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जानिए वृद्ध आश्रम में रहने वाले बुजुर्गों के अपनों से बिछड़ने की दर्द भरी कहानी

बुजुर्गों

बुजुर्गों का सम्मान करते वृद्धाश्रम के अधिकारी

उस उम्र में जब उन्हें सबसे ज्यादा परिवार की और ख्याल रखने वाले अपनों की जरूरत होती है. ऐसे में उन्हें अकेला छोड़ दिया जाता है अनजान लोगों के बीच रहना जहां उनके सामने एक चुनौती होती है कि वह एक बार फिर से उन्हीं लोगों के साथ नए रिश्ते बनाए और अपना जीवन अपनों के बिना ही गुजर बसर कर सकें.

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    शास्त्रों में कहा जाता है कि मां बाप के कर्ज को बच्चे कभी उतार नहीं सकते.वह आजीवन उनके ऋणी रहते हैं.पर यह तो बात हुई शास्त्रों की लेकिन हकीकत यह है कि आज भी कई मां-बाप को अपनी जिंदगी बच्चों से दूर वृद्ध आश्रमों में गुजारनी पड़ती है. उस उम्र में जब उन्हें सबसे ज्यादा परिवार की और ख्याल रखने वाले अपनों की जरूरत होती है. ऐसे में उन्हें अकेला छोड़ दिया जाता है अनजान लोगों के बीच रहना जहां उनके सामने एक चुनौती होती है कि वह एक बार फिर से उन्हीं लोगों के साथ नए रिश्ते बनाए और अपना जीवन अपनों के बिना ही गुजर बसर कर सकें.

    क्या सिर्फ एक दिन सम्मान काफी है
    विश्व वृद्ध दिवस के अवसर पर आज झांसी के एक वृद्ध आश्रम में कार्यक्रम आयोजित किया गया. जहां उनको फूलों की माला पहना कर सम्मानित किया गया.साथ ही कपड़े भी भेंट स्वरूप दिए गए. पर एक दिन का यह सम्मान क्या उनके लिए काफी है. वृद्धाश्रम में रहने वाले हर किसी की अपनी एक अलग कहानी है. कुछ लोग जहां उनको अकेला छोड़ने के लिए पूरी तरह अपने बच्चों को जिम्मेदार ठहराते हैं वहीं दूसरी ओर कुछ ऐसे भी हैं जो इसे होनी का नाम दे देकर दूर से ही सही उन्हें मन ही मन आशीर्वाद देते हैं.

    बेटे को मानती हैं दोषी
    वृद्ध आश्रम में रहने वाली शांति देवी बताती हैं कि उनके दो बेटे थे. एक की मृत्यु हो चुकी है और दूसरा उन्हें अपने साथ रखना नहीं चाहता. उनका कहना है कि बेटे ने कह दिया घर छोटा है तुम यहां नहीं रह सकती.पिछले 2 साल से आश्रम में रह रही शांति देवी भावुक होते हुए कहती हैं कि यह उनके ही पिछले जन्म के कर्म होंगे जिसका नतीजा वह झेल रही हैं. वह आश्रम में काम कर रहे लोगों को ही अपना परिवार बताती हैं.इतना ही नही अपने बेटे और पोते-पोती को दिल से आशीर्वाद भी देती है क्योंकि मां आखिर मां होती है.जो अपने बच्चों की करतूत पर भी उनका कभी भी बुरा नही सोच सकती.

    वृद्धाश्रम के साथियों को ही बनाया परिवार
    वहीं दूसरी ओर जीवनराम है जो कहते हैं क्योंकि चार बेटियां और एक बेटा है.चारों बेटियों की वह शादी कर चुके हैं. बेटा बेरोजगार है और उसके पास अपना पेट पालने तक के पैसे नहीं हैं, तो वह मुझे क्या रखेगा. वह अपने बेटे को दोषी नहीं मानते हैं और कहते हैं कि उनका बेटा कभी कभी उनसे मिलने आ जाता है. जीवन राम ने भी आश्रम के साथियों को ही अपना परिवार मान लिया है.

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