BJP के लिए उपचुनाव में हार के क्या हैं मायने?

इन उपचुनाव के नतीजों की कई तरह से राजनीतिक व्याख्याएं की जा सकतीं हैं- कुछ लोग मुद्दों को ज़िम्मेदार ठहराएंगे जबकि कुछ लोग ब्राह्मण-ठाकुर वाले जातीय समीकरण का भी हवाला दे सकते हैं. हालांकि इसे 39 बनाम 44 प्रतिशत की लड़ाई कहना सबसे बेहतर है.

News18Hindi
Updated: March 15, 2018, 11:32 AM IST
BJP के लिए उपचुनाव में हार के क्या हैं मायने?
इन उपचुनाव के नतीजों की कई तरह से राजनीतिक व्याख्याएं की जा सकतीं हैं- कुछ लोग मुद्दों को ज़िम्मेदार ठहराएंगे जबकि कुछ लोग ब्राह्मण-ठाकुर वाले जातीय समीकरण का भी हवाला दे सकते हैं. हालांकि इसे 39 बनाम 44 प्रतिशत की लड़ाई कहना सबसे बेहतर है.
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Updated: March 15, 2018, 11:32 AM IST
अमिताभ अग्निहोत्री 

गोरखपुर और फूलपुर विधानसभा उपचुनावों के नतीजे आ चुके हैं और ये हार बीजेपी के लिए बेहद अहम इसलिए है क्योंकि इनमें से एक सीट सीएम योगी और दूसरी डिप्टी सीएम की थी. इस उपचुनाव के नतीजों की कई तरह से राजनीतिक व्याख्याएं की जा सकतीं हैं- कुछ लोग मुद्दों को ज़िम्मेदार ठहराएंगे जबकि कुछ लोग ब्राह्मण-ठाकुर वाले जातीय समीकरण का भी हवाला दे सकते हैं. हालांकि इसे 39 बनाम 44 प्रतिशत की लड़ाई कहना सबसे बेहतर है.

क्या हुआ है फूलपुर-गोरखपुर में
बहरहाल यहां जो सबसे अहम बात गौर करने लायक है उसे समझने के लिए हमें सबसे पहले साल 1993 याद करना होगा. ये वो साल था जब पहली बार समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने साथ मिलकर चुनाव लड़ा था. ये वो वक़्त था जब उत्तर प्रदेश में बड़ा सामाजिक आधार रखने वाली सपा की अगुवाई मुलायम सिंह यादव और बसपा का नेतृत्व कांशीराम के हाथ में था. उस वक़्त भी बीजेपी राज्य में सिंगल लार्जेस्ट पार्टी तो थी लेकिन सरकार सपा-बसपा ने ही बनाई थी.

इस चुनाव को 44% बनाम 39% की तरह भी देखा जा सकता है. बीजेपी ने यूपी में अब तक अपना जो सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया है वो साल 2017 के विधानसभा चुनाव ही थे. इन चुनावों में बीजेपी को 39.7% जबकि सपा को 22.2 और बसपा को 21.8% वोट मिले थे. इन्हीं चुनावों में कांग्रेस ने 6.3% वोट हासिल किए थे. ये वो चुनाव था जब सपा-बसपा ने अपने राजनीतिक करियर का सबसे बुरा प्रदर्शन किया था. इसे ऐसे समझा जा सकता है कि बीजेपी अपने सबसे अच्छे दिनों में 39% से आगे नहीं बढ़ सकती जबकि अपने बुरे दिनों में भी सपा-बसपा 44% वोट बैंक के साथ मिलकर उस पर भारी हैं.



बिहार से मिली सीख
बिहार ने भी देश के सामने ऐसा ही उदाहरण पेश किया था. वहां राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी), जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) और कांग्रेस ने मिलकर मोदी लहर को पराजित कर दिया था. ये गठजोड़ का काफी पहले से अजमाया हुआ नुस्खा है. किसी भी राज्य में अगर अलग-अलग सामजिक आधार वाली राजनीतिक पार्टियां गठबंधन कर लें तो सारी हवा उलटी बहने लगती है. बिहार की ही तरह यहां भी कहा जा रहा था कि धुर विरोधी सपा-बसपा के कार्यकर्ता ग्राउंड पर साथ काम नहीं कर पाएंगे लेकिन मायावती ने इन सभी कयासों को गलत साबित कर दिया.

मायावती अभी चुकी नहीं हैं
इन उपचुनावों में सपा को समर्थन देने के बाद सबसे बड़ी चुनौती बसपा सुप्रीमो मायावती के सामने थी. 2017 के नतीजों के बाद से ही बसपा और मायावती के भविष्य पर लगातार सवाल उठाए जा रहे थे. ऐसे में इन चुनावों में ये तय हो जाना था कि मायावती के पास अभी भी अपना वोट बैंक ट्रांसफर करने की ताकत बची है या नहीं ? इन नतीजों ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि मायावती देश की एक अकेली ऐसी नेता हैं जिनके पास अब भी अपना वोट बैंक ट्रांसफर कराने की ताकत बची हुई है. मायावती ने साबित कर दिया है कि बसपा का चेहरा नसीमुद्दीन जैसे नेता कभी नहीं थे, या फिर सपा में चेहरा शिवपाल नहीं बल्कि अखिलेश ही हैं.

