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UP: बुंदेलखंड पर भीषण सूखे का मंडराया साया, मानसून की बेरुखी से किसानों को भारी नुकसान

UP: बुंदेलखंड में मौसम की बेरुखी से भीषण सूखे का संकट खड़ा होता दिख रहा है.

UP: बुंदेलखंड में मौसम की बेरुखी से भीषण सूखे का संकट खड़ा होता दिख रहा है.

Jhansi News: साल 2021 बुन्देलखण्ड के किसानों के लिए एक बार फिर भीषण सूखे की त्रासदी का संकेत लेकर आता हुआ दिखाई दे रहा है. ज्यादातर खेतों में बुवाई नहीं हुई है.

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झांसी. बुंदेलखंड (Bundelkhand) क्षेत्र इस साल भीषण सूखे (Drought) की चपेट में है. बारिश न होने और खेतों में नमी न होने के कारण ज्यादातर खेतों में बुवाई नहीं हुई है. बहुत से किसान ऐसे हैं, जिन्होंने बारिश की उम्मीद से तिल, उड़द आदि बो दी थी लेकिन बारिश न होने के बाद बीज सूख गए और उन्हें हजारों रुपए का नुकसान हो गया है. बुंदेलखंड में मॉनसून सामान्यत: 15 जून तक पहुंच जाता था. लेकिन इस बार एक महीने की देरी के बावजूद मॉनसून के बादल नहीं बरसे हैं.

जन जल जोड़ो अभियान के संयोजक संजय सिंह ने बताया कि बुंदेलखंड भीषण सूखे की जद में है. उनका कहना है, “इस साल कोविड-19 के कारण किसानों की अधिकांश आय इलाज पर खर्च हो गई है. उन्हें मौजूदा फसल से बहुत उम्मीद थी लेकिन उनकी उम्मीदों पर पानी फिर गया है. 15 जुलाई तक इतनी कम बारिश बुंदेलखंड में नहीं देखी गई है.” मौजूदा वर्ष की तुलना 2002 के सूखे से करते हुए संजय सिंह बताते हैं कि 2002 में 15 जुलाई तक राज्य में सूखे की घोषणा कर दी गई थी. उनका कहना है कि अगर 15 जुलाई तक 50 प्रतिशत बारिश न हो तो नियमों के अनुसार, सूखे की घोषणा करनी पड़ती है. हालांकि इस साल ऐसी किसी घोषणा की सुगबुगाहट नहीं है. वह बताते हैं कि मौजूदा सीजन में नुकसान का असर अगले फसल चक्र पर भी पड़ेगा.

सूख गया तिल

बुन्देलखण्ड के मीगनी गांव के माता प्रसाद तिवासी ने अपने 4 हेक्टेयर के खेत में करीब 50 हजार रुपए खर्च कर पिछले महीने जून के मध्य में तिल बोया था. लेकिन खेतों में बारिश की एक बूंद नहीं गिरी, जिससे खेतों को नमी नहीं मिल पाई और तिल का बीज सूख गया. 60 साल के माता प्रसाद बताते हैं कि उन्होंने 1988-89 में ऐसी परिस्थिति देखी थी. उस साल बुंदेलखंड में भीषण सूखा पड़ा था. यह सूखा बुंदेलखंड के सबसे खतरनाक सूखों में एक था. तब से पहली बार मॉनसून की बारिश में इतनी देर हुई है. उन्होंने माना कि इस साल सूखे के पूरे आसार हैं.



माता प्रसाद के अनुसार, “अगर तीन-चार दिन में बारिश नहीं हुई तो किसानों के लिए पूरा सीजन बेकार चला जाएगा.” बुन्देलखण्ड के एक और किसान बिंद्रावन प्रसाद बताते हैं कि इस साल मॉनसून से पहले वाली बारिश भी नहीं हुई. इस बारिश से खेतों में थोड़ी बहुत नमी आ जाती थी और किसान बुवाई कर देते थे. बिंद्रावन के करीब 25 बीघा खेत हैं. उन्होंने तिल, अरहर और मूंग की फसल की तैयारी की थी. वह बताते हैं कि अगर इस साल अच्छी खेती नहीं हुई तो उनकी माली हालत बहुत खराब हो जाएगी.

बिंद्रावन की पिछले साल की सारी बचत परिवार की बीमारी पर खर्च हो गई है. कोविड-19 की दूसरी लहर के दौरान उनके परिवार के सभी 6 सदस्य बीमार हो गए थे. बिंद्रावन बताते हैं, “मेरा परिवार पहले से कर्ज में डूबा है. मेरी आर्थिक स्थिति इतनी बुरी हो चुकी है कि मैंने अपने दो बेटों को कमाने के शहर में भेज दिया है क्योंकि इस साल खेती से उम्मीद न के बराबर है.”

बुवाई क्षेत्र में गिरावट

बुन्देलखण्ड के किसान बच्ची प्रसाद ने भी अपने 10 बीघा के खेत में तिल की बुवाई कर दी थी लेकिन बारिश न होने पर बीज सूख गए. बच्ची प्रसाद के बेटे घनश्याम कुमार बताते हैं कि यह मौसम तो बेकार हो गया. बीज सूखने के बाद खेतों में पैदावार की उम्मीद नहीं है. घनश्याम के मुताबिक, “इस समय तक तिल की फसल खड़ी हो जाती थी लेकिन इस बार बीज ही नहीं डाला गया. अब रबी के मौसम से ही उन्हें उम्मीद बची है.”

बुन्देलखण्ड कर अधिकांश गांवों के किसानों की स्थिति बच्ची प्रसाद जैसी ही हैं. बहुत से किसान खरीफ के मौसम में तिल की फसल बोते हैं. गांव में बहुत से किसान ऐसे हैं, जिन्होंने किराए के ट्रैक्टर के जरिए दो-दो बार अपने खेतों की जुताई करा दी है लेकिन वे अब तक बुवाई नहीं कर पाए हैं. उनका बीज और जुताई का खर्च व्यर्थ हो गया है.

कीमतों पर पड़ सकता है असर

कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के डायरेक्टोरेट ऑफ इकॉनोमिक्स एंड स्टेटिस्टिक्स के अनुसार, उत्तर प्रदेश में सामान्यत: 3.75 लाख हेक्टेयर में तिल की बुवाई की जाती है लेकिन 8 जुलाई 2021 तक 0.69 लाख हेक्टेयर में ही तिल बोया गया है. यानी इस साल तिल की बुवाई काफी कम हुई है और इसका असर उसकी कीमत पर भी पड़ सकता है.

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