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हाईकोर्ट के जजों की कॉलोनी से अवैध कब्जे के ध्वस्तीकरण की मांग वाली याचिका खारिज

इलाहाबाद हाई कोर्ट(फाइल फोटो).

इलाहाबाद हाई कोर्ट(फाइल फोटो).

इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High Court) ने हाईकोर्ट के जजों की बनाई कॉलोनी (Judges colony) के अवैध कब्जे को हटाने के लिए दायर याचिका (Petition) को खारिज कर दिया है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 17, 2020, 6:41 PM IST
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इलाहाबाद. इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High Court) ने हाईकोर्ट के जजों की कॉलोनी (Judges colony) के अवैध कब्जे के ध्वस्तीकरण को चुनौती देने वाली याचिका (Petition) को खारिज कर दिया है. कोर्ट ने कहा है कि याची का भूमि के एक हिस्से पर कोई विधिक अधिकार नहीं है. हाईकोर्ट (High Court) में 19 क्लाइव रोड प्रयागराज स्थित जमीन पर अवैध कब्जे के ध्वस्तीकरण के खिलाफ याचिका दाखिल कर उसे चुनौती दी गई थी. यह आदेश जस्टिस शशिकांत गुप्ता और जस्टिस पीयूष अग्रवाल की खंडपीठ ने याचिकाकर्ता शिव कुमार पांडे की याचिका पर दिया है.

कोर्ट ने कहा है कि नजूल भूमि 19 क्लाइव रोड को 25 जुलाई 1949 को राज्य सरकार ने अमृत बाजार पत्रिका कंपनी को 50 साल की लीज पर दिया था. लीज की शर्तो का उल्लंघन कर कंपनी ने भूमि यूनाइटेड बैंक आफ इंडिया को लोन के एवज में बंधक रख दिया. कंपनी ने लोन अदा नहीं किया तो बैंक ने दावा कर जमीन अपने नाम कर ली. इस फैसले को राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है. सुप्रीम कोर्ट ने बंधन को लीज शर्तों के विपरीत होने के कारण अवैध करार दिया है. इसके बाद राज्य सरकार ने जमीन वापस ले ली और इलाहाबाद हाईकोर्ट को न्यायाधीशों के आवासीय भवन निर्माण के लिए सौंप दी.

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याची अधिवक्ता का कहना था कि याची के पिता पत्रिका में कर्मचारी थे. 1955-56 में इसी जमीन में 100 वर्ग गज जमीन उनको रहने के लिए गई थी. जिस पर वह टीनशेड के दो कमरों में निवास करते थे. प्रयागराज विकास प्राधिकरण ने बिना सुनवाई का मौका दिये उनके आवास को अवैध बताते हुए ध्वस्त कर दिया है.
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याचिका में निर्माण वापसी सहित मुआवजा दिलाये जाने की मांग की गयी थी. कोर्ट ने कहा कि लीज कंपनी के नाम थी याची के नाम नहीं. कंपनी लीज शर्तों के विपरीत याची को अधिकार नहीं दे सकती थी. वह थर्ड पार्टी इंट्रेस्ट नहीं तैयार कर सकती थी. अब जमीन सरकार ने वापस ले ली है, जिसे कोर्ट ने वैध माना है. इसलिए हाईकोर्ट ने कहा है कि ध्वस्तीकरण की कार्रवाई कानून के विरुद्ध नहीं हैं.
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