कांग्रेस साथ आ गई तो मुश्किलें बढ़ेंगी
इन उपचुनावों में अकेले लड़कर कांग्रेस ने ये चेक कर लिया है कि यूपी में फ़िलहाल उसके पास कितनी ज़मीन बची हुई है. इन नतीजों ने ये साफ़ कर दिया है कि कांग्रेस फिलहाल यूपी में अपने पांव पर चलने लायक पार्टी नहीं बन पाई है. अब जबकि कांग्रेस के सामने उसकी स्थिति स्पष्ट हो गई है तो 2019 के लोकसभा चुनावों के लिए सपा-बसपा-कांग्रेस एक गठबंधन के तौर पर बीजेपी के लिए मुश्किलें पैदा कर सकते हैं. कांग्रेस बुरी से बुरी स्थिति में यूपी में 7% वोट हासिल कर ही लेती है. कांग्रेस के साथ आने के बाद इस गठबंधन के हिस्से 51% वोट बैंक हो जाएगा. ऐसा हुआ तो यूपी की कुछ सीटें छोड़कर बाकी सब पर ये गठबंधन अजेय साबित होगा.

कितना हुआ नुकसान
इस हार से जो राजनैतिक संदेश गया है वो बीजेपी के लिए मुश्किलें बढ़ाने वाला है. सीएम और डिप्टी सीएम की सीट हारने के बाद अब यूपी में बीजेपी की स्थिति 'फेसलेस' जैसी हो गई है. इसे योगी सरकार पर मैंडेट तो नहीं माना जा सकता लेकिन इससे उनका कद तो कम होगा ही. इसके आलावा यूपी में 80 लोकसभा सीटें होने के चलते 2019 के नज़रिए से इन रिजल्ट्स के बाद बीजेपी की राह बेहद कठिन हो गई है. कांग्रेस-सपा-बसपा का गठबंधन 50% से ज्यादा वोट शेयर रखता है और बीजेपी 39% से ज्यादा जाएगी ऐसा होना मुमकिन नज़र नहीं आ रहा.

बीजेपी के पास क्या हैं विकल्प ?
2019 की लड़ाई के लिए बीजेपी के पास यूपी में गठबंधन का कोई विकल्प फिलहाल मौजूद नहीं है. ऐसे में सवाल खड़ा होता है कि 2019 में बीजेपी आखिर करेगी क्या ? यूपी में सपा और बसपा का सामना करने के लिए उसके पास सिर्फ सोशल इंजीनियरिंग का विकल्प बचा है. सपा के मामले में बात करें तो यूपी के OBC वोट बैंक का एक बड़ा हिस्सा उसके पास आता है. इस वोट बैंक में 70 से 80 जातियां शामिल हैं जिसमें सबसे बड़ा हिस्सा यादवों का है. बीजेपी के पास एक ही ऑप्शन है कि वो सपा के हिस्से जाने वाली गैर-यादव जातियों को अपने पाले में ले आए. इसी तरह बसपा से निपटने के लिए दलित अंब्रेला में शामिल 40-50 जातियों में से गैर-जातव जातियों को तोड़ ले. ये करने से सपा-बसपा का वोट शेयर कम हो सकता है जिसका सीधा फायदा बीजेपी को होना तय है. अगर ऐसा नहीं हो पाया तो 2019 में इस गठबंधन से लड़ना बेहद मुश्किल होगा.

नहीं चला अतीक अहमद वाला फ़ॉर्मूला
मिली जानकारी के मुताबिक इस बार फूलपुर में बीजेपी ने ही पीछे से अतीक अहमद को सपोर्ट दिया हुआ था लेकिन ये भी कुछ ख़ास कमाल नहीं दिखा पाया. अगर अतीक से जैसी उम्मीद थी कि वो एक लाख के आस-पास वोट काट लेंगे वैसा हो जाता तो चुनाव का नतीजा कुछ और होता. इससे ये भी साफ़ हो जाता है कि फूलपुर के मुस्लिम मतदाता में भी अखिलेश-मायावती के साथ आने से बीजेपी को हराए जाने की उम्मीद पैदा हो गई थी और उन्होंने इसे विनिंग कॉम्बिनेशन मानकर वोट दिया. 2017 के विधानसभा चुनावों में भी वोट परसेंट और समीकरण यही थे बस उस वक़्त सपा-बसपा के अलग चुनाव लड़ने का फायदा बीजेपी को मिला था.

राज्यसभा चुनाव पर भी पड़ेगा असर
यूपी की 10 सीटों पर चुनाव हैं जिसमें 8 पर बीजेपी और 1 पर सपा तय है. बाकी बची एक सीट पर एसपी और कांग्रेस के समर्थन से बीएसपी के उम्मीदवार भीमराव अंबेडकर का जीतना गोरखपुर-फूलपुर नतीजों के बाद अब तय माना जा रहा है. यूपी में एक राज्यसभा सीट जीतने के लिए 37 वोट चाहिए. बीएसपी के 19 विधायक हैं और उसे 18 और चाहिए. सपा के 47 विधायक हैं और जया बच्चन को वोट देकर उसके दस वोट बचते हैं. सपा ने पहले बीएसपी को समर्थन का ऐलान कर दिया. कांग्रेस के सात और आरएलडी के एक विधायक का वोट मिला कर बसपा उम्मीदवार की जीत तय है. हालांकि बीजेपी के पास अपने उम्मीदवारों को जिताने के बाद 28 वोट बचते हैं. वो फिलहाल चार निर्दलीयों के समर्थन और कुछ विधायकों की क्रॉस वोटिंग से आस लगाए हुए थी जो कि अब पूरी होती नज़र नहीं आ रही है.

(लेखक ETV ग्रुप के एक्जीक्यूटिव एडिटर हैं)

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