लाखों लोगों की कब्रगाह बन सकती हैं भ्रष्‍टाचार की नींव पर खड़ीं ये बिल्डिंगें

बिल्डिंग निर्माण प्रक्रिया में नक्‍शा, स्‍ट्रक्‍चर, फाउंडेशन, बीम, पीलर्स, मटीरियल्‍स से लेकर सीवर लाइन, सड़क और ग्रीन एरिया से जुड़े नॉर्म्‍स की धज्जियां उड़ाई गईं. ऐसे में प्रशासन द्वारा महज छोटे बिल्‍डर्स या ब्रॉकर्स की गिरफ्तारी मामले की लीपापोती ही हो सकती है.

Umanath Singh
Updated: July 19, 2018, 6:07 PM IST
लाखों लोगों की कब्रगाह बन सकती हैं भ्रष्‍टाचार की नींव पर खड़ीं ये बिल्डिंगें
लाखों लोगों की कब्रगाह बन सकती हैं भ्रष्‍टाचार की नींव पर खड़ीं ये बिल्डिंगें
Umanath Singh
Updated: July 19, 2018, 6:07 PM IST
ग्रेटर नोएडा में बिल्डिंग गिरने से 9 लोगों की मौत और दर्जनों परिवारों के घर के सपने टूटने से हमेशा की तरह एक बार फिर अवैध निर्माण और उनसे जुड़े नियम-कायदों की चर्चा जोरों पर है. जबकि अभी तक बिल्‍डर, अथॉरिटी, बैंक, जिला प्रशासन, रजिस्‍ट्रार, फायर डिपार्टमेंट में से किसी की नजर इस पर नहीं थी और गैर कानूनी तरीके से बनने वाले इन प्रोजेक्‍ट्स को इनकी स्‍वीकृति मिलती चली गई.

बिल्डिंग निर्माण प्रक्रिया में नक्‍शा, स्‍ट्रक्‍चर, फाउंडेशन, बीम, पीलर्स, मटीरियल्‍स से लेकर सीवर लाइन, सड़क और ग्रीन एरिया से जुड़े नॉर्म्‍स की धज्जियां उड़ाई गईं. ऐसे में प्रशासन द्वारा महज छोटे बिल्‍डर्स या ब्रॉकर्स की गिरफ्तारी मामले की लीपापोती ही हो सकती है. आज हम भ्रष्‍टाचार खड़ी इस सिस्‍टम की नींव खंगाल रहे हैं -

शाहबेरी के इस मामले की जड़ 2011 के सुप्रीम कोर्ट के आदेश से जुड़ी है. कोर्ट के आदेश के बाद ग्रेटर नोएडा अथॉरिटी ने किसानों को 400 एकड़ जमीन वापस कर दी थी. जमीन मिलने के बाद ग्रेटर नोएडा वेस्‍ट (यानी नोएडा एक्‍सटेंशन) के इन किसानों ने ये जमीन छोटे बिल्‍डर्स को बेच दी. देखते ही देखते 370 एकड़ जमीन पर छोटी-छोटी बिल्डिंगें खड़ी हो गईं और बिना नक्‍शा पास हुए इन्‍हें बिजली के कनेक्‍शन और बैंकों से लोन भी मिल गया.



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चूंकि इनके पास सीवर लाइन नहीं थीं, इसलिए पानी निकलने की व्‍यवस्‍था नहीं बन पाई और घर से निकलने वाला पानी बिल्डिंग के नीचे और आसपास के एरिया में जमा होता गया. इससे उस बिल्डिंग की नींव कमजोर हो गई और वह बिल्डिंग गिर गई. कमोबेश यही हालत यहां के अन्‍य बिल्डिंगों की भी है.

