इलाहाबाद उपचुनाव में सडक पर थी कांग्रेस और दिल में थे राजा यानी विश्वनाथ प्रताप सिंह
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इलाहाबाद उपचुनाव में सडक पर थी कांग्रेस और दिल में थे राजा यानी विश्वनाथ प्रताप सिंह
सांकेतिक फोटो

सड़क पर कांग्रेस दिखती थी तो दिलों में ‘राजा’ थे और जनता ने दिखा भी दिया था, जब वी पी सिंह इलाहाबाद से लड़े थे 1987 का उपचुनाव

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चुनावों के दौरान हर कोई यही पूछता और बताता घूम रहा है कि क्या हो रहा है? इसका मतलब ये है कि चुनावों में क्या हुआ. कौन जीत रहा है, कौन हार रहा है. लेकिन ज्यादातर चुनावों में ये नहीं पता लग पाता है. जैसे इस बार भी पांचवे चरण के मतदान होने के बाद भी कोई पक्के तौर पर कुछ कह पाने की स्थिति में नहीं है. जो जिस पार्टी के पक्ष में सोच रहा है, उसे वैसा ही जवाब मिल रहा है. जबाव के पक्ष में दलील भी मिल जा रही है.

इलाहाबाद का उपचुनाव

ऐसा ही 1988 में इलाहाबाद में हुआ था. उस समय बोफोर्स मामले के बाद विश्वनाथ प्रताप सिंह वहां से उपचुनाव लड़ रहे थे. माहौल तो वीपी सिंह के पक्ष में था. हालांकि कांग्रेस ने ऐसी किलेबंदी की थी कि वीपी सिंह किसी भी हालत में जीत न सकें. कांग्रेस नेता आश्वस्त भी हो गए थे कि वे वीपी सिंह को संसद पहुंचने से रोक लेंगे. फिर भी क्या हुआ सबको पता है. लेकिन उस समय की स्थिति समझने के लिए उस दौर में क्या कुछ चल रहा था इस पर एक नजर डाल लेते हैं.



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विश्वनाथ प्रताप सिंह इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के बेहद विश्वनीय नेता थे. हालात कुछ ऐसे बदले कि 1987 आते आते उन्होंने राजीव मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया. बोफोर्स से निकले गोलों की आंच अमिताभ बच्चन तक आई. उन्होंने संसद की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया. इधर राजीव कैबिनेट से इस्तीफा देकर वीपी सिंह ने गैर-राजनीतिक जनमोर्चा गठित कर लिया था.

          वी पी सिंह(फाइल फोटो)

वी पी सिंह बने थे चुनौती

समय बदलने के साथ उन्होंने अपने गैर-राजनीतिक मंच से ही जनता के बीच जाने का फैसला लिया. उन्होंने कहा था – “मुझे आपके (राजीव गांधी के) दरबार से न्याय नहीं मिला तो मैं अपने जिले के लोगों की अदालत में उतर रहा हूं.” चुनावी रणभेरी बज उठी. कांग्रेस ने विश्वनाथ प्रताप सिंह के विरुद्ध सुनील शास्त्री को उतारा. लाल बहादुर शास्त्री के बेटे सुनील पर कोई दाग नहीं था. तब कांग्रेस एक मजबूत पार्टी थी. नेता भी थे कार्यकर्ता भी.

वीर बहादुर की किलेबंदी

यूपी में वीर बहादुर सिंह मुख्यमंत्री थे. वीपी सिंह की तुलना में उनका कद राजपूत नेता के तौर पर छोटा था. उन्हें लगा कि यही सही वक्त है कि अपना कद बढ़ा लिया जाय. राज्य प्रशासन में उस समय के आला अधिकारी याद करते हैं-“हर तरफ से घेराबंदी की गई. इलाहाबाद लोकसभा में पांच सीटें थी. पांचों के लिए एक एक जोन बना कर जातीय-गणित के अनुरूप अधिकारियों को जोनल प्रमुख बनाया गया. अधिकारियों के जिम्मे सिर्फ सुरक्षा का ही काम नहीं था.”

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प्रदेश भर के कांग्रेसी जुटे

राज्य भर से कांग्रेसी नेता इलाहाबाद पहुंच गए. झक कलफदार कुर्ते पायजामें पहने.जिसके पास जो गाड़ी थी, उसके ईंधन की व्यवस्था कांग्रेस की ओर से कर दी गई. कांग्रेसी तेल डलवाते. जीटी रोड़ पर कहीं ढाबे पर पिकनिक करते. शाम को मुड़े-तुड़े  गर्द लगे कपड़े पहन कर वापस लौटते. अपने अपने बॉसेज को रिपोर्ट करते. इतने लोगों से मिला. इतने गांवों में गया. बड़े कांग्रेसी नेता पार्टी की जीत प्रति तकरीबन आश्वस्त थे.

कांग्रेस की गतिविधियां ज्यादा थीं

बाहर से जाने वाले भी शहर में कांग्रेसियों के भाग दौड़ को देख चमत्कृत होते. उसी दौरान एक आला अफसर ने सब देखते हुए अपने मातहत से पूछा- “भाई इतनी सारे कांग्रेसी मेहनत कर रहे हैं. हर ओर उनकी ही गाड़ियां दीख रही हैं. क्या रिपोर्ट है”. इस पर अफसर के सहयोगी ने कहा -“ऊपर तो नहीं कहा जा सकता लेकिन आपको बता रहा हूं. साहब, कांग्रेसी सड़क पर हैं लेकिन दिल में तो राजा साहेब ही हैं.” विश्वनाथ प्रताप सिंह को राजा साहेब भी कहा जाता था. और हुआ भी वही वीर बहादुर सिंह की हरचंद कोशिश के बाद भी विश्वनाथ प्रताप सिंह चुनाव जीत गए. जबकि कांग्रेसी नेता और कांग्रेस के शुभचिंतक को पक्का यकीन था कि वी पी सिंह संसद नहीं पहुंच पाएंगे. सरकारी तंत्र भी उन्हें वही रिपोर्ट दे रहा था जो उसे चाहिए था.

      छत्तीसगढ़ के सीएम भूपेश बघेल(फाइल फोटो)

छत्तीसगढ़ की मिसाल

मतदाताओं के मूड को भांप न पाने का और बड़ी मिसाल देखनी हो तो छत्तीसगढ़ की ली जा सकती है. सारे सर्वे और राजनीतिक बहस में कहा जा रहा था कि रमन सिंह सरकार फिर से आएगी. मध्य प्रदेश और राजस्थान के बारे में तो दो मत थे, लेकिन छत्तीसगढ़ के बारे में कोई ये नहीं कह रहा था कि वहां कांग्रेस की सरकार आएगी और वो भी इस प्रचंड बहुमत से. नतीजा सबने देखा. दिल्ली की सारी मीडिया के आंकलन गलत हो गए. सर्वे रिपोर्ट रद्दी कागजों में तब्दील हो गए.

और एन डी हार गए

1991 के चुनाव की बात की जाए तो अल्मोड़ा सीट से उत्तर प्रदेश और फिर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रह चुके दिग्गज एन डी तिवारी के सामने उनकी तुलना में अनुभवहीन कहे जा सकने वाले नेता थे बलराज पासी. एनडी का कद बहुत बड़ा था. लेकिन उस चुनाव में एन डी तिवारी न सिर्फ हारे बल्कि उसी हार की वजह से वे देश के प्रधानमंत्री भी बनने से रह गए.

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