शादी करके जिंदगी लड़की को बितानी है, लेकिन फैसला पापाजी लेंगे

सवा अरब की आबादी वाले देश में महज 3 फीसदी शादियां ऐसी हैं, जो दूसरी जातियों में हो रही हैं. बाकी के 97 फीसदी लोग अब भी जाति की पूंछ पकड़कर लटके हुए हैं.

Manisha Pandey | News18Hindi
Updated: July 17, 2019, 12:49 PM IST
शादी करके जिंदगी लड़की को बितानी है, लेकिन फैसला पापाजी लेंगे
भारतीय घरों में कैद लड़कियां
Manisha Pandey | News18Hindi
Updated: July 17, 2019, 12:49 PM IST
भारत सरकार ने 1994 में ये कानून बनाया था- Pre-natal Diagnostic Techniques Act (PNDT), 1994 यानी लिंग चयन प्रतिषेध अधिनियम. इस कानून के तहत गर्भस्‍थ शिशु का लिंग परीक्षण करना यानी ये पता करना कि होने वाला बच्‍चा लड़का है या लड़की, कानूनन अपराध करार दिया गया. ऐसा करने वाले के लिए तीन से पांच साल की जेल और 10,000 से 50,000 रु. तक जुर्माने की सजा मुकर्रर की गई.

आपने देखा होगा, बड़े शहरों के बड़े अस्‍पतालों से लेकर मुहल्‍ले की महिला डॉक्‍टर के क्लिनिक तक में बोर्ड लगा रहता है- “हमारे यहां लिंग परीक्षण नहीं किया जाता.” लेकिन ये तो सिर्फ बोर्ड भर है. काली स्‍लेट पर सफेद पेंट से लिखकर टांगना ही तो है. सरकार ने कानून बना रखा है तो बोर्ड टांग दिया. लेकिन बोर्ड टांग देने भर से कानून का पालन होने लगा होता तो ऐसा न होता कि भारत में अवैध लिंग परीक्षण और कन्‍या भ्रूण हत्‍या का बाजार 10 करोड़ रु. की फलती-फूलती इंडस्‍ट्री बन गया होता, न ही देश में लड़का-लड़की का अनुपात इतना बिगड़ा होता. पर्दे के पीछे छिपकर सबकुछ हो रहा है, लेकिन खुल्‍लमखुल्‍ला कोई नहीं बोलता, “लड़की हो तो गर्भ में ही मार दो.”

मध्‍य प्रदेश के बीजेपी नेता गोपाल भार्गव का ट्वीट
मध्‍य प्रदेश के बीजेपी नेता गोपाल भार्गव का ट्वीट


ऐसे पब्लिक प्‍लेटफॉर्म पर कोई बोले तो जेल भी जा सकता है. लेकिन अगर बोलने वाले नेताजी हों तो? नेताजी को किसका डर? हम ऐसा देश हैं, जहां कानून बनाने वाले खुद सारे कानूनों से परे हैं. ऐसा ही हुआ, जब 14 जुलाई को मध्‍य प्रदेश के बीजेपी नेता गोपाल भार्गव ने अपने ट्विटर हैंडल से ये ट्वीट किया- “मेरा मानना है कि ऐसी खबरों से अब कन्‍या भ्रूण हत्‍या की घटनाएं देश में अप्रत्‍याशित रूप से बढ़ेंगी तथा महिला-पुरुष के लिंगानुपात में भारी अंतर आएगा, जो हमें अगले तीन वर्षों में सामाजिक सर्वे में स्‍पष्‍ट रूप से दिखेगा. नर्सिंग होम एवं निजी अस्‍पतालों में गर्भपात का गोरखधंधा खूब फलेगा-फूलेगा.” बात सिर्फ नेताजी के ट्वीट तक ही नहीं रही. उसके नीचे उनका समर्थन करने वालों की झड़ी लग गई. लोगों ने कहा कि अगर बेटियां संस्‍कार खोने लगें, अपनी मर्जी से शादी करने लगें तो इससे अच्‍छा तो पैदा होने से पहले ही मार दो. सिर्फ उनका बयान ही नहीं, उनके समर्थकों की संख्‍या भी चौंकाने वाली थी. हालांकि बाद में उन्‍होंने ट्विटर पर ही माफी भी मांग ली और कहा कि ये उनके निजी विचार हैं. लेकिन तब तक तीर कमान से निकल चुका था.

माफीनामा
माफीनामा


ये सब इतना दहला देने वाला इसलिए भी था कि एक लोकतांत्रिक देश में, जहां बाकायदे भारतीय दंड संहिता की एक धारा कन्‍या भ्रूण हत्‍या को दंडनीय अपराध बताती हो, वहां इतने सारे लोगों को एक पब्लिक प्‍लेटफॉर्म पर लड़कियों को मारे जाने की वकालत करते कानून का डर भी नहीं लगा.

