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यूपी के इस शहर में 'नवजात' भी अपने खून से करते हैं मां दुर्गा का अभिषेक

गोरखपुर के बांसगांव क्षेत्र में मां दुर्गा को रक्त देते बच्चे.

गोरखपुर के बांसगांव क्षेत्र में मां दुर्गा को रक्त देते बच्चे.

गोरखपुर जिले से 40 किमी दूर बांसगांव क्षेत्र में यह दुर्गा मंदिर स्थित है. इस मंदिर में यूं तो हर समय भक्तों की भीड़ लगी रहती है, पर शारदीय नवरात्र की रामनवमी को यहां हजारों क्षत्रिय जुटते हैं.

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गोरखपुर. उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में नवरात्र पर एक ऐसी परंपरा निभाई जाती है, जिसमें माताएं खुद नवजात का रक्त मां दुर्गा को चढ़ाती हैं. गोरखपुर जिले के बांसगांव इलाके के लोगों की मान्यता है कि मां दुर्गा नवरात्र में नवजात के रक्त से ही प्रसन्न होती हैं और अपनी कृपा बनाए रखती हैं. यहां पर हर साल नवरात्रि की नवमी तिथि को पूरे इलाके के हजारों क्षत्रिय दुर्गा मंदिर में अपने शरीर का रक्त मां को चढ़ाते हैं. बता दें कि रामनवमी के दिन नवजात बच्चे से लेकर 100 साल तक के बुजुर्गों तक के शरीर के पांच जगहों से रक्त निकालकर मां दुर्गा को चढ़ाया जाता है.

गोरखपुर जिले से 40 किमी दूर बांसगांव क्षेत्र में यह दुर्गा मंदिर स्थित है. इस मंदिर में यूं तो हर समय भक्तों की भीड़ लगी रहती है, पर शारदीय नवरात्र की रामनवमी को इस इलाके के हजारों क्षत्रियों का इस मंदिर में जमावड़ा होता है और शुभ मुहुर्त के बाद हर व्यक्ति के शरीर से रक्त निकाला जाता है और मां को चढ़ाया जाता है. चाहे 15 दिन का नवजात हो या फिर 100 साल का बुजुर्ग, सभी अपना रक्त मां को चढ़ाते हैं.

खून से मां का अभिषेक
खून से मां दुर्गा का अभिषेक.




मां दुर्गा की कृपा बने रहने की है मान्‍यता
हर साल हजारों लोगों के शरीर से रक्त निकालकर मां को चढ़ाया जाता है. एक ही उस्तरे से सभी श्रद्धालुओं के शरीर को काटा जाता है और निकले रक्त को बेलपत्र के ऊपर लगाकर इस मंदिर में चढ़ाया जाता है. यहां के लोग मानते हैं कि रक्त चढ़ाने से मां खुश होती हैं और उनका परिवार निरोग और खुशहाल रहता है. सैकड़ों सालों से बांसगाव में चली आ रही इस परंपरा का निर्वाह आज की युवा पीढ़ी भी उसी श्रद्धा से करती है जैसे उनके पुरखे किया करते थे. सभी का मानना है कि क्षत्रियों का लहू चढ़ाने से मां दुर्गा की कृपा उन पर बनी रहती है.

सैकड़ों वर्षों से चली आ रही परंपरा


रक्त चढ़ाने के बारे में दुर्गा मंदिर के पुजारी श्रवण कुमार पाण्डेय का कहना है कि सैकड़ों सालों से इस परंपरा का निर्वहन श्रीनेत वंश के क्षत्रिय करते आ रहे हैं. परंपरा की मान्यता को लेकर पुजारी का कहना है कि कई सालों पहले यहां जानवरों की बलि दी जाती थी. ऐसे में जानवरों की बलि को रोकने के लिए उस वक्त संत ने क्षत्रिय समाज से अपील की थी. साथ ही जानवर की बलि देने के बदले खुद के शरीर से निकले करने का सुझाव दिया था, जिसके बाद से इस अनोखी परंपरा की नींव पड़ी थी.

(रिपोर्ट: रामगोपाल द्विवेदी)

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