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पूर्वांचल की सियासत से क्यों दूर है बाहुबली पंडित हरिशंकर तिवारी

बाहुबली पंडित हरिशंकर तिवारी

बाहुबली पंडित हरिशंकर तिवारी

अभी तक गोरखपुर में इन दो गुटों में वर्चस्व की लड़ाई होती थी. लेकिन दोनों गुटों के प्रमुखों के राजनीति में आने के बाद ये लड़ाई राजनीति के कैनवास पर भी लड़ी जाने लगी. साल 1997 में वीरेंद्र शाही की लखनऊ में हुई दिनदहाड़े हत्या ने इस वर्चस्व की लड़ाई पर विराम लगा दिया.

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लोकसभा चुनाव 2019 अब अंतिम पड़ाव पर पहुंच चुका है. सातवें चरण के लिए 19 मई को यूपी की 13 सीटों पर चुनाव होना है. लेकिन अगर बात करे पूर्वांचल के बाहुबली नेता और पूर्व मंत्री पंडित हरिशंकर तिवारी की, तो 2019 के चुनाव में उन्होंने काफी दूरी बना ली हैं. वहीं अब राजनीति में उनकी सक्रियता बहुत कम रह गई हैं. सत्ता के गलियारे में बाहुबली नेता और पूर्वांचल में बड़ा ब्राह्मण चेहरा माने जाने वाले हरिशंकर तिवारी अब 'हाता' के अंदर से रणनीति तैयार कर रहे हैं. गोरखपुर की राजनीति हरिशंकर तिवारी और गोरक्षपीठ के इर्द-गिर्द ही घूमती रही है. वहीं गोरखपुर सीट पर क्षत्रियों के साथ ही ब्राह्मणों का भी खासा प्रभाव रहा है.

गोरखपुर की सियासत को नजदीक से जाने वाले वरिष्ठ पत्रकार उत्कर्ष सिन्हा कहते हैं कि बढ़ती उम्र के कारण हरिशंकर तिवारी ने अपनी विरासत अपने बेटों को ट्रांसफर कर दी. उन्होंने कहा, 'विनय तिवारी और कुशल तिवारी अब अपने पिता के नाम पर  रणनीति को चमकाने में लगे है. उत्कर्ष सिन्हा ने बताया कि कुशल तिवारी सफल हुए और विनय तिवारी अभी सफलता पाने का इंतजार कर रहे हैं. सिन्हा बताते हैं कि दो बार चिल्लूपार विधानसभा से चुनाव हारने के बाद वे बैकफुट पर आ गए. वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक के मुताबिक सीएम योगी आदित्यनाथ का बढ़ता कद और उम्र की वजह से उन्होंने पूर्वांचल की राजनीति से खुद को बिल्कुल अलग कर लिया.

विनय शंकर और भीष्मशंकर तिवारी


आपको बता दें कि विनय शंकर तिवारी चिल्लूपार से बीएसपी के विधायक हैं, वहीं भीष्मशंकर उर्फ कुशल तिवारी संत कबीर नगर लोकसभा सीट से बीएसपी के उम्मीदवार हैं. इससे पहले भीष्मशंकर उर्फ कुशल तिवारी ने बीएसपी की तरफ से साल 2009 में पहला चुनाव जीता था.

दरअसल उत्तर प्रदेश के गोरखपुर की एक विधानसभा सीट है चिल्लूपार. 1985 में ये सीट एकाएक उस वक़्त चर्चा में आ गई, जब हरिशंकर तिवारी नाम के निर्दलीय उम्मीदवार ने जेल के अंदर से यहां चुनाव जीता. इसी के साथ भारतीय राजनीति में अपराध के सीधे प्रवेश का दरवाजा भी खुल गया.  हरिशंकर तिवारी के राजनीति में प्रवेश से न सिर्फ उनके चिरविरोधी कहे जाने वाले वीरेंद्र प्रताप शाही ने भी लक्ष्मीपुर विधानसभा सीट से जीत हासिल की बल्कि ख़ुद तिवारी भी राजनीति की बुलंदियां छूते चले गए.

अभी तक गोरखपुर में इन दो गुटों में वर्चस्व की लड़ाई होती थी. लेकिन दोनों गुटों के प्रमुखों के राजनीति में आने के बाद ये लड़ाई राजनीति के कैनवास पर भी लड़ी जाने लगी. साल 1997 में वीरेंद्र शाही की लखनऊ में हुई दिनदहाड़े हत्या ने इस वर्चस्व की लड़ाई पर विराम लगा दिया.

22 वर्ष तक विधायक रहे हरिशंकर तिवारी

हरिशंकर तिवारी न सिर्फ लगातार 22 वर्षों तक विधायक रहे, बल्कि साल 1997 से लेकर 2007 तक कई बार मंत्री भी रहे. इस दौरान प्रदेश में सरकारें बदलती रहीं, लेकिन हर पार्टी की सरकार में हरिशंकर तिवारी मंत्री बने रहे. हालांकि राजनीति की शुरुआत उन्होंने कांग्रेस पार्टी से की लेकिन कल्याण सिंह के मंत्रिमंडल से होते हुए वह राजनाथ सिंह, मायावती से लेकर मुलायम सिंह यादव के मंत्रिमंडल में अपना नाम पक्का करवाते रहे.

​हरिशंकर तिवारी के बाद पूर्वांचल में माफ़िया और राजनीति का कथित गठजोड़ मुख़्तार अंसारी, ब्रजेश सिंह, रमाकांत यादव, उमाकांत यादव, धनंजय सिंह के साथ-साथ अतीक अहमद, अभय सिंह, विजय मिश्र और राजा भैया तक पहुंच गया.

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