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ग्रेटर नोएडा में पूंछ जैसे अंग के साथ पैदा हुआ बच्चा, डॉक्टरों ने कह दी यह बड़ी बात..

लैप्रोस्कोपिक तकनीक की मदद से 22 वर्षीय युवती के पेट से 5 किलोग्राम वजन का एक ट्यूमर सफलतापूर्वक निकाला है.

लैप्रोस्कोपिक तकनीक की मदद से 22 वर्षीय युवती के पेट से 5 किलोग्राम वजन का एक ट्यूमर सफलतापूर्वक निकाला है.

डॉक्टरों (Doctors) का मानना है कि ग्रेटर नोएडा (Greater Noida) में जन्म लिया बच्चा (Infant) पूरी तरह से ठीक हो जएगा. बच्चे को साइक्रोकॉक्सिजियल टेराटोमा (Sacrococcygeal teratoma) टाइप-1 कैटेगरी नाम की बीमारी है. इसका ऑपरेशन बिल्कुल सेफ है.

  • News18Hindi
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ग्रेटर नोएडा. दिल्ली (Delhi) से सटे ग्रेटर नोएडा (Greater Noida) में एक नवजात बच्चा (Infant) आज-कल चर्चा का विषय बना हुआ है. दरअसल बच्चे के पीछे पूंछ जैसी एक आकृति भी निकली हुई हैं. बच्चे (Infant) को लेकर घरवाले परेशान हैं. डॉक्टरों का कहना है बच्चे को साइक्रोकॉक्सिजियल टेराटोमा (sacrococcygeal teratoma) है, जो शिशु को मां के गर्भ में ही बनता है. डॉक्टर एमआरआई (MRI) और अल्ट्रासाउंड (Ultrasound ) करा कर ऑपरेट कर देते हैं. डॉक्टरों के मुताबिक बच्‍चे के शरीर पर मांस का अतिरिक्‍त टुकड़ा अलग कर देने से बच्चा नॉर्मल लाइफ जी पाएगा. बच्चे के परिवारवालों को इससे घबराने की जरूरत नहीं है. बच्चे की जिंदगी पर इसका कोई नकारात्‍मक असर नहीं पड़ेगा. डॉक्‍टरों ने इसे साइक्रोकॉक्सिजियल टेराटोमा (sacrococcygeal teratoma) नाम दिया है, जो एक तरह का टाइप-1 ट्यूमर है.

डाक्टर्स बच्चे के बारे में क्या कह रहे हैं

न्यूज 18 हिंदी ने ग्रेटर नोएडा में जन्मे इस बच्चे के बारे में दिल्ली-एनसीआर के बड़े अस्पतालों के कुछ डाक्टरों से बात की. न्यूज 18 ने सीनियर्स डॉक्टरों से यह जानने की कोशिश की क्या बच्चा ठीक हो पाएगा? सभी डॉक्टरों का कहना था कि इस तरह की बीमारी लाखों में से किसी एक को होती है. इससे कोई परेशानी नहीं होती है और खासकर यह बच्चा तो बिल्कुल ठीक हो जाएगा.

greater noida infant born with two penis
पूंछ जैसी आकृति के साथ पैदा हुआ बच्चा इलाके में चर्चा का विषय बना हुआ है.


गाजियाबाद के यशोदा हॉस्पिटल के पीडियाट्रिक सर्जन डॉ. जय भारत पंवार कहते हैं, 'फोटो देखने से पता चलता है कि यह उतना बड़ा प्रॉब्लम नहीं है, जितना मीडिया में दिखाया जा रहा है. बच्चे की जांच के बाद ऑपरेशन कर इसे निकाल दिया जाएगा. इस तरह के केसेज में हमलोग मान कर चलते हैं कि 90 प्रतिशत इस बीमारी का संबंध शरीर की दूसरी बीमारियों से नहीं होता है. यह साइक्रोकॉक्सिजियल टेराटोमा (sacrococcygeal teratoma) टाइप-1 है. इसका ऑपरेशन बिल्कुल सेफ है. इस तरह की बीमारी 40 हजार बच्चों में एक को होता है. इस तरह के बच्चे नॉर्मल लाइफ जीते हैं. अगर अंदर टाइप-4 तरह की साइक्रोकॉक्सिजियल टेराटोमा होता तो दिक्कत होती. साइक्रोकॉक्सिजियल टेराटोमा टाइप 4 में बच्चे के अंदर ही मांस का टुकड़ा विकसित हो जाता है, जिसको ऑपरेट करना मुश्किल होता है. लेकिन यह बच्चा आराम से नॉर्मल लाइफ जी सकेगा.'