अब सवाल ये उठता है कि ऐसी मनोकामना नेताजी क्‍यों कर रहे थे? वजह सिर्फ इतनी थी कि बरेली के विधायक की बेटी ने घरवालों की मर्जी के खिलाफ एक दलित लड़के से शादी कर ली थी. लड़कियां पिता की मर्जी के खिलाफ अपने मन से जीवन-साथी चुन लें तो लोगों को उनका पैदा होना ही शर्मिंदगी की बात लगने लगती है. ये हमारे ही देश में होता है कि बचपन से मां-बाप लड़कियों को ये पाठ पढ़ाते हैं कि तुम्‍हारी शादी करना हमारा सबसे बड़ा अरमान है, हमारा अधिकार है. अपनी मर्जी से शादी करके तुम ये अधिकार हमसे कैसे छीन सकती हो. अगर आप हिंदी प्रदेश के एक सामान्‍य परिवार में भी पली-बढ़ी हैं तो आपने जरूर अपने घर में ये बात सुनी होगी. आश्‍चर्य तो इस बात का है कि जिसे शादी करनी है, जिसे साथ पूरा जीवन बिताना है, जिसे उस रिश्‍ते को जीना है, ये चुनना उसका हक नहीं. ये हक घरवालों का है.
Loading...

आप शायद इस आंकड़े से वाकिफ न हों कि पूरी दुनिया में होने वाली अरेंज शादियों का 88 फीसदी हमारे ही देश में होता है. इतने आधुनिक और विश्‍व शक्ति होने का दावा करने के बावजूद हमारे यहां आज भी अंतर्जातीय प्रेम विवाहों का प्रतिशत महज 3 है. बाकी 97 फीसदी शादियां अपनी जाति में हो रही हैं और उन 3 फीसदी लड़कियों के लिए भी समाज कामना कर रहा है कि वो पैदा ही न होतीं तो अच्‍छा था. भारत का संविधान हमें जिस चीज का अधिकार और आजादी देता है, भारत का समाज नहीं देता. महानगरों में, हमारे थोड़े जागरूक समूह में होने वाली 8-10 अंतरर्जातीय शादियों में शामिल होकर हम ये मुगालता पाले बैठे हैं कि अब इंटरकास्‍ट मैरिज बहुत कॉमन हो गई है. ये झूठ है. सिर्फ 3 फीसदी हैं ऐसी शादियां. सवा अरब की आबादी वाले देश में महज 3 फीसदी. 97 फीसदी लोग अब भी जाति की पूंछ पकड़कर लटके हुए हैं. उन्‍हें यकीन है कि इस पूंछ के सहारे वो संसार की वैतरिणी पार करेंगे. कैसा गोरखधंधा है ये.

ये भी पढ़ें -

इसीलिए मारते हैं बेटियों को पेट में ताकि कल को भागकर नाक न कटाएं
मर्द खुश हैं, देश सर्वे कर रहा है और औरतें बच्‍चा गिराने की गोलियां खा रही हैं
फेमिनिस्‍ट होना एक बात है और मूर्ख होना दूसरी
कपड़े उतारे मर्द, शर्मिंदा हों औरतें
मर्दाना कमज़ोरी की निशानी है औरत को 'स्लट' कहना
अरे भई, आप इंसान हैं या फेसबुक पोस्ट ?
फेसबुक के मुहल्ले में खुलती इश्क़ की अंधी गली
आंटी! उसकी टांगें तो खूबसूरत हैं, आपके पास क्‍या है दिखाने को ?
इसे धोखाधड़ी होना चाहिए या बलात्कार?
'पांव छुओ इनके रोहित, पिता हैं ये तुम्हारे!'
देह के बंधन से मुक्ति की चाह कहीं देह के जाल में ही तो नहीं फंस गई ?
स्‍मार्टफोन वाली मुहब्‍बत और इंटरनेट की अंधेरी दुनिया
कितनी मजबूरी में बोलनी पड़ती हैं बेचारे मर्दों को इस तरह की बातें
मर्द की 4 शादियां और 40 इश्‍क माफ हैं, औरत का एक तलाक और एक प्रेमी भी नहीं
'वर्जिन लड़की सीलबंद कोल्ड ड्रिंक की बोतल जैसी'- प्रोफेसर के बयान पर पढ़ें महिला का जवाब
इसलिए नहीं करना चाहिए हिंदुस्‍तानी लड़कियों को मास्‍टरबेट
क्‍या होता है, जब कोई अपनी सेक्सुएलिटी को खुलकर अभिव्यक्त नहीं कर पाता?
ड्राइविंग सीट पर औरत और जिंदगी के सबक
दिल्ली आने वाली लड़कियों! तुम्हारे नाम एक खुली चिट्ठी...

News18 Hindi पर सबसे पहले Hindi News पढ़ने के लिए हमें यूट्यूब, फेसबुक और ट्विटर पर फॉलो करें. देखिए कल्चर से जुड़ी लेटेस्ट खबरें.

First published: July 17, 2019, 12:49 PM IST
Loading...
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर
Loading...