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अयोध्या: मंदिर-मस्जिद को लेकर 1853 में पहली बार हुई थी हिंसा!

अयोध्या: मंदिर-मस्जिद को लेकर 1853 में पहली बार हुई थी हिंसा!

राम मंदिर

राम मंदिर

अयोध्या में धार्मिक स्थल पर क्यों लगा था ताला, मस्जिद का ढांचा गिराने तक कैसे बढ़ा विवाद...

    अयोध्या लगभग पांच सौ साल से भारत की राजनीतिक, ऐतिहासिक, सामाजिक और धार्मिक विमर्श को प्रभावित कर रही है. यहां मंदिर-मस्जिद को लेकर पहली बार हिंसा 1853 में हुई थी. उस समय यह नगर अवध क्षेत्र के नवाब वाजिद अली शाह के शासन क्षेत्र में था. हिंदू धर्म को मानने वाले निर्मोही पंथ के लोगों ने दावा किया था कि मंदिर को तोड़कर यहां पर बाबर के समय मस्जिद बनवाई गई थी. (ये भी पढ़ें: राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद: अयोध्या की विवादित जमीन पर बौद्ध क्यों कर रहे हैं दावा?)

    दरअसल, दावा ये किया जाता है कि 1528 में मुगल सम्राट बाबर के सेनापति मीर बाकी ताशकंदी ने यहां एक मस्जिद बनवाई थी. हिंदुओं का बड़ा वर्ग यह दावा करता है कि यह मस्जिद उस स्थान पर बनाई गई है, जहां भगवान राम का जन्म हुआ था. इसलिए अयोध्या ने भारतीय राजनीति को सांप्रदायिकता और धर्मनिरपेक्षता के सांचे में बांट दिया है.

    Ayodhya 1          विश्व हिंदू परिषद की धर्मसभा इकट्ठा होते राम भक्त

    ऐसे विवदित घोषित हुआ स्थल
    1859 में अंग्रेजी हुकूमत ने वहां पर तार लगवा दिए और दोनों समुदायों के पूजा स्थल को अलग-अलग कर दिया. मुस्लिमों को अंदर की जगह दी गई, हिंदुओं को बाहर की. विवाद 22-23 दिसंबर, 1949 को तब ज्यादा बढ़ा जब मस्जिद के अंदर कथित तौर पर चोरी-छिपे रामलला मूर्तियां रखी गईं. अयोध्या में शोर मच गया कि जन्मभूमि में रात को भगवान प्रकट हो गए हैं. मुसलमानों ने इसका विरोध किया. दोनों पक्षों ने अदालत में मुकदमा दायर कर दिया. फिर सरकार ने इस स्थल को विवादित घोषित करके ताला लगा दिया. (ये भी पढ़ें: शहीद या पीड़ित : कोठारी बंधु, जिन्‍होंने राम मंदिर के लिए लगा दी पूरी जिंदगी )

    मंदिर मामले पर काफी पहले से सक्रिय है वीएचपी
    इस समय मंदिर मामले को लेकर धर्मसभा कर रही विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) की इस मामले को लेकर सक्रियता काफी पहले से है. साल 1984 में वीएचपी ने भगवान राम के जन्म स्थल को 'आजाद' करवाकर वहां मंदिर निर्माण करने के लिए एक समिति का गठन किया. बाद में इस अभियान का नेतृत्व बीजेपी नेता लालकृष्ण आडवाणी ने संभाला. हिंदू संगठनों ने राम जन्मभूमि का ताला खोलने का अभियान चलाया. उमेश चंद्र पांडे नामक वकील की दरखास्त पर फैजाबाद के तत्कालीन जिला जज केएम पांडे ने एक फरवरी 1986 को विवादित परिसर का ताला खोलने का आदेश पारित कर दिया.

    बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी का गठन
    ताला खोलने के खिलाफ मुस्लिम समाज में तीखी प्रतिक्रिया हुई. फलस्वरूप फरवरी, 1986 में बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी का गठन हुआ और मुस्लिम समुदाय ने भी विश्व हिंदू परिषद की तरह आंदोलन और संघर्ष का रास्ता पकड़ लिया. इसके बाद 6 दिसंबर 1992 को दक्षिणपंथी संगठनों से जुड़े कार्यकर्ताओं ने बाबरी मस्जिद के ढांचे को ध्वस्त कर दिया. इस घटना ने देश के हिंदू-मुस्लिमों के बीच एक गहरी दरार पैदा कर दी. इस दरार ने कई बड़े दंगों की नींव रखी.

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    आखिर सुप्रीम कोर्ट में क्यों गया मामला?

    आज यह लड़ाई लड़ी जा रही है कि राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद की विवादास्पद 2.77 एकड़ जमीन पर मालिकाना हक किसका है. हालांकि 30 सितंबर 2010 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस भूमि को हिंदू, मुसलमान और निर्मोही अखाड़े में बांटने का फैसला सुनाया था लेकिन इस फैसले से कोई भी पक्ष खुश नहीं था. इसलिए यह मामला सुप्रीम कोर्ट चला गया. कोर्ट ने जनवरी 2019 में सुनवाई करने का फैसला किया है. जबकि हिंदू संगठन चाहते हैं कि फैसला जल्दी हो. सरकार पर मंदिर निर्माण के लिए अध्यादेश लाने का दबाव बनाने के लिए वीएचपी मैदान में है.

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