ANALYSIS: डिंपल यादव का मायावती के पैर छूने के पीछे ये है सियासी गणित

मंच पर मायावती के पैर छूतीं डिंपल यादव की तस्वीर बहुत कुछ कहती है. कहा जाता है कि राजनीति में कुछ भी बिना वजह नहीं होता. तो कन्नौज में डिंपल के मायावती के पैर छूना क्या कोई सियासी चाल है?

Anil Rai | News18 Uttar Pradesh
Updated: April 26, 2019, 7:49 PM IST
ANALYSIS: डिंपल यादव का मायावती के पैर छूने के पीछे ये है सियासी गणित
कन्नौज रैली के दौरान मायावती व डिंपल यादव
Anil Rai
Anil Rai | News18 Uttar Pradesh
Updated: April 26, 2019, 7:49 PM IST
कन्नौज में एक चुनावी रैली के दौरान मंच पर मायावती के पैर छूतीं डिंपल यादव की तस्वीर बहुत कुछ कहती है. कहा जाता है कि राजनीति में कुछ भी बेेवजह नहीं होता. तो आखिर कन्नौज में यादव परिवार की बहू और एसपी सुप्रीमो अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव के बसपा सुप्रीमो मायावती के पैर छूना क्या कोई सियासी चाल है?

इसे समझने के लिए 2014 लोकसभा चुनाव के गणित को देखना पड़ेगा. 2014 के लोकसभा चुनाव में डिंपल यादव कन्नौज सीट सिर्फ 19,907 वोटों से जीत पाई थीं, जबकि यहां बीएसपी उम्मीदवार निर्मल तिवारी को 1 लाख 27 हजार से ज्यादा वोट मिले थे. उस समय बीजेपी और बीएसपी के ब्राह्मण उम्मीदवार मैदान में थे.



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साफ है, बीएसपी का इस सीट पर ठीक-ठाक वोट बैंक है. ऐसे में जब बीएसपी के 2014 में उम्मीदवार रहे निर्मल तिवारी बीजेपी के साथ चले गए हैं तो एसपी की नजर गठबंधन के सहारे उनसे जुड़े बड़े वोट बैंक पर है. डिंपल बीएसपी सुप्रीमो मायावती के पैर सार्वजनिक तौर पर छूकर उसी वोट बैंक को साधने की कोशिश करती नजर आईं.

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बात करें कन्नौज के राजनीतिक इतिहास की तो ये सीट भी 1989 से मुलायम सिंह यादव का गढ़ रही है. 1998 में सिर्फ एक बार बीजेपी के चन्द्रभूषण सिंह इस अभेद्य किले को ढहाने में सफल हो पाए थे. पहले ये सीट जनता दल और फिर समाजवादी पार्टी के पाले में रही. इस सीट से सपा परिवार के तीनों बड़े चेहरे मुलायम सिंह यादव, अखिलेश यादव और डिंपल यादव चुनाव लड़ चुके हैं.

मायावती से आशीर्वाद लेती हुईं डिंपल यादव

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इस सीट ने किसी को निराश नहीं किया. वहीं, डिंपल को 2012 के उप चुनाव में निर्विरोध जिताकर लोकसभा भेजा था. इस सीट से अपने पहले तीन चुनाव एसपी अध्यक्ष अखिलेश यादव जीते और बाद में उनकी पत्नी डिंपल यादव यहां से सांसद रहीं. 2014 में बीजेपी इस किले को पूरी ताकत लगाने के बाद भी नहीं भेद पाई थी, लेकिन मोदी लहर ने किले की दिवार को दरका जरूर दिया था.

बीजेपी 2019 के लोकसभा चुनाव में बने इस कम अंतर को ही अपनी ताकत मान रही है. 18 लाख के करीब वोटरों वाली इस सीट पर करीब ढाई लाख यादव और करीब 5 लाख मुस्लिम हैं. यानी जातीय गणित में करीब साढ़े सात लाख वोटर डिंपल यादव के पाले में दिख रहे हैं. लेकिन, चुनाव जीतने के लिए 9 लाख से ज्यादा वोटों की जरूरत होगी, क्योंकि इस सीट पर मुकाबला आमने-सामने का है. डिंपल मायावती से आशीर्वाद में वही डेढ़ लाख वोटों की उम्मीद कर रही होंगी.

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