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हापुड़ : जानिए कब और कहां पूरा शहर क्रांतिकारि‍यों के साथ हो गया था लामबंद

हापुड़ : जानिए कब और कहां पूरा शहर क्रांतिकारीयों के साथ हो गया था लामबंद

हापुड़ : जानिए कब और कहां पूरा शहर क्रांतिकारीयों के साथ हो गया था लामबंद

आजादी की लड़ाई में उत्तर प्रदेश के जनपद हापुड़ के स्वतंत्रता सेनानियों का बड़ा योगदान रहा.आजादी की लड़ाई में पूरा शहर क्रांतिकारीयो के साथ खड़ा हो गया था, जिससे उखड़ गए थे अंग्रेजों के पैर. अंग्रेजों से लड़ते हुए जहां कई स्वतंत्र सेनानी शहीद हो गए, वही 40 से अधिक स्वतंत्रता सेनानियों को कई बार जेल भी जाना पड़ा. हापुड़ पश्चिम की आंदोलन रणनीति का बड़ा केंद्र हुआ करता था. इस दौरान नगर पालिका हापुड़ के टाउन हॉल में क्रांतिकारियों की गुप्त बैठकर हुआ करती थी.

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    आजादी की लड़ाई में जनपद हापुड़ के स्वतंत्रता सेनानियों का बड़ा योगदान रहा है.आजादी की लड़ाई में पूरा शहर क्रांतिकारीयो के साथ खड़ा हो गया था, जिससे अंग्रेजों के पैर उखड़ गए थे.अंग्रेजों से लड़ते हुए जहां कई स्वतंत्र सेनानी शहीद हो गए थे तो वही 40 से अधिक स्वतंत्रता सेनानियों को कई बार जेल भी जाना पड़ा. हापुड़ पश्चिम की आंदोलन रणनीति का बड़ा केंद्र हुआ करता था. इस दौरान नगर पालिका हापुड़ के टाउन हॉल में क्रांतिकारियों की गुप्त बैठक भी हुआ करती थी.

    नगर पालिका के टाउन हॉल था गुप्त बैठक का केंद्र
    नगर पालिका के टाउन हॉल में जंग-ए-आजादी की कई लड़ाइयों में महत्वपूर्ण निर्णय लिए जाते थे. 1942 की अगस्त क्रांति आंदोलन की लड़ाई में विशेष भूमिका रही थी. इस संबंध में हाल ही में एक सर्वे भी किया गया है.वर्ष 1857 से क्षेत्र के लोगों में सुलगी ज्वाला आजादी मिलने तक लगातार धधकती रही. वर्ष 1947 से पहले कुछ वर्षों में आजादी की है ज्वाला लावा बन चुकी क्षेत्र के लोगों ने आजादी की लड़ाई में भी बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया था.

    रात के अंधेरे में तय होती थी रणनीति 
    कुशल देव की टीम ने बताया कि उनके द्वारा विभिन्न गांवों में 100 से अधिक लोगों से बात की गयी. उस समय नगरपालिका का टाउन हॉल क्रांतिकारियों की गुप्त मंत्रणा का मुख्य केंद्र होता था. यहां रात के अंधेरे में अंग्रेजों से छुप कर बैठक हुआ करती थी. यहां बनने वाली रणनीतियों का 1947 में देश को मिली आजादी में अहम योगदान रहा है. हापुड़ क्षेत्र के 40 से अधिक क्रांतिकारियों के नाम प्रकाश में आए थें.

    अगस्त क्रांति को भुलाया नहीं जा सकता
    हापुड़ में 11 अगस्त 1942 को लोगों के एक जुलूस पर अंग्रेजी हुक्मरानों ने गोलियां चलवा दी थी.लोहमान्य तिलक की प्रथम पुण्यतिथि 1 अगस्त पर लोग सड़कों पर उतरे थे और इसके बाद लोग प्रतिदिन जुलूस के रूप में सड़कों पर उतरने लगे. इसी से नाराज होकर अंग्रेजों ने जुलूस में शामिल लोगों पर गोलियां चलवा दी थी. 11 अगस्त की सुबह लाला परमानंद, अमोलकचंद, रतन लाल गर्ग, बाबू मुरारीलाल, खलीफा मंजूर हसन को गिरफ्तार कर लिया गया था. जिसके विरोध में एक बार फिर लोग जुलूस के रूप में सड़कों पर उतर आए. जिस पर अंग्रेजों ने गोलियां चलवा दी थी. जिसमें क्रांतिकारी रामस्वरूप जाटव,अगर लाल शर्मा, गिरधारी लाल समेत मांगेराम को गोली लगी थी.

    हापुड से न्यूज़18 लोकल के लिए सौरभ त्यागी की रिपोर्ट

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