वो कौन था जिसके लिए हार गए थे वाजपेयी और मोदी ने की थी तारीफ!

दूसरे लोकसभा चुनाव में जिताने के लिए अटलजी ने मथुरा लोकसभा का चुनाव हारकर अपनी जमानत जब्त करा ली थी. उसी राजा महेन्द्र प्रताप सिंह की पीएम मोदी ने काबुल की संसद में दिल खोलकर तारीफ की थी.

नासिर हुसैन
Updated: August 17, 2018, 2:09 PM IST
वो कौन था जिसके लिए हार गए थे वाजपेयी और मोदी ने की थी तारीफ!
फोटो- राजा महेन्द्र प्रताप सिंह.
नासिर हुसैन
नासिर हुसैन
Updated: August 17, 2018, 2:09 PM IST
25 दिसंबर 2015 को पीएम मोदी ने अफगानिस्तान दौरे के वक्त वहां की संसद में पीएम नरेन्द्र मोदी ने एक भारतीय शख्स का भी जिक्र किया था. ये वो ही शख्स था जिसे दूसरे लोकसभा चुनाव में जिताने के लिए अटलजी ने मथुरा लोकसभा का चुनाव हारकर अपनी जमानत जब्त करा ली थी. उसी राजा महेन्द्र प्रताप सिंह की पीएम मोदी ने काबुल की संसद में दिल खोलकर तारीफ की थी.

राजा महेन्द्र प्रताप सिंह यूपी में हाथरस के राजा थे. इनकी मूल रियासत मुरसान थी. आज हाथरस हॉस्य कवि काका हाथरसी, हींग, घी, रंग-गुलाल, रबड़ी के लिए जाना जाता है लेकिन राजा महेन्द्र का नाम कहीं नहीं लिया जाता है. ये बात बताती है कि इतिहास में राजा को कोई खास जगह नहीं मिल पाई. लेकिन 28 साल की उम्र में उन्होंने वो काम कर दिखाया था जो नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने 1943 में किया था.

राजा महेंद्र प्रताप की पढ़ाई मोहम्मडन एंग्लो ओरियंटल कॉलेज, अलीगढ़ में हुई, जो आज अलीगढ़ मुस्लिम यूनीवर्सिटी के तौर पर जाना जाता है. उस वक्त को देखते हुए उनके अंदर भी क्रांति की लहरें उठने लगीं. हालांकि 1902 में ही जींद की सिख राजकुमारी से उनकी शादी हो गई थी. लेकिन क्रांति की आग आसानी से बुझने वाली नहीं थी. एक बार तो छुआछूत के खिलाफ लोगों को साथ लाने के लिए उन्होंने अल्मोड़ा में वहां की नीची जाति के परिवार के घर में खाना खाया, तो आगरा में भी एक दलित परिवार के साथ खाना खाया.

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विदेशी वस्त्रों के खिलाफ अपनी रियासत में उन्होंने जबरदस्त अभियान चलाया. बाद में उनको लगा कि देश में रहकर कुछ नहीं हो सकता. लाला हरदयाल, वीरेंद्रनाथ चट्टोपाध्याय, रास बिहारी बोस, श्याम जी कृष्ण वर्मा, अलग- अलग देशों से ब्रिटिश सरकार की गुलामी के खिलाफ उस वक्त भारत के लिए अभियान चला रहे थे. तो राजा महेन्द्र स्विट्जरलैंड, तुर्की, इजिप्ट में वहां के शासकों से ब्रिटिश सरकार के खिलाफ सपोर्ट मांगने पहुंच गए, उसके बाद अफगानिस्तान पहुंचे. उन्हें लगा कि यहां रहकर वो भारत के सबसे करीब होंगे और ब्रिटिश सरकार के खिलाफ यहां रहकर जंग लड़ी जा सकती है. उस वक्त उनकी उम्र महज 28 साल थी और अगले 32 साल देश की आजादी के लिए वो दुनिया भर की खाक ही छानते रहे.