अथॉरिटी के फायर डिपार्टमेंट के एक अधिकारी ने नाम नहीं छापने की शर्त पर कहा कि चूंकि फ्री होल्‍ड एरिया में आने वाले 500 वर्ग मीटर क्षेत्र में बने स्‍ट्रक्‍चर के लिए अथॉरिटी से एनओसी लेने की जरूरत नहीं होती है. इसी का फायदा अधिकांश छोटे बिल्‍डर उठाते रहे हैं. हालांकि यह रियायत सिर्फ अपने घर के लिए होती है, लेकिन त्रुटिपूर्ण सिस्‍टम का वे लाभ उठा लेते हैं.


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उनके अनुसार, जो जमीन फ्री-होल्‍ड नहीं है और अथॉरिटी के क्षेत्राधिकार में आती है, उस जमीन पर बनने वाले मकान के लिए भी बिल्‍डर पैसे खिलाकर अथॉरिटी से नक्‍शा पास करवा लेते हैं. जबकि अथॉरिटी को एनओसी देने से पहले फायर डिपार्टमेंट समेत सभी संबंधित विभागों की रिपोर्ट लेनी होती है.

रेरा से बच जाते हैं ऐसे बिल्डर्स
रियल एस्‍टेट एक्‍सपर्ट प्रदीप मिश्रा के अनुसार, यह समस्‍या सिर्फ शाहबेरी तक सीमित नहीं है, बल्कि दिल्‍ली समेत पूरे एनसीआर में नियम-कायदों को धता बताकर इसी तरह बिल्डिंगें बनाई जा रही हैं. चूंकि रेरा के तहत 500 वर्ग मीटर या 8 फ्लैट्स से अधिक वाले भवनों को उसके नियमों का पालन करना होगा, ऐसे में ये छोटे बिल्‍डर्स इस नियम का फायदा उठाकर अधिकांश मामलों में उससे भी बच जाते हैं.

कुछ मामलों में अथॉरिटी से संबंधित अर्बन लोकल बॉडी अगर मशविरा भी जारी करती है तो रेजिडेंट्स उस पर अमल नहीं करते हैं. उदाहरण के लिए गाजियाबाद म्‍यूनिसिपल कॉरपोरेशन (जीएमसी) ने शहर में आने वाली 26 बिल्डिंगों को असुरक्षित घोषित कर रखा है. उसके अनुसार ये बिल्डिंगें कभी भी गिर सकती हैं, लेकिन लोग उन्‍हें खाली करने के लिए तैयार नहीं हैं. हालांकि जीएमसी के एक अधिकारी ने बताया कि क्षेत्र में असुरक्षित बिल्डिंगों की संख्‍या 250 के आसपास है, लेकिन विभिन्‍न कारणों से सभी को नोटिस भी जारी न‍हीं किया जाता है.

कम से कम 200 अपार्टमेंट्स हैं शाहबेरी में
वैसे पाठकों की जानकारी के लिए बता दूं कि गाजियाबाद के क्रॉसिंग रिपब्लिक और नोएडा एक्‍सटेंशन के बीच का दो किलोमीटर क्षेत्र मूल रूप से कृषि आधारित गांव है. पहले इस गांव की जमीन भी ‘अर्जेंसी क्‍लाउज’ के तहत अधिग्रहीत की गई थी और बाद में उसे बिल्‍डर्स को लीज पर दे दिया गया था. शाहबेरी के आसपास गारही, बेहलॉलपुर, सर्फाबाद, शोरखा और गुलाबिली जैसे गांव भी हैं, जहां इस तरह की कंस्‍ट्रक्‍शन एक्टिविटी धुंआधार तरीके से चल रही है. सिर्फ शाहबेरी में इस समय कम से कम 200 अपार्टमेंट्स हैं और बड़ी संख्‍या में अपार्टमेंट का निर्माण हो रहा है.


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इन गांवों के लोगों ने बताया कि गांवों की जमीन दलदली है और ऊंची बिल्डिंगों का बोझ उठाने में सक्षम नहीं है. शाहबेरी की घटना के बाद गौतमबुद्ध नगर के डीएम बीएन सिंह ने कहा था कि सरकार द्वारा तय बिल्डिंग बायलॉज के तहत हर कंस्‍ट्रक्‍शन के लिए जरूरी है कि उस पर संबंधित अथॉरिटी की स्‍वीकृति ली जाए, लेकिन शाहबेरी में लैंड के नोटिफिकेशन के बावजूद किसी भी प्‍लान के लिए स्‍वीकृति नहीं ली गई.

