होम /न्यूज /उत्तर प्रदेश /

बंटवारे का दर्द: आंखों में आंसू, चेहरे पर दबी मुस्कान, झांसी के बलवंत सिंह से सुनिए भारत-पाक विभाजन की कहानी

बंटवारे का दर्द: आंखों में आंसू, चेहरे पर दबी मुस्कान, झांसी के बलवंत सिंह से सुनिए भारत-पाक विभाजन की कहानी

Azadi Ka Amrit Mahotsav: 15 अगस्त 1947 को जहां भारत एक तरफ़ आज़ादी का जश्न मना रहा था तो वहीं दूसरी ओर विभाजन का दंश भी झेल रहा था. बड़ी संख्या में लोग पलायन कर रहे थे. कई लोगों को अपना घर, जमीन, कामकाज छोड़ कर पाकिस्तान से हिंदुस्तान आना पड़ा. 

अधिक पढ़ें ...

हाइलाइट्स

रावलपिंडी रेलवे स्टेशन पहुंचे तो वहां जितनी भी ट्रेन आ रही थीं, उसमें सिर्फ लाशें थीं
15 लाख से ज्यादा लोगों ने इस विभाजन का दंश झेला था

रिपोर्ट: शाश्वत सिंह

झांसी: “याद तो इतनी आती है कि क्या बताएं? जहां बचपन बिताया उसकी याद तो हमेशा आयेगी.” यह बात कहते हुए बलवंत सिंह चावला की आंखें नम हो जाती हैं. चेहरे पर दबी मुस्कान और आंखों में नमी के साथ बलवंत सिंह अपनी कहानी बयान करते हैं. 1947 में बलवंत पाकिस्तान के गुजरात जिले के सोहावा गांव से हिंदुस्तान आए थे. वह बताते हैं कि उनका परिवार वहां काफी संपन्न था, लेकिन विभाजन के बाद वह सबकुछ छोड़कर हिंदुस्तान आ गए. उन्होंने बताया कि उन्हें अपने पुश्तैनी घर और गुरुद्वारे की याद आज भी आती है.

बलवंत सिंह बताते हैं कि जिस क्षेत्र में वह रहते थे, वहां दंगे जैसे माहौल नहीं थे. गांव के मुसलमानों ने उनका पूरा साथ दिया. शुरूआत में उनके साथी उनसे कहते रहे कि पाकिस्तान में ही रुक जाइए, लेकिन, देश के प्रति प्यार के चलते उन्होंने हिंदुस्तान आने का फैसला किया. उन्होंने कहा कि अधिकतर लोग तो हिन्दुस्तान आ गए थे पर जो वहां रह गए उन्हें जबरदस्ती मुसलमान बना दिया गया.

ट्रेन से पहुंचे थे अमृतसर
बलवंत सिंह चावला के पुत्र डॉ आरएस चावला ने बताया कि उनके पिताजी जब रावलपिंडी रेलवे स्टेशन पहुंचे तो वहां जितनी भी ट्रेन आ रही थीं, उसमें सिर्फ लाशें थीं. बलवंत सिंह और उनके साथियों ने सबसे आखिरी ट्रेन पकड़ी और सभी गेट बंद कर लिए. इसके बाद वह ट्रेन जिन भी स्टेशनों से गुजरी वहां उन्होंने गेट नहीं खोले और ऐसे ही मुश्किलों का सामना करते हुए अमृतसर स्टेशन पर पहुंचे थे. इसके बाद उन्होंने यहां कई अलग-अलग काम किए और अंत में झांसी में कपड़े की दुकान शुरू की. इस दुकान को आज उनके बेटे चरणजीत चावला संभालते हैं.

कई लोगों ने झेला विभाजन का दंश
15 अगस्त 1947 को जहां भारत एक तरफ़ आज़ादी का जश्न मना रहा था तो वहीं दूसरी ओर विभाजन का दंश भी झेल रहा था. बड़ी संख्या में लोग पलायन कर रहे थे. कई लोगों को अपना घर, जमीन, कामकाज छोड़ कर पाकिस्तान से हिंदुस्तान आना पड़ा. 15 लाख से ज्यादा लोगों ने इस विभाजन का दंश झेला था. इन्हीं में से एक बलवंत सिंह चावला भी थे. बलवंत सिंह युवाओं से कहते हैं कि हम सबको देश को अखंड रखने का प्रयास हमेशा करते रहना चाहिए.

Tags: Azadi Ka Amrit Mahotsav, Jhansi news, UP latest news

अगली ख़बर