एक दिसंबर 1915 का दिन था, राजा महेंद्र प्रताप का जन्मदिन, उस दिन वो 28 साल के हुए थे. उन्होंने भारत से बाहर अफगानिस्तान में देश की पहली निर्वासित सरकार का गठन किया, बाद में सुभाष चंद्र बोस ने 28 साल बाद उन्हीं की तरह आजाद हिंद सरकार का गठन सिंगापुर में किया था. राजा महेंद्र प्रताप को उस सरकार का राष्ट्रपति बनाया गया. मौलवी बरकतुल्लाह को राजा का प्रधानमंत्री घोषित किया गया.

राजा की इस काबुल सरकार ने बाकायदा ब्रिटिश सरकार के खिलाफ जेहाद का नारा दिया. लगभग हर देश में राजा की सरकार ने अपने राजदूत नियुक्त कर दिए. लेकिन उस वक्त ना कोई बेहतर सैन्य रणनीति थी और ना ही उन्हें इस रिवोल्यूशरी आइडिया के लिए बोस जैसा समर्थन मिला और सरकार प्रतीकात्मक रह गई. लेकिन राजा की लड़ाई थमी नहीं.

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राजा के सिर पर ब्रिटिश सरकार ने इनाम रख दिया, रियासत अपने कब्जे में ले ली, और राजा को भगोड़ा घोषित कर दिया. राजा ने काफी परेशानी के दिन गुजारे. फिर उन्होंने जापान में जाकर एक मैगजीन शुरू की, जिसका नाम था वर्ल्ड फेडरेशन. लंबे समय तक इस मैगजीन के जरिए ब्रिटिश सरकार की क्रूरता को वो दुनिया भर के सामने लाते रहे.

दूसरे विश्व युद्ध के दौरान राजा ने फिर एक एक्जीक्यूटिव बोर्ड बनाया, ताकि ब्रिटिश सरकार को भारत छोड़ने के लिए मजूबर किया जा सके. लेकिन युद्ध खत्म होते-होते सरकार राजा की तरफ नरम हो गई थी, फिर आजादी होना भी तय मानी जाने लगी. राजा को भारत आने की इजाजत मिली. ठीक 32 साल बाद राजा भारत आए, 1946 में राजा मद्रास के समुद्र तट पर उतरे. वहां से वो घर नहीं गए, सीधे वर्धा पहुंचे गांधीजी से मिलने.

बहुत कम लोगों को पता होगा कि हाथरस के इस राजा को नोबेल पुरस्कार के लिए नॉमिनेट किया गया था. लेकिन उन दोनों ही साल नोबेल पुरस्कार का ऐलान नहीं हुआ. राजा महेंद्र प्रताप की उपलब्धियां यहीं कम नहीं होतीं, उनके खाते में भारत का पहला पॉलिटेक्निक कॉलेज भी है.

वृंदावन में एक पॉलिटेक्निक कॉलेज खोला, जिसका नाम रखा प्रेम महाविद्यालय. राजा मॉर्डन एजुकेशन के हिमायती थे, तभी एएमयू के लिए भी जमीन दान कर दी. राजा जो भी काम करते थे, वो क्रांति के स्तर पर जाकर करते थे. हिंदू घराने में पैदा हुए थे, मुस्लिम संस्था में पढ़े थे, यूरोप में तमाम ईसाइयों से उनके गहरे रिश्ते थे, सिख धर्म मानने वाले परिवार से उनकी शादी हुई थी.

कहते हैं कि जैसे अकबर ने नया धर्म दीन ए इलाही चलाया था, वैसे ही राजा महेंद्र प्रताप ने भी एक नया प्रेम धर्म शुरु किया था. इस धर्म के अनुयायियों का एक ही उद्देश्य था प्रेम से रहना, प्रेम बांटना और प्रेम भाईचारे का संदेश देना.
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