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झांसी में एक ऐसा महाभारत कालीन शिव मंदिर जहां आज भी पहली पूजा का अनसुलझा है रहस्य  

नंदी

नंदी पर सवार शिवलिंग

इस मंदिर में शिवलिंग नंदी की पीठ पर स्थापित हैं और यही विशेषता इसे दुर्लभ बनाती है.इतना ही नही मान्यता है कि आज भी इस मंदिर के शिवलिंग की पहली पूजा अदृश्य शक्ति के द्वारा ही की जाती है.

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    झांसी के मऊरानीपुर तहसील में एक ऐसा महाभारत कालीन शिव मंदिर स्थित है.जहां आज भी पहली पूजा का रहस्य आज भी अनसुलझा ही है.मऊरानीपुर तहसील से लगभग आठ किलोमीटर दूर पहाड़ी पर बना केदारेश्वर मंदिर भक्तों से भरा रहता है क्योंकि यह मंदिर देशभर के दुर्लभ मंदिरों में से है. इस मंदिर में महादेव का शिवलिंग एक अलग ही रूप लिए हुए हैं.इस मंदिर में शिवलिंग नंदी की पीठ पर स्थापित हैं और यही विशेषता इसे दुर्लभ बनाती है.इतना ही नही मान्यता है कि आज भी इस मंदिर के शिवलिंग की पहली पूजा अदृश्य शक्ति के द्वारा ही की जाती है.

    चंदेल राजाओं ने बनवाया था मंदिर
    मंदिर की पुजारी ने बताया कि यह मंदिर दसवी शताब्दी का है.इसे चंदेलकाल में बनाया गया.इतना प्राचीन होने के बाद भी मंदिर काफी अच्छी स्थिति में है.यह भूतल से लगभग 200 मीटर ऊंची पहाड़ी पर है.मंदिर के निर्माण में सैंड स्टोन का इस्तेमाल किया गया है. नायाब मूर्तिकला और नक्काशी इस मंदिर की विशेषता है. मंदिर का दरवाजा पत्थर का है और इस पर बेहद सुंदर नक्काशी की गई है. मंदिर के गर्भगृह में स्थित नंदी की प्रतिमा की पीठ पर शिवलिंग बना है और गर्भगृह की छत पर कमल के फूलों की सुदंर नक्काशी भी है.

    मनुष्य यहां नहीं कर सकते प्रथम पूजा
    मंदिर से जुड़ी कई स्थानीय मान्यताएं भी हैं. लोगों का मानना है कि मंदिर मे कोई इंसान कभी पहली पूजा नहीं कर पाता.सुबह के समय जब मंदिर के कपाट खोले जाते हैं तब ऐसा प्रतीत होता है कि कोई अदृश्य शक्ति पहले ही पूजा करके जा चुकी है. यहां के पुजारी बताते हैं कि मंदिर में भगवान शिव की पूजा सबसे पहले कोई इंसान कभी नहीं कर सका है.जानकारों की मानें तो इस मंदिर का संबंध द्वापर युग से है.महाभारत युद्ध के पश्चात जब पांडवों को भगवान शिव से मिलना था, तो उस समय भगवान शिव एक जंगली भैंसे के रूप में छिप गए थे.बाद में भीम ने उन्हें पहचाना था. इसके बाद भगवान शिव के आदेश पर और कृष्ण के सुझाव पर अर्जुन ने इस शिवलिंग की यहां पर स्थापना की थी.

    (रिपोर्ट – शाश्वत सिंह)

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