कौन हैं वे जिनके साथ एक दशक से दीपावली मनाते हैं CM योगी आदित्यनाथ?

पिछले साल योगी आदित्यनाथ ने गोरखपुर के तिकोनिया जंगल में वनटांगिया लोगों के साथ दिवाली मनाई थी तो लोगों को काफी हैरानी हुई थी. आइए जानते हैं कि वनटांगिया हैं कौन, जिनसे योगी को इतना लगाव है.

ओम प्रकाश | News18Hindi
Updated: November 7, 2018, 10:45 AM IST
कौन हैं वे जिनके साथ एक दशक से दीपावली मनाते हैं CM योगी आदित्यनाथ?
सीएम योगी आदित्यनाथ Photo: File
ओम प्रकाश
ओम प्रकाश | News18Hindi
Updated: November 7, 2018, 10:45 AM IST
योगी आदित्यनाथ सीएम होते हुए गोरखपुर के जंगलों में रहने वाले वंचित लोगों के बीच दीपावली मनाने जाएंगे. वह 11 साल से वैभव में यह त्योहार मनाने की जगह उन लोगों के साथ खुशियां बांटते हैं जिन्हें वर्षों से तमाम लोकतांत्रिक अधिकारों से वंचित रखा गया था. वे उनके बच्चों को मिठाइयां, पटाखे, किताबें और स्कूल की ड्रेस देते हैं. हम बात कर रहे हैं वनटांगियों की. पिछले साल योगी आदित्यनाथ ने गोरखपुर के तिकोनिया जंगल में वनटांगिया लोगों के साथ दिवाली मनाई थी तो लोगों को काफी हैरानी हुई थी. आइए जानते हैं कि वनटांगिया हैं कौन, जिनसे योगी को इतना लगाव है.

उत्तर प्रदेश राजर्षि टंडन ओपन यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर एवं भूगोल के प्रोफेसर डॉ. केएन सिंह बताते हैं “अंग्रेजी हुकूमत के समय जंगल क्षेत्र में पौधों की देखरेख करने के लिए मजदूर रखे गए थे. ये श्रमिक भूमिहीन थे, इसलिए अपने परिवार को साथ लेकर रहने लगे. दूसरी पीढ़ी में उनका अपने मूल गांव से संपर्क कट गया और वे जंगल के ही होकर रह गए. उन्हें खेती के लिए जमीन दी जाती थी, लेकिन यह जमीन वन विभाग की होती थी, उस पर इन श्रमिकों का कोई अधिकार नहीं था. वनटांगिया श्रावस्ती, गोंडा और गोरखपुर में हैं. इन्हें समाज की मुख्य धारा में लाने का काम योगी आदित्यनाथ ने शुरू किया.”

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गोरखपुर से करीब 11 किलोमीटर दूर पिपराइच रोड पर वनटांगिया गांव शुरू हो जाते हैं. कुछ जानकार बताते हैं कि करीब सौ साल पहले अंग्रेजों के शासन में पूर्वी उत्तर प्रदेश में रेल लाइन बिछाने, सरकारी विभागों की इमारत के लिए लकड़ी मुहैया कराने के लिए बड़े पैमाने पर जंगल काटे गए. अंग्रेजों को उम्मीद थी कि काटे गए पेड़ों की खूंट से फिर जंगल तैयार हो जाएंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ. फिर उन्होंने दोबारा वनीकरण के लिए 1920 में बर्मा (म्यांमार) में आदिवासियों द्वारा पहाड़ों पर जंगल तैयार करने के साथ-साथ खाली स्थानों पर खेती करने की पद्धति 'टोंगिया' को आजमाया, इसलिए इस काम को करने वाले श्रमिक वनटांगिया कहलाए.

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जमींदारों के जुल्म से परेशान दलित और अति पिछड़े वर्ग के ये श्रमिक राहत पाने के लिए अंग्रेजों के साथ जंगल में तो गए, लेकिन यहां आकर वह शोषण के नए दुष्चक्र में फंस गए. उन्हें गुलाम बनाकर रखा गया. जब देश आजाद हुआ तो इनके गांवों को न तो राजस्व ग्राम की मान्यता मिली और न ही इन लोगों को संविधान के तहत नागरिकों के मूलभूत अधिकार दिए गए. मतलब वनटांगियों को वे अधिकार हासिल नहीं हुए जो देश के आम नागरिकों को मिले थे.

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वनटांगियों को लोकसभा और विधानसभा में वोट देने का अधिकार 1995 में मिला. इससे आप इनकी उपेक्षा का अंदाजा लगा सकते हैं. उनके गांवों में स्कूल, अस्पताल, बिजली, सड़क पानी जैसी कोई सुविधा थी ही नहीं. एक तरह से वनटांगियां खानाबदोश की जिंदगी जी रहे थे.

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योगी को नजदीक से जानने वाले गोरखपुर के वरिष्ठ पत्रकार टीपी शाही बताते हैं "वनटांगियों के लिए स्कूल खुलवाने पर योगी के खिलाफ वन विभाग ने एफआईआर दर्ज करवा दी थी, क्योंकि वनटांगियों को वहां की जमीन पर कोई अधिकार नहीं था. योगी ने टिन शेड का अस्थायी स्कूल खुलवाया था, ताकि बच्चे जंगल से बाहर की दुनिया को जान सकें. समाज की मुख्य धारा से जुड़ सकें.”

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शाही के मुताबिक “साल 2007 में योगी आदित्यनाथ का वनटांगियों से संपर्क हुआ था. जिन लोगों की आजादी के इतने साल बाद भी किसी राजनीतिक दल या सरकारों ने सुध नहीं ली उन्हें मुख्य धारा में जोड़ने का काम योगी आदित्यनाथ ने शुरू किया. ऐसा अंदेशा था कि अगर वनटांगिया समाज से कटे रहेंगे तो वे नक्सलियों जुड़ जाएंगे. ऐसे में योगी ने इनके बीच आना-जाना शुरू किया."

सांसद रहते हुए योगी आदित्यनाथ ने सड़क से संसद तक इनके अधिकारों की लड़ाई लड़ी. इन्हें नागरिक अधिकार देने का मामला संसद में उठाया. शाही के मुताबिक वनटांगियां की आबादी करीब 38 हजार के आसपास है. योगी सरकार 1,625 गांवों को राजस्व ग्राम का दर्जा देने जा रही है. प्रथम चरण में गोरखपुर और महराजगंज के दो दर्जन गांवों को राजस्व ग्राम का दर्जा मिला है. अन्य जिलों में भी सर्वे चल रहा है.

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“दिवाली पर योगी जिस भी वनटांगिया गांव जाते हैं वहां सबके घर जाकर मिठाई और उपहार देते हैं. उनके साथ खाना खाते हैं. वनटांगिया गांव में रहने वाले लोग अनुसूचित जाति व पिछड़ी जाति से हैं, लेकिन आज तक जातिवाद की राजनीति करने वालों ने वनटांगिया बस्तियों की सुध नहीं ली.”

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