कारगिल दिवस: एक साल के बेटे के लिए शहीद योगेंद्र ने आखिरी चिट्ठी में लिखी थी ये बात

शहीद के पुत्र रविकांत का कहना है कि जब उनके पिता शहीद हुए तब वह केवल एक वर्ष के थे. पिता के शहादत की कहानी उन्होंने परिजनों व गांव वालों से सुनी.

News18 Uttar Pradesh
Updated: July 26, 2019, 4:18 PM IST
कारगिल दिवस: एक साल के बेटे के लिए शहीद योगेंद्र ने आखिरी चिट्ठी में लिखी थी ये बात
शहीद योगेंद्र पाल
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Updated: July 26, 2019, 4:18 PM IST
26 जुलाई को कारगिल युद्ध को बीस साल बीत चुके हैं. इस युद्ध में हिंदुस्तानी फौज के जाबांज सिपाहियों ने जीत का परचम फहराया था. इस युद्ध में देश के सैकड़ों जवान भी शहीद हुए थे. कारगिल युद्ध को भले ही बीस साल हो चुके हों, लेकिन इसमें शहीद हुए वीर जवानों के परिवार आज भी अपने घर के उस चिराग याद कर अपनी आंखें नम कर रहे हैं. जालौन के डकोर ब्लॉक के गांव चिल्ली के निवासी शहीद योगेंद्र पाल सिंह भी इसी युद्ध मे वीरगति को प्राप्त हुए थे. शहीद योगेंद्र ईएमई 631 रेजिमेंट में वर्ष 1996 में भर्ती हुए थे. जिसके बाद वर्ष 1999 में कारगिल युद्ध मे दुश्मनों से लोहा लेते हुए वह शहीद हो गए.

जब शहीद हुए बेटा एक साल का था

शहीद योगेंद्र की शहादत पर उनके गांव में जिस विद्यालय में वह पढ़े थे उसी विद्यालय में उनका स्मारक बनाया गया है. जो वहां पढ़ने वाले छात्रों में देश सेवा का भाव उत्पन्न करता है. शहीद के पुत्र रविकांत का कहना है कि जब उनके पिता शहीद हुए तब वह केवल एक वर्ष के थे. पिता के शहादत की कहानी उन्होंने परिजनों व गांव वालों से सुनी. कहते हैं अगर देश सेवा का मौका मिले तो वह भी सेना में जाना चाहेंगे.

आखिरी चिट्ठी में लिखी ये बात

रविकांत कहते हैं, अपनी मां व परिजनों से सुना है कि जब कारगिल युद्ध चल रहा था तब उनके पिता युद्ध लड़ रहे थे, लेकिन परिवार को सांत्वना देने के लिए वह युद्ध में शामिल न होने की बात कहते थे. रविकांत कहते हैं मां बताती है कि आखिरी चिट्ठी में लिखा था कि अगर दिवाली पर वे छुट्टी में घर आए तो सभी मिलकर त्योहार मनाएंगे, नहीं तो जय हिन्द, जय भारत.

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शहीद के बेटे रविकांत


वहीं शहीद के भाई महेंद्र सिंह का कहना है कि युद्ध के समय उनके भाई कुपवाड़ा में तैनात थे. युद्ध के कारण सभी सैनिकों का खाना पीना भी दुश्वार था. सभी देश सेवा में अपना सबकुछ न्योछावर करने के लिए तैयार थे. जब उनकी अंतिम चिट्ठी घर आई तो सबकी आंखें नम हो गईं थीं. चिट्ठी में लिखा था कि 'अगर वह घर आये तो दिवाली साथ मनाएंगे, नहीं तो जय हिन्द जय भारत".
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शहीद योगेंद्र के भाई महेंद्र सिंह


दोस्त आज भी करते हैं याद

वहीं शहीद के साथ बचपन गुजारने वाले उनके मित्रों का कहना है कि वह शुरू से ही पढाई लिखाई के साथ-साथ खेल कूद में भी आगे थे. बाद में वह सेना में भर्ती हो गए थे. सेना में भर्ती होने का जज्बा उनमे इस कदर था कि उन्होंने इस कारण रेलवे में हुआ अपना सिलेक्शन भी ठुकरा दिया था. जब उनके शहीद होने की खबर आई तो गांव का माहौल गमगीन हो गया था. लेकिन कहीं न कहीं उनकी छाती भी फक्र से चौड़ी हो गई थी. शहीद योगेंद्र पाल ने गांव के नौजवानों के लिए देश सेवा की प्रेरणा कायम की है.

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First published: July 26, 2019, 4:18 PM IST
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