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Diwali special: गरीबों के घरौंदे को रौशन करते है नोएडा के विकास, राहुल और सुषमा

Diwali special: गरीबों के घरौंदे को रौशन करते है नोएडा के विकास, राहुल और सुषमा

विकास

विकास झा और उनकी टीम

दिवाली आने वाली है,पटाखों और मिठाइयों (Diwali gift) की बाजार में मांग बढ़ रहीं हैं.बच्चों के लिए यह त्यौहार खास रहता है.लेकिन समाज में कुछ परिवार ऐसे भी हैं जो अपने बच्चों को आर्थिक समस्याओं के कारण पटाखे और मिठाइयों से दूर रखते हुए अपने अरमान मन में ही दबा लेते  हैं. 

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    नोएडा: दिवाली आने वाली है,पटाखों और मिठाइयों (Diwali gift) की बाजार में मांग बढ़ रहीं हैं.बच्चों के लिए यह त्यौहार खास रहता है.लेकिन समाज में कुछ परिवार ऐसे भी हैं जो अपने बच्चों को आर्थिक समस्याओं के कारण पटाखे और मिठाइयों से दूर रखते हुए अपने अरमान मन में ही दबा लेते हैं. उन परिवारों को आर्थिक मदद करने के लिए नोएडा में रहने वाले विकास झा और उनकी टीम दिवाली पर हर एक साल कोशिश करते हैं, कोशिश भी ऐसी जो आर्थिक रूप से पिछड़े परिवार के आत्म सम्मान को भी ठेस न पहुंचे. विकास की टीम में मुख्यतः तीन लोग है. तीनों दोस्त खुद अच्छे पदों पर काम कर रहे हैं और समय निकालकर समाज के एक तबके के लिए काम करते हैं.

    <b>वर्कशॉप करा कर सिखाते हैं बच्चों को कलाकारी</b>
    विकास झा पेशे से इंजीनियर है और नोएडा में रहते हैं.वे एवं उनके तीनों दोस्त बच्चों को हाथ से मिट्टी के सजावटी सामान बनाने में मदद करते हैं और फिर उन्हें तकनीक, सोशल मीडिया साइट, अपने दोस्तों की मदद से मार्केट उपलब्ध कराते हैं. विकास बताते हैं कि समय के साथ मिट्टी के बर्तनों, सजावट का सामान लोगों ने खरीदना छोड़ दिया. लेकिन फिर एक ऐसा समय आया है जब लोग मिट्टी के दिए, सजावट के सामान, पेपर के लैंप शेड लोगों ने फिर से खरीदना शुरू कर दिया है. लेकिन समस्या ये है कि इसके मार्केट पर बड़े जो व्यापारी है, उनका दबदबा है. जो गरीब कलाकार हैं उनको सामान बनाने तो आता है मगर उन्हें कहा बेचे, यह नहीं पता होता है. वो किसी सड़क पर बैठ जाते हैं बेचने को, जहां बिक्री कम ही होती है. तो हमने इसी कमजोरी को दूर करने के लिए अपने दोस्तो के सर्किल का इस्तेमाल करते हैं और कलाकारी को प्रमोट करते हैं.

    <b>हम बच्चों को सिखाते भी है विभिन्न तरह की कलाकारी</b>
    मूलतः बिहार के मुजफ्फरपुर की रहने वाली सुषमा तिवारी पेशे से प्रोफेसर है, दिल्ली विश्वविद्यालय जैसे जगहों में पढ़ा चुकी है. वो बताती है कि हम आठवी से लेकर 12 क्लास के बच्चों को पहले ट्रेनिंग कराते हैं, देश के विभिन्न क्षेत्रों के लोग जो किसी न किसी कला में पारंगत है उनको हम बुलाते है, ताकि वो बच्चों को हाथ के गुण सीखा सके. फिर हम उनके कलाकारी को सेल करते है, वो भी पारदर्शी तरीके से अपने परिवार के साथ मिलकर.

    <b>आपस में ही पैसे इकठ्ठा करके करते है सारा काम</b>
    इसी ग्रुप में काम करने वाले राहुल पांडेय मूलतः उत्तराखंड के रहने वाले है और नोएडा में ही रहते है. उनसे पैसे कैसे आते है खर्च करने को ये पूछने पर वो बताते हैं कि पैसे की तो ज़रूरत पड़ती ही है, लेकिन हम किसी से मदद नहीं लेते. हम जो आपस में दोस्त है वही अपनी सैलरी से बचा कर पैसा खर्च करते है. किसी से वो अमाउंट जबरन नहीं लिया जाता जिसकी जितनी क्षमता है उतना वो देता है, चाहे वो 100 रुपए दे या 1000.
    <b>(रिपोर्ट – आदित्य कुमार)</b>

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