घटिया क्‍वालिटी के फ्लाय-एश ब्रिक्‍स का यूज कर रहे हैं बिल्‍डर
नोएडा एक्‍सटेंशन के एक बिल्‍डर ने नाम जाहिर नहीं करने की शर्त पर बताया कि इन गांवों में जो अपार्टमेंट बन रहे हैं, उनमें घटिया क्‍वालिटी के फ्लाय-एश ब्रिक्‍स का यूज हो रहा है. छोटे बिल्‍डर्स अधिक प्रॉफिट मार्जिन के लिए कमजोर पिलर का उपयोग कर रहे हैं. उन्‍होंने बताया कि ये पूरा इलाका बाढ़ग्रस्‍त रहा है, इसलिए ऐसे फ्लडपलेंस में पांच से अधिक मंजिला बिल्डिंग नहीं बननी चाहिए.

नोएडा एक्‍सटेंशन फ्लैट ओनर्स वेल्फेयर एसोसिएशन (नेफोवा) के प्रेसिडेंट अभिषेक कुमार ने बताया कि सुरक्षा और सुविधाओं का ख्‍याल किए बगैर सस्‍ते घर की उपलब्‍धता के कारण ऐसे इलाकों में लोग घर ले लेते हैं. टू-बीएचके फ्लैट की कीमत इस इलाके 20 से 22 लाख के आसपास है, जबकि सोसायटी में इसकी कीमत 30 लाख या उससे अधिक पड़ती है. उनके अनुसार, खराब कंस्‍ट्रक्‍शन क्‍वालिटी, अवैध निर्माण और भ्रष्‍टाचार के कारण यह घटना घटी है.


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शाहबेरी जैसे गांवों में होने वाले कंस्‍ट्रक्‍शन में पालन नहीं किए जाते नियम
दिल्‍ली-एनसीआर की बड़ी कंस्‍ट्रक्‍शन कंपनी गौरसन के एमडी और बिल्‍डर्स एसोसिएशन ‘क्रेडाई’ के नेशनल वाइस प्रेसिडेंट मनोज गौड़ ने बताया कि शाहबेरी समेत इन गांवों में होने वाले कंस्‍ट्रक्‍शन में किसी तरह के नियम-कायदों को फॉलो नहीं किया जाता है. ये कंस्‍ट्रक्‍शन पूरी तरह से गैरकानूनी हैं. ये अपने स्‍ट्रक्‍चर, मैप आदि कुछ भी पास नहीं कराते हैं और अधिकारियों से मिलीभगत करके निर्माण कार्य पूरा करा लेते हैं. कंस्‍ट्रक्‍शन एक्टिविटी बढ़ने के कारण इस एरिया के वाटर लेवल में भी 10 मीटर की गिरावट आई है.

35 साल में दिल्ली में केवल 30 हजार  बिल्डिंगों को मिली एनओसी
बिल्डिंग निर्माण से जुड़े नॉर्म्‍स फॉलो करने के मामले में दिल्‍ली की हालत भी कुछ अलग नहीं है. दिल्‍ली में अनुमानित 65 लाख बिल्डिंगें, यूनिट या स्‍ट्रक्‍चर हैं. लेकिन 1983 से लेकर अभी तक सिर्फ 30 हजार बिल्डिंग या स्‍ट्रक्‍चर को ही फायर की एनओसी दी गई है. वैसे भी दिल्‍ली और एनसीआर का क्षेत्र हाई सिसमिक जोन में आता है, यानी इन इलाकों में ऊंची इंटेसिटी वाले भूकंप की आशंका भी बनी रहती है. ऐसे में स्थिति की गंभीरता आसानी से समझी जा सकती है.

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