारी और गोरक्षपीठ के महंत ब्रह्मलीन अवैद्यनाथ ने निर्दलीय चुनाव लड़ा और सांसद बने. 1971 में फिर से कांग्रेस ने इस सीट पर वापसी की. कांग्रेस के नरसिंह नरायण पांडेय चुनाव जीते. वहीं निर्दलीय अवैद्यनाथ चुनाव हार गए.

1977 में इमरजेंसी के बाद हुए चुनाव में भारतीय लोकदल के हरिकेश बहादुर चुनाव जीते. कांग्रेस के नरसिंह नरायण पांडेय चुनाव हार गए, वहीं अवैद्यनाथ लड़े ही नहीं. 1980 के चुनाव से पहले हरिकेश बहादुर कांग्रेस में चले गए. कांग्रेस ने सत्ता में वापसी की और हरिकेश बहादुर कांग्रेस के टिकट पर दूसरी बार सांसद बने.

1984 के लोकसभा चुनाव से पहले हरिकेश लोकदल में चले गए. लेकिन इस बार पार्टी बदलने के बावजूद वे चुनाव नहीं जीत सके. कांग्रेस ने मदन पांडेय को चुनाव लड़ाया और मदन जीतकर सांसद बनें. 1989 के चुनाव में राम मंदिर आंदोलन के दौरान गोरखनाथ मंदिर के मंहत अवैद्यनाथ फिर से चुनावी मैदान में उतर गए और हिंदू महसभा के टिकट पर अवैद्यनाथ दूसरी बार सांसद बने.

1991 की रामलहर में अवैद्यनाथ बीजेपी में शामिल होकर चुनाव लड़े और फिर सांसद बने. 1996 में अवैद्यनाथ फिर बीजेपी से लगातार तीसरी बार सांसद बने. 1998 में मंदिर के योगी और अवैद्यनाथ के उत्तराधिकारी युवा योगी आदित्यनाथ पहली बार सांसद बने. तब योगी सबसे कम उम्र के सासंद थे.

1999, 2004, 2009 और 2014 में लगातार पांच बार योगी गोरखपुर से बीजेपी के टिकट पर सांसद चुने गए. मार्च 2017 में यूपी के सीएम चुने जाने के बाद उन्होंने सांसद पद से त्याग पत्र दे दिया.

कौन सी पार्टी कितनी बार जीती

gorakhpur

अब तक हुए 16 लोकसभा चुनावों और एक उपचुनाव में बीजेपी ने सात बार, कांग्रेस ने छह बार, निर्दलीय ने दो बार, हिंदू महासभा ने एक बार और भारतीय लोकदल ने एक बार जीत दर्ज की. सपा (समाजवादी पार्टी) और बसपा (बहुजन समाज पार्टी) इस सीट पर खाता भी नहीं खोल सके हैं.

योगी ने तीन लाख से जीत हासिल की थी

2014 के वोटिंग और नतीजों के समीकरण को देखें तो उस दौरान कुल 10 लाख 40 हजार 199 मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया था. 2014 के लोकसभा चुनाव में योगी आदित्यनाथ को 5 लाख 39 हजार 127 वोट मिले थे. सपा उम्मीदवार राजमति निषाद को 2 लाख 26 हजार 344 वोट मिले, वहीं बसपा प्रत्याशी राम भुअल निषाद को 1 लाख 76 हजार 412 वोट मिले थे. इसके अलावा कांग्रेस को महज 45 हजार 719 वोट मिले थे. योगी ने इस सीट को 3 लाख 12 हजार 783 वोटों से जीत दर्ज किया था.

2009 के लोकसभा चुनाव में गोरखपुर में 44.13 फीसदी वोट पड़े थे. बीजेपी उम्मीदवार योगी को 4 लाख 3 हजार 156 वोट, बसपा को 1 लाख 82 हजार 885 वोट, सपा को 83 हजार 59 वोट और कांग्रेस को महज 30 हजार वोट मिले थे.

गोरखपुर की जनसंख्या (2011 की जनगणना के अनुसार)

गोरखपुर के जातीय गणित को यदि देखा जाए तो यहां 19.5 लाख वोटरों में से 3.5 लाख वोटर निषाद समुदाय के हैं. इस संसदीय क्षेत्र में निषाद जाति के सबसे अधिक मतदाता हैं. यादव और दलित मतदाता दो-दो लाख हैं. ब्राह्मण वोटर करीब डेढ़ लाख हैं. यदि चुनाव में निषाद, यादव, मुसलमान और दलित एकजुट हो जाते हैं तो चुनाव परिणाम चौंका भी सकते हैं.

स्थानीय मुद्दे:

वैसे तो लोकसभा चुनाव देश के मुद्दे पर लड़ा जाता है लेकिन स्थानीय मुद्दों का भी महत्व होता है. 2014 में विकास के मुद्दे पर चुनाव लड़ा गया था. लेकिन लखनऊ का मुद्दा था रोजाना का लगने वाला जाम, सुरक्षा, सड़क, बिजली पानी, अनियमित कॉलोनियों का नियमितीकरण आदि. हालांकि जाम से निजात दिलाने के लिए शहर को स्वच्छ बनाने के लिए भी कई कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं. वहीं शहर की ट्रैफिक व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए सरकार नए-नए प्लान तैयार कर रही है.

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