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मकर संक्रांति विशेष: नेपाल की सुख-शांति के लिए गोरखनाथ को चढ़ाई जाती है खिचड़ी, जानिये क्या है पूरी कहानी....

News18 Uttar Pradesh
Updated: January 14, 2020, 3:38 PM IST
मकर संक्रांति विशेष: नेपाल की सुख-शांति के लिए गोरखनाथ को चढ़ाई जाती है खिचड़ी, जानिये क्या है पूरी कहानी....
मकर संक्रांति के मौके पर गोरखनाथ मंदिर पूरी तरह से तैयार है

नेपाल व भारत के संबंधों (Indo-Nepal relations) को लेकर ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ (Mahant Digvijay Nath) की विशेष भूमिका रही है. नेपाल के साथ मंदिर और राजनीति के बीच गुरु-शिष्य का रिश्ता है. नेपाल की मुद्रा में गुरु गोरक्षनाथ की कटार अंकित है. यह कटार उन्होंने पृथ्वी नारायण शाह को दी थी. इसके पूर्व मुद्रा पर गुरु गोरक्षनाथ का खड़ाऊं अंकित रहता था.

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गोरखपुर. मकर संक्राति (Makar Sankranti) से जुड़ी यूं तो कई कहानियां हैं, लेकिन गोरखपुर (Gorakhpur) की गोरक्षनाथ पीठ की खिचड़ी का विशेष महत्व है. बता दें कि मकर संक्रांति के दिन गोरक्षपीठाधीश्वर (Gorakshpithadhishwar) को पहली खिचड़ी (khichdi) गोरखनाथ पीठ (Gorakhnath Peeth) के महंत की तरफ से अर्पित की जाती है. उसके बाद नेपाल नरेश (Nepal Naresh) की ओर से भेजी गई खिचड़ी और विशेष प्रसाद बाबा गोरक्षनाथ को चढ़ाया जाता है. नेपाल के राजपुरोहित उस खिचड़ी को लेकर गोरखपुर आते हैं.

विशेष प्रसाद में महारोट का चढ़ावा
गोरक्षपीठ नेपाल की सुख-शांति के लिए मकर संक्रांति पर महारोट का प्रसाद भेजता है. महारोट को बनाने की विशेष विधि होती है, आटा और ड्राई-फ्रूट से बनाए जाने वाले इस महाप्रसाद को गोरक्षपीठ के साधु-संत बनाते हैं. साधु-संतों को छोड़कर अन्य कोई भी व्यक्ति प्रसाद को नहीं बना सकता है. यही विशेष प्रसाद होता है और ये विशेष प्रसाद नेपाल नरेश को भेजा जाता है.

राजतंत्र समाप्ति के बाद भी जारी है परंपरा

मकर संक्रांति पर नेपाल में राजशाही की समाप्ति के बाद भी यह गुरु-शिष्य की परंपरा आज भी जारी है. नेपाल व भारत के संबंधों को लेकर ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ की विशेष भूमिका रही है. नेपाल के साथ मंदिर और राजनीति के बीच गुरु-शिष्य का रिश्ता है. नेपाल की मुद्रा में गुरु गोरक्षनाथ की कटार अंकित है. यह कटार उन्होंने पृथ्वी नारायण शाह को दी थी. इसके पूर्व मुद्रा पर गुरु गोरक्षनाथ का खड़ाऊं अंकित रहता था. इसके अलावा गुरु गोरक्षनाथाय नम: अंकित रहता है. गुरु गोरक्षनाथ नेपाल में राष्ट्रगुरु के रूप में प्रतिष्ठित हैं. कई स्थानों पर गोरक्षनाथ का मंदिर भी हैं. नेपाल में हिन्दू राष्ट्र को लेकर चल रहे आंदोलन में भी मंदिर उनके साथ खड़ा है.

क्या कहती हैं कहानियां ?
नेपाल नरेश और गोरक्षपीठ के संबंधों के बारे में नाथ संप्रादय के बारे में रिसर्च करने वाले डॉ. प्रदीप राव बताते हैं कि लोकश्रुतियों के अनुसार 'नेपाल के छोटे से भू-भाग के राजा नरभूपाल शाह और रानी कौशल्यावती के पुत्र राजकुमार पृथ्वी नारायण शाह थे. राजमहल के निकट ही गुरु गोरक्षनाथ की गुफा थी. राजा ने राजकुमार को मना किया था कि गुफा में न जाना लेकिन गए तो वहां के योगी जो भी कहें उसे मना न करना. एक दिन उत्सुकतावश राजकुमार गुफा में पहुंच गए वहां गुरु ने दही की मांग की. राजकुमार अपने मां-पिता संग दही लेकर गुरु के पास पहुंचे. योगी ने दही का आचमन कर युवराज की अंजुलि में उल्टी कर दी. कहा कि पी जाओ युवराज की अंजुलि से कुछ दही उनके पैरों पर गिर गई. बालक को निर्दोष मान गुरु गोरक्षनाथ ने नेपाल के एकीकरण का वरदान दिया. यह वरदान फलीभूत हुआ और नेपाल के गोरखाली राजा पृथ्वी नारायण शाह ने अपने 1722 से 1775 तक के कार्यकाल में हिन्दू नेपाल अधिराज्य की स्थापना की'.गुरु की कृपा से हुई थी बारिश
एक और कहानी के अनुसार नेपाल में कई वर्षों से बारिश नहीं हो रही थी. नेपाल नरेश ने इसका कारण पता किया तो बताया गया कि मच्छेन्द्रनाथ जी (मत्स्येन्द्र नाथ) ने नेपाल की सारी घटाओं को रोक लिया है, इसलिए बारिश नहीं हो रही. उसके बाद नेपाल राजवंश गुरु गोरक्षनाथ को आग्रह कर नेपाल ले गया. गुरु गोरक्षनाथ को देखते ही मच्छेन्द्रनाथ ने उन्हें प्रणाम किया. उनकी मेघमालाएं ढिली हो गईं और नेपाल में बारिश शुरू हो गई. तभी से नेपाल का गोरखा राजवंश गुरु गोरक्षनाथ को अपना कुल देवता मानने लगा​. मकर संक्रांति के अवसर पर गोरक्षनाथ पीठ पर दूर-दूर से लोग खिचड़ी चढ़ाने आते हैं. इस दौरान पूरे एक माह तक गोरखनाथ मंदिर में खिचड़ी मेला चलता है.

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First published: January 14, 2020, 2:55 PM IST
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