डॉक्टरों का कहना है कि बच्चा नॉर्मल लाइफ जी सकेगा

दिल्ली के लोकनायक जयप्रकाश नारायण अस्पताल (एलएनजेपी) के मेडिसीन विभाग के प्रोफेसर डॉ. नरेश कुमार कहते हैं, 'यह एक तरह का एबनॉर्मिलिटी का केस है. इस तरह के केस कभी-कभी देखने को मिलते हैं. इस तरह के मामले में कुछ केस तो ठीक हो जाते हैं, लेकिन कुछ केसेज में बच्चे को ऑपरेट तो किया जाता है लेकिन ऑउटकम उतना अच्छा नहीं होता है. ऐसे बच्चे जिंदगी उसी तरह गुजारते हैं, जिस तरह से और बच्चे गुजारते हैं. ग्रेटर नोएडा में जिस बच्चे का जन्म हुआ है, उसको मैंने देखा नहीं है इसलिए कुछ कह नहीं सकता. तस्वीर देख कर लग रहा है कि बच्चे की पिछले हिस्से में मांस का एक टुकड़ा निकला हुआ है. इसको सर्जरी कर हटाया जा सकता है. अगर स्टूल के रास्ते में ही यह मांस का टुकड़ा है और स्टूल निकलने के रास्ते पर यह नहीं है तो यह ठीक हो सकता है. डॉक्टर सबसे पहले उसका एमआरआई करके देखेंगे कि शरीर के भीतरी भाग में तो कुछ समस्या तो नहीं है? उसके बाद सर्जरी कर मांस के टुकड़े को निकाल लिया जाएगा.'

बच्चे के हाथ और पैर के साथ ही उसके दो पूंछ भी निकले हुए हैं.
बच्चे के हाथ और पैर और बाकी सारे अंग पूरी तरह सामान्य हैं.


लाखों में एक केस इस तरह का होता है

गाजियाबाद के वसुंधरा में ही बच्चों के लिए प्राइवेट क्लिनिक चलाने वाले पीडियाट्रिक फिजिशियन डॉक्टर विनोद कुमार मदान न्यूज 18 हिंदी के साथ बातचीत में कहते हैं, 'बच्चे को ऑपरेट करना ही पड़ेगा. अभी दो-तीन महीने तो कुछ नहीं किया जा सकता है. यह भी देखना पड़ेगा कि बच्चे का किडनी और स्पाइन ठीक से काम कर रहा है कि नहीं. अगर किडनी और स्पाइन ठीक काम कर रहे हैं तो बच्चे को मल्टीपल सर्जरी करना पड़ेगा. बच्चे का अल्ट्रासाउंड और एमआरआई से पता चल जाएगा कि बच्चा को और तो कोई दिक्कत तो नहीं है. इस तरह का डिसऑर्डर कई तरह से हो सकता है. टोक्सिन, पॉल्यूशन या फिर जेनेटिक कारणों से शिशु के गर्भ में ही यह समस्या आ जाती है. अल्ट्रासाउंड में भी बाद में इसका पता चलता है. तब तक आप कुछ कर भी नहीं सकते हैं.'

साइक्रोकॉक्सिजियल टेराटोमा (sacrococcygeal teratoma) टाइप-1 है.
इस तरह के रोग को डॉक्टर साइक्रोकॉक्सिजियल टेराटोमा (sacrococcygeal teratoma) टाइप-1 कहते है.


दिल्ली के आरके हॉस्पिटल के सीनियर कंसल्टेंट फिजिसियन डॉ अजय कुमार कहते हैं, 'इस तरह के केसज में मेडिकल साइंस में 100 प्रतिशत सफलता की गारंटी नहीं दी जाती है. लेकिन, जिस तरह का यह केस है उससे लग रहा है कि बच्चे को ऑपरेट कर मांस का टुकड़ा निकाल दिया जाएगा. भ्रूण पूरी तरह विकसित नहीं होने के कारण मांस का टुकड़ा निकल गया है. इस तरह के कई केसेज सामने आते रहे हैं. यह थोड़ा अलग हटके है. लेकिन इसको आसानी से ऑपरेट किया जा सकता है. बीते दिनों ही एम्स में दो जुड़वा बच्चों को अलग किया गया है. एशिया में कंजेनाइटल नॉर्मलिटी या इस तरह के डिसऑर्डर के लिए अच्छे डॉक्टर्स भी हैं और बेहतरीन अस्पताल भी हैं.'

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