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Jhansi: एग्री टूरिज्म के जनक पांडुरंग तावड़े की जुबानी सुनिए किसानों की तकदीर बदलने की कहानी

Concept of Agro Tourism: पांडुरंग तावड़े ने बताया कि जब मैं गांव लौटा तो सबसे बड़ी समस्या जो सामने आई, वह यह थी कि किसा ...अधिक पढ़ें

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रिपोर्ट: शाश्वत सिंह

झांसी. भारत कृषि प्रधान देश है. देश की 70% आबादी खेती से ही जीवकोपार्जन करती है. इसके साथ ही भारत अपने पर्यटन स्थलों के लिए भी दुनिया भर में जाना जाता है. लेकिन, ये दोनों क्षेत्र उस तेजी से विकास नहीं कर पाए जिसकी परिकल्पना की गई थी. इसे देखते हुए महाराष्ट्र के एक व्यक्ति ने एक नया शब्द खोजा- एग्री टूरिज्म . इस शब्द रचनेवाले शख्स का नाम है पांडुरंग तावड़े.

बता दें कि पांडुरंग तावड़े को भारत में कृषि पर्यटन का जनक माना जाता है. पांडुरंग तावड़े बुंदेलखंड में एग्री टूरिज्म की संभावनाएं तलाशने और विश्वविद्यालय के कृषि और पर्यटन विभाग के छात्रों से बात करने आए थे. इस दौरान उन्होंने News18 LOCAL से खास बातचीत में एग्री टूरिज्म और किसानों की तरक्की को लेकर विस्तार से बताया. पढ़ें उनसे हुई बातचीत के खास अंश:

प्रश्न: 10 साल प्राइवेट सेक्टर में नौकरी करने के बाद गांव की तरफ लौटने का ख्याल कैसे आया?
उत्तर: मेरे पिताजी और दादा जी किसान थे. उन्होंने अपना पूरा जीवन खेत और गांव को समर्पित कर दिया. कई सालों तक प्राइवेट नौकरी करने के बाद मुझे यह ख्याल आया कि मैं अपने खेत और गांव के लोगों के लिए कुछ भी नहीं कर पा रहा हूं. यहीं से गांव लौटने और दोबारा खेती से जुड़ने का सिलसिला शुरू हो गया.

प्रश्र: इस फैसले पर परिवार और खास तौर पर पत्नी की प्रतिक्रिया क्या थी?
उत्तर: जब मैंने यह बात अपने परिवार को बताई, तो शुरू में पत्नी थोड़ी झिझकीं, पर बाद में मान गईं. आज वह खुद देशभर में एग्री टूरिज्म का प्रचार करती हैं. मेरे साथ मजबूती से खड़ी रहती हैं. खेत पर आनेवाले अतिथियों के स्वागत की पूरी जिम्मेदारी उन पर ही होती है.

प्रश्न: एग्री टूरिज्म की शुरुआत कैसे हुई?
उत्तर: जब मैं गांव लौटा तो सबसे बड़ी समस्या जो सामने आई, वह यह थी कि किसानों को अपना सामान बेचने के लिए बाजार तक जाना पड़ता था. इसमें काफी मेहनत लगती थी और खर्चीला भी था. तब हमने सोचा क्यों न कुछ ऐसा किया जाए जिससे लोग सामान खरीदने के लिए खेत पर आएं. यहीं से शुरुआत हुई एग्री टूरिज्म की. हमने खेत को ही टूरिस्ट स्पॉट की तरह डेवेलप किया. टूरिस्ट पारंपरिक रहन-सहन और लोक संस्कृति को देखने के साथ ही किसानों से उनका सामान भी खरीदते हैं.

प्रश्र: अन्य किसानों को एग्री टूरिज्म के लिए मनाना कितना मुश्किल था?
उत्तर: शुरू में किसान इस काम के लिए तैयार नहीं हो रहे थे. उनका सवाल था कि कोई भी टूरिस्ट खेतों पर क्यों आएगा? उसे यहां क्या देखने को मिलेगा? फिर मैंने अपने ही खेत से इसकी शुरुआत की. मेरा खेत ऐसी जगह था, जहां लोग चाय पीने के लिए भी नहीं रुकते थे. लेकिन जब लोग वहां बड़ी संख्या में आने लगे तो बाकी किसानों को भी उत्सुकता हुई. आज 628 से अधिक गांवों में किसान एग्री टूरिज्म का काम कर अच्छी कमाई कर रहे हैं.

प्रश्र: बुंदेलखंड में एग्री टूरिज्म की क्या संभावनाएं देखते हैं?
उत्तर: बुंदेलखंड में एग्री टूरिज्म की अपार संभावनाएं हैं. यहां खेतों के आसपास किले भी हैं. बुन्देली लोक संस्कृति भी काफी प्रचलित है. इसके साथ ही यहां कई ऐसी फसलें उगाई जाती हैं जो अन्य जगहों पर आसानी से नहीं उग पातीं. अगर यहां के किसानों को सही से ट्रेनिंग दी जाए तो एग्री टूरिज्म को यहां स्थापित किया जा सकता है. इससे किसानों को बहुत लाभ होगा.

प्रश्न: अपने बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के साथ एमओयू साइन किया है. इस एमओयू से विद्यार्थियों को क्या लाभ होगा?
उत्तर: बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के विद्यार्थी काफी प्रतिभावान हैं. उनसे संवाद करने के बाद मुझे इस बात का एहसास हुआ कि अगर उन्हें सही तरीके से सिखाया जाए तो वे बुंदेलखंड के विकास में काफी योगदान दे सकते हैं. इस एमओयू की मदद से विश्वविद्यालय के कृषि और पर्यटन विभाग के विद्यार्थियों को ट्रेनिंग दी जाएगी. विद्यार्थी विश्वविद्यालय से थ्योरी सीखेंगे और उन्हें प्रैक्टिकल हम सिखाएंगे.

Tags: Bundelkhand news, Farming in India, UP news

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