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वह मंदिर जहां झांसी की रानी रोज करती थी पूजा अर्चना

लक्ष्मी

लक्ष्मी ताल के बगल में स्थित है महालक्ष्मी मंदिर

झांसी के निवासियों की इस मंदिर के प्रति अटूट आस्था है.दीपावली व महालक्ष्मी वाले दिन विशेष रूप से लोग पूजा-अर्चना करने के लिए पहुंचते हैं और माता महालक्ष्मी से धन-धान्य की संपन्नता के लिए प्रार्थना करते हैं.

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    झांसी के लक्ष्मी ताल के पास स्थित महालक्ष्मी मंदिर झांसीवासियों के लिए आस्था का एक बड़ा केन्द्र है.झांसी के निवासियों की इस मंदिर के प्रति अटूट आस्था है.दीपावली व महालक्ष्मी वाले दिन विशेष रूप से लोग पूजा-अर्चना करने के लिए पहुंचते हैं और माता महालक्ष्मी से धन-धान्य की संपन्नता के लिए प्रार्थना करते हैं.

    झांसी की रानी खुद करती थी मंदिर का रख रखाव

    इस मंदिर का निर्माण 18 वीं शताब्दी में रघुनाथराव (द्वितीय) नेवालकर द्वारा करवाया गया था. 1769 में उन्हें  झांसी का सूबेदार नियुक्त किया गया था.महालक्ष्मी मंदिर में विराजमान \’देवी लक्ष्मी’ झांसी रानी की कुल देवी हैं.हिंदू शासक और झांसी की सामान्य जनता देवी महालक्ष्मी की परम भक्त रही है.मौजूदा समय में इस मंदिर की देखरेख का जिम्मा पुरातत्व विभाग के हाथों में है. इस मंदिर में नित्य पूजा अर्चना के लिए पुजारी की व्यवस्था है.मंदिर में सुबह और शाम, दोनों ही टाइम आरती होती है.
    दो मंजिल के इस मन्दिर में हर मंजिल पर छह-छह कमरे और चार बरामदों का निर्माण कराया गया है.मंदिर में एक गर्भगृह, एक मंडप और उसके सामने विशाल मुख्य मंडप बनाया गया है. गर्भगृह में सफेद संगमरमर की लक्ष्मी जी की प्रतिमा स्थापित है. वहीं, निचले तल पर स्थित मंदिर में नंदी, शिवलिंग, विष्णु, गणेश व भैरव आदि की उत्तर मध्यकाली प्रतिमाएं स्थापित हैं.एक समय में इस मंदिर के रख रखाव पूरी जिम्मेदारी रानी लक्ष्मी बाई उठाती थीं.

    16 दिनों तक चलती है महालक्ष्मी पूजा

    भाद्रपद महीने के शुक्लपक्ष की अष्टमी से आश्विन माह के कृष्णपक्ष की अष्टमी तक 16 दिनों का महालक्ष्मी व्रत किया जाता है। इन सोलह दिनों में नित्य प्रतिदिन महालक्ष्मी का पूजन किया जाता है। व्रत पूर्ण होने वाले दिन हवन करके ब्राह्मणों को भोजन करवाया जाता है। व्रत के प्रभाव से मनुष्य पर महालक्ष्मी माता की कृपा बरसती है और आर्थिक स्थिति ठीक होती है। इससे सुख-समृद्धि का वास होता है। इस बार यह व्रत 14 सितंबर से 29 सितंबर 2021 तक किया जाएगा। यह व्रत स्त्री-पुरुष दोनों समान रूप से कर सकते हैं।

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