बिसरख में बीता था लंकेश का बचपन, इसलिए यहां दशहरे पर नहीं होता रावण दहन

पूरा देश आज जहां रावण के पुतलों का दहन कर बुराई पर अच्छाई की जीत का उत्सव मना रहा है, वहीं बिसरख गांव की तस्वीर थोड़ी जुदा है, यहां गायों के रंभाने और चिड़ियों की चहचहाने के बीच पौराणिक असुर राज के जीवन और शिक्षाओं का जश्न मनाया जाता है. यहां आज भी रावण बाबा हैं.

भाषा
Updated: September 30, 2017, 11:06 PM IST
बिसरख में बीता था लंकेश का बचपन, इसलिए यहां दशहरे पर नहीं होता रावण दहन
Photo : Getty Images
भाषा
Updated: September 30, 2017, 11:06 PM IST
पूरा देश आज जहां रावण के पुतलों का दहन कर बुराई पर अच्छाई की जीत का उत्सव मना रहा है, वहीं बिसरख गांव की तस्वीर थोड़ी जुदा है, यहां गायों के रंभाने और चिड़ियों की चहचहाने के बीच पौराणिक असुर राज के जीवन और शिक्षाओं का जश्न मनाया जाता है. यहां आज भी रावण बाबा हैं,

ग्रेटर नोएडा के बिसरख गांव में किसी से रावण के मंदिर के बारे में पूछेंगे तो आपको शायद ही रूखा जवाब मिले.

प्राचीन शिव मंदिर के महंत राम दास ने बताया कि ‘लंका नरेश रावण’ इस गांव में पैदा हुए थे. इस मंदिर को रावण मंदिर के तौर पर भी जाना जाता है.

रावण का जन्म ऋषि विश्रवा के यहां हुआ था और वह भगवान शिव का अनन्य भक्त था. रावण का बचपन बिसरख में ही बीता था.

महंत राम दास ने कहा कि हम रावण के पुतलों का दहन नहीं करते, वह हमारे गांव का बेटा था. वह यहां पैदा हुआ था और हमें इस पर गर्व है. गांव की सीमा से सटा ही रावण मंदिर है जिसमें शिवलिंग है. ऐसी मान्यता है कि इस शिवलिंग की स्थापना ऋषि विश्रवा ने की थी.

हालांकि, ग्रामीणों द्वारा इस गांव में असुर राज रावण की अराधना नहीं की जाती है.
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