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कानपुर का 'जादुई' मंदिर वैज्ञानिकों के लिए कौतूहल, देता है मॉनसून की सटीक सूचना

यही है वह संरक्षित मंदिर. इनसेट में बाईं ओर मंदिर का वह पत्थर जिससे पानी की बूंदें टपकती हैं और उससे मॉनसून का अनुमान होता है.

मंदिर की छत पर मॉनसून पत्थर लगा हुआ है. इस पत्थर से टपकने वाली बूंदों से अंदाजा लग जाता है कि बारिश कैसी होगी. अगर ज्यादा बूंदे टपकती हैं तो ज्यादा बारिश होने की संभावनाएं बनती हैं.

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कानपुर. भारत देश को मंदिरों का देश का कहा जाता है. जहां आस्था के प्रतीक तमाम नायाब मंदिर मौजूद हैं. इनमें कुछ मंदिर ऐसे भी हैं जिनकी वास्तुकला अनोखी है. वहीं इन मंदिरों में कई ऐसे हैं जो विज्ञान के मामले में भी बेजोड़ हैं. यूपी के कानपुर में ऐसा ही एक मंदिर है जो मॉनसून की सटीक सूचना देता है. भारतीय पुरातत्व विभाग के संरक्षित स्मारकों में शामिल यह मंदिर देश भर के वैज्ञानिकों के लिए कौतूहल का विषय बना हुआ है.

बेहटा बुजुर्ग गांव में है यह जगन्नाथ मंदिर

कानपुर से तकरीबन 50 किमी दूर बेहटा बुजुर्ग गांव में बने इस जगन्नाथ मंदिर को मॉनसून मंदिर के नाम से भी जाना जाता है. इस मंदिर में भगवान जगन्नाथ की प्रतिमा स्थापित है. मंदिर की छत पर मॉनसून पत्थर लगा हुआ है. इस पत्थर से टपकने वाली बूंदों से अंदाजा लग जाता है कि बारिश कैसी होगी. अगर ज्यादा बूंदे टपकती हैं तो ज्यादा बारिश होने की संभावनाएं बनती हैं. यह कोरी मान्यता नहीं है, इसमें पूरा विज्ञान है. मंदिर बनाते समय ही संभवतः इस बात का ध्यान रखा गया होगा. मंदिर की दीवारों और छत इस तरह से बनाई गई हैं कि ये मॉनसून शुरू होने के 5-7 दिन पहले