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हापुड़: गढ़मुक्तेश्वर के प्रसिद्ध चटाई वाले मोहल्ले में सैकड़ों परिवार बना रहे चटाई

हापुड़:

हापुड़: गढ़मुक्तेश्वर के प्रसिद्ध चटाई वाले मोहल्ले में सैकड़ों परिवार बना रहे चटाई

गढ़मुक्तेश्वर के प्रसिद्ध प्राचीन गंगा मंदिर के नीचे बसे सैकड़ों परिवार हस्तशिल्प कारीगरी से जुड़ी चटाई बनाने की अद्भुत कला को पुश्तैनी ढंग में सैकड़ों वर्षों से करते आ रहे हैं. मोहल्ला चटाई वाला में रहने वाले लोगो के पास कोई खेती बाड़ी की जमीन भी नही हैं, जो इधर- उधर नौकरी करने की बजाए चटाई बनाकर अपने परिवारों की जीविका चला रहे हैं.

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    उत्तरप्रदेश का जनपद हापुड़  कोरोना संकट काल में आत्मनिर्भर भारत की ओर गढ़मुक्तेश्वर क्षेत्र बढ़ रहा है. कोरोना के कारण बेरोजगार हुए कारीगरों ने रोजगार के साधन तलाश लिए हैं. पुश्तैनी कार्यों को दोबारा से शुरू कर दिया है. जिनमें मुख्य कार्य चटाई का है. सैकड़ों परिवार चटाई के कार्य से जुड़े जीविका चला रहे हैं. प्रतिदिन लाखों की कीमत की चटाई तैयार होकर उत्तर प्रदेश के विभिन्न शहर के अलावा दिल्ली, उत्तराखंड, पंजाब और हरियाणा में सप्लाई हो रही हैं.

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आत्मनिर्भर भारत के आह्वान की बानगी गढ़मुक्तेश्वर क्षेत्र में देखने को मिलती है. कामधंधे की तलाश में अपनों का साथ छाेड़कर बाहर राज्यों में नौकरी करने गए कामगार कोरोना संकट काल में घर लौट आए. धीरे-धीरे हालात सुधरें तो काम धंधे की दोबारा से चिंता सताने लगी. ऐसे में इन कामगारों ने अपने पुश्तैनी चटाई बनाने के कार्य को अपना लिया और अब इसी कार्य के चलते अपने परिवार का पालन-पोषण कर रहे है.

    आपको बता दें कि गढ़मुक्तेश्वर के प्रसिद्ध प्राचीन गंगा मंदिर के नीचे बसे सैकड़ों परिवार हस्तशिल्प कारीगरी से जुड़ी चटाई बनाने की अद्भुत कला को पुश्तैनी ढंग में सैकड़ों वर्षों से करते आ रहे हैं. मोहल्ला चटाई वाला में रहने वाले लोगो के पास कोई खेती बाड़ी की जमीन भी नही हैं, जो इधर- उधर नौकरी करने की बजाए चटाई बनाकर अपने परिवारों की जीविका चला रहे हैं. गढ़ क्षेत्र से निर्मित चटाई की सप्लाई पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड, दिल्ली समेत प्रदेश स्तर पर है. इन चटाई का उपयोग मुख्य रूप से आलू की खुदाई, आम और कटहल की फसल को पाले से बचाने, कोल्ड स्टोर, धार्मिक मेलों के दौरान जमीन पर बिछाने से लेकर अस्थाई शौचालय बनाने समेत विभिन्न कामों में किया जाता है. लगभग 12 घंटे में चार कारीगार एक दिन में दस से 15 चटाई तक तैयार कर लेते हैं. एक कारीगर प्रतिदिन 300 से 400 रुपये तक कमा लेता है.

    कार्तिक मेले में होता है लाखों का व्यापार
    गढ़ खादर, ब्रजघाट, अमरोहा के तिगरी धाम, मेरठ के मखदूमपुर, मुजफ्फरनगर के शुक्रताल, बिनजौर की विदुर कुटी, बुलंदशहर के अनूपशहर और नरौरा समेत विभिन्न स्थानों पर कार्तिक माह में गंगा किनारे लक्खी मेलों का आयोजन होता है. जिनमें चटाई की बड़े स्तर पर खपत होती है. जिसके मद्देनजर मेला प्रारंभ होने से महीनों पहले गढ़ के कारीगर चटाई बनाकर उनका स्टॉक करने लगते हैं, ताकि मेलों से होने वाली डिमांड को पूरा किया जा सके.

    चटाई बनाने वाली संतोष की प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मन की बात में की सराहना
    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मन की बात कार्यक्रम में आत्मनिर्भर भारत के उदाहरण में गढ़मुक्तेश्वर के चटाई कारोबार का जिक्र किया था. प्रधानमंत्री ने चटाई बनाने वाली संतोष देवी का नाम लिया. गढ़मुक्तेश्वर में सैकड़ों वर्षों से चटाई बनाने का काम किया जाता है. ये इलाका चटाई के लिए दूर दूर तक प्रसिद्घ है.हस्तशिल्प केंद्र के रूप में भी इसकी पहचान है.सैकड़ों परिवार चटाई बनाने के व्यवसाय से जुड़े हैं. प्रधानमंत्री ने कहा कि कोरोना जैसी महामारी के बीच भी संतोष ने चटाई बनाने के कार्य नहीं छोड़ा, जिसमें चटाई की डिमांड समय-समय में मिलती रही और लॉकडाउन जैसे समय में भी बिक्री होती रही. आत्मनिर्भर भारत बनाने के प्रयासों का ये एक बेहतरीन उदाहरण है.

    सरकारी स्तर से नहीं मिलता प्रोत्साहन
    आत्मनिर्भर भारत की ओर गढ़ क्षेत्र के बढ़ते कदमों को सरकारी सहारे की जरूरत है. इस पुश्तैनी कार्य को बढ़ावा देने के लिए सरकारी स्तर पर सहयोग मिल जाएगा तो कारीगर अपने हुनर का और बेहतर प्रदर्शन कर सकेंगे.साथ ही चटाई का कारोबार आत्मनिर्भर भारत में मील का पत्थर साबित हो सकता है,कारीगर बताते हैं कि आज तक सरकार की किसी भी योजना का उन्हें लाभ नहीं मिला है.वो चटाई बनाकर अपना परिवार का पालन कर रहे है उन्हें कच्चा माल लाने में बहुत परेशानी होती है क्योंकि अब कच्चा माल बहुत दूर से लाना पड़ता है.

    हापुड़ से न्यूज़18 लोकल के लिए सौरभ त्यागी की रिपोर्ट

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