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    पशु बलि रोकने के लिए शुरू हुई रक्त बलि की अनोखी परंपरा, गांववाले अपने खून से करते हैं मां का अभिषेक

    रक्त बलि में सिर्फ पुरुष ही हिस्सा लेते हैं. महिलाएं इसमें भाग नहीं लेती हैं.
    रक्त बलि में सिर्फ पुरुष ही हिस्सा लेते हैं. महिलाएं इसमें भाग नहीं लेती हैं.

    गोरखपुर से 40 किलोमीटर बांसगांव में दशकों से श्रीनेत क्षत्रिय वंश के लोग नवमी पर अपने रक्त से मां (Maa Durga) का अभिषेक करते आ रहे हैं. इसे बलि प्रथा के नाम से भी जाना जाता है. पशु बलि को रोकने के लिए इस अनोखी परंपरा की शुरुआत की गई.

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    गोरखपुर. नवरात्र (Navratra) में जहां शक्ति की देवी मां दुर्गा (Maa Durga) की पूजा-आराधना कई तरीके से की जाती है, वहीं गोरखपुर के बांसगांव में प्रसिद्ध दुर्गा मंदिर में रक्त की बलि देकर मां की आराधना की जाती है. यहां नवमीं के दिन रक्त बलि की परंपरा को हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है. दिलचस्प बात ये है कि श्रीनेत वंश के क्षत्रियों के नवजात बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक अपने शरीर से खून देकर मां का अभिषेक करते हैं.

    गोरखपुर मुख्यालय से करीब 40 किलोमीटर दक्षिण में स्थित क्षत्रियों का चर्चित गांव बांसगांव है. यहां श्रीनेत वंश के क्षत्रियों की मां दुर्गा के अभिषेक की परंपरा बिलकुल अनोखी व ऐतिहासिक है. दशकों से यहां श्रीनेत क्षत्रिय अपने रक्त से मां का अभिषेक करते आ रहे हैं. इसे बलि प्रथा के नाम से भी जाना जाता है. इस प्रथा के अनुसार यहां स्थित मां दुर्गा के प्राचीन मंदिर पर नवरात्री में नवमी के दिन श्रीनेत वंशीय क्षत्रिय इकट्ठा होते हैं. जहां शुभ मुहर्त में अपने नौ अंगों से रक्त निकाल कर मां का अभिषेक करते हैं. आश्चर्यजनक यह है कि उस्तरे से शरीर पर हल्का सा वार कर खून निकाला जाता है. वहीं कटे स्थान पर राख और भभूत लगा दिया जाता है.

    दरअसल नवमी के दिन करीब हजारों श्रीनेतवंशी यहां जुटते हैं. विवाहित पुरुष जहां अपने शरीर के नौ अंगों के रक्त से अभिषेक करते हैं. वहीं कुंवारे पुरुष केवल एक जगह से रक्त निकालकर मां का अभिषेक करते हैं.



    मंदिर का भभूत लगा देने मात्र से ठीक हो जाता है घाव
    गांववाले बताते हैं कि यह मां की महिमा ही है कि उस्तरे से खून निकालने के बाद भी आज तक कभी किसी को कोई इन्फेक्शन नहीं हुआ. यही नहीं जहां से खून निकाला जाता वहां देवी स्थान का राख और भभूत लगा देने मात्र से घाव ठीक हो जाता है. यहां रक्त बलि के दौरान मंदिर में केवल पुरुष सदस्य ही मौजूद होते है. इस बीच यहां महिलाओं आना वर्जित होता है.

    प्रथा को मनाने वाले बताते हैं कि बलि के लिए किसी के साथ कोई जबरदस्ती नहीं की जाती है. लोग अपनी आस्थानुसार खुद ही इसमें शामिल होते हैं. करीब सौ साल से चली आ रही इस परंपरा में इस क्षेत्र के हर परिवार के पुरुष को रक्त का चढ़ावा अनिवार्य माना जाता है. जिस लड़के की शादी नहीं होती है उसके एक अंग से खून चढ़ाया जाता है. वहीं शादीशुदा पुरुषों को शरीर के 9 जगहों पर काटा जाता है और रक्त को बेलपत्र के जरिये माता दुर्गा की मूर्ति पर चढ़ाया जाता है.

    रक्त बलि में हिस्सा लेने आये गांव के शेखर सिंह और धनंजय सिंह का कहना है कि इस परंपरा के जरिए पशुओं की बलि का सांकेतिक विरोध किया जाता है. इनका कहना है कि इस परंपरा से उनके अंदर की शक्ति का संचार होता है.

    पशु बलि रोकने के लिए शुरू हुई रक्त बलि की परंपरा 

    पुजारी श्रवण कुमार पाण्डेय का कहना है कि सैकड़ों सालों से इस परंपरा का निर्वाहन श्रीनेत वंश के क्षत्रिय करते आ रहे हैं. पहले यहां जानवरों की बलि दी जाती थी. जानवरों की बलि को रोकने के लिए श्रीनेत क्षत्रिय वंश के लोगों ने इस अनोखी परंपरा की नींव रखी.

    गांव के बुजुर्ग तेज बहादुर सिंह का कहना है कि आजादी के बाद गांव में संत रामचंदर शर्मा का आगमन हुआ था. जिन्होंने पशुओं की बलि का विरोध करने के साथ ही श्रीनेत क्षत्रियों से अपील करते हुये कहा था कि अगर मां दुर्गा के भक्त हैं तो अपने शरीर से निकले रक्त को मां की चरणों में अर्पित करें. उसके बाद से ही यहां पशुओं की बलि देने के बदले रक्त की बलि दी जाने लगी.

    गांववालों के मुताबिक क्षत्रियों का लहू चढ़ाने से मां दुर्गा की कृपा उन पर बनी रहती है. मंदिर में हर साल रक्‍त बलि देने वालों में डॉक्‍टर से लेकर प्रशासनिक अधिकारी भी होते हैं. जो नवरात्र के मौके पर गांव पहुंचकर सालों की परंपरा का निर्वाहन करते हैं.
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