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जानिए, कैसे दम तोड़ने की कगार पर पहुंचा हापुड़ का मूढ़ा उद्योग

मूढा बनाने वाले कारीगरों को तो उनकी मेहनत की मजदूरी भी नहीं मिल पाती है, जबकि प्रदेश सरकार ने गढ़ में बने मूढा उद्योग को एक बड़ा उद्योग घोषित कर इसे विश्व पटल पर लाने की कवायद शुरू की थी, लेकिन यह उद्योग बढ़ने की वजह कम होता दिखाई पड़ रहा है.

मूढा बनाने वाले कारीगरों को तो उनकी मेहनत की मजदूरी भी नहीं मिल पाती है, जबकि प्रदेश सरकार ने गढ़ में बने मूढा उद्योग को एक बड़ा उद्योग घोषित कर इसे विश्व पटल पर लाने की कवायद शुरू की थी, लेकिन यह उद्योग बढ़ने की वजह कम होता दिखाई पड़ रहा है.

मूढा बनाने वाले कारीगरों को तो उनकी मेहनत की मजदूरी भी नहीं मिल पाती है, जबकि प्रदेश सरकार ने गढ़ में बने मूढा उद्योग को एक बड़ा उद्योग घोषित कर इसे विश्व पटल पर लाने की कवायद शुरू की थी, लेकिन यह उद्योग बढ़ने की वजह कम होता दिखाई पड़ रहा है.

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    उत्तर प्रदेश के जनपद हापुड़ के गढ़ क्षेत्र का मूढा उद्योग दम तोड़ने की कगार पर पहुंच गया है, जहां का बना मूढा भारत ही नहीं बल्कि विदेशों में बसे लोगों की बैठकों और बड़ी-बड़ी कोठियों की शान बना हुआ था. यहां के मूढा कारीगर दिन- रात मेहनत करके गंगा किनारे खादर क्षेत्र से सरकंडा सेटा और सुतली को इकट्ठा करके अपने – अपने घरों में नया डिजाइन देकर तैयार करते हैं.

    गढ़ का बना मूढा दिल्ली प्रगति मैदान में लगने वाले ट्रेड फेयर में दर्शकों को अत्यधिक पसंद आता है. वहां मूढो की एक प्रदर्शनी भी लगाई जाती है और वहां से लिए गए ऑर्डरो के आधार पर देश ही नहीं बल्कि दुनिया के कई शहरों में भी सप्लाई किये जाते है. शासन – प्रशासन की उपेक्षा के चलते अब हापुड़ का मूढा उद्योग दम तोड़ता नजर आ रहा है.

    मूढा बनाने वाले कारीगरों को तो उनकी मेहनत की मजदूरी भी नहीं मिल पाती है, जबकि प्रदेश सरकार ने गढ़ में बने मूढा उद्योग को एक बड़ा उद्योग घोषित कर इसे विश्व पटल पर लाने की कवायद शुरू की थी, लेकिन यह उद्योग बढ़ने की वजह कम होता दिखाई पड़ रहा है.

    सन को लपेटकर बान तैयार कर गांव के लोग इन मूढा बनाने वाले कारीगरों को बेच देते हैं. बान और सेटों से मूढा तैयार किया जाता है. यह सेटा गंगा नदी के किनारे पर खाली पड़े मैदानो में झाड़ – झुण्ड खुद ही पैदा होता है जिसे काटकर, सुखाकर तथा सेटे के ऊपर पत्तियों को इकट्ठा करके यह मूढा बनाने के काम में आता है.आज के दौर में धीरे-धीरे बान कम बटने के कारण प्लास्टिक की बारीक रस्सी से मूढो की सिलाई की जाती है, जिसमें साइकिल के टायर नीचे गोलाई में लगाकर नीचे से मूढे को मजबूती प्रदान की जाती है. ये कारीगर मूढा ही नही छोटी छोटी मूढ़े, बच्चों के छोटे-छोटे  सोफे, मेज आदि सजावटी सामान भी तैयार करते हैं.

    एक समय ऐसा भी था
    हरियाणा के मुख्यमंत्री देवीलाल ने पूरे प्रदेश की ग्राम पंचायतों और न्याय पंचायतों पर गढ़ के बने मूढे और कुर्सी के सेट व मेज वहां मंगाए थे. गढ़मुक्तेश्वर से कई कई ट्रक मूढा तैयार कर हरियाणा ले जाया गया था, जहां आज भी चौपालों, पंचायत घरों और न्याय पंचायतों में लोग उन पर बैठकर खुद को गौरवान्वित महसूस करते हैं.

    वहींं मूढा कारीगर पिंटू ने बताया कि मूढा उद्योग दम तोड़ रहा है, इस तरफ सरकार को ध्यान देना चाहिए और उन्हें सेटा, बान आदि मुहैया कराए जाएं तो यह उद्योग बड़े रूप में फैल सकता है.लेकिन मूढा कारीगरो के परिवार के लोग जिसमें बच्चें वह महिला भी शामिल है.वह सुबह से शाम तक मूढा तैयार कर थोक व्यापारियों को भेजते हैं उन्हें मनमाने ढंग से कीमत दी जाती है.यही व्यापारी ट्रकों में भरकर बहार महंगे रेटों में सप्लाई करते हैं, इसलिए ही व्यापारी दिन रात चौगुनी तरक्की कर रहे हैं.वही मूढा बनाने वाले मजदूर मेहनत करने के बावजूद भी गरीबी रेखा से ऊपर नहीं उठ पा रहे हैं.

    हापुड़ से न्यूज़18 लोकल के लिए सौरभ त्यागी की रिपोर्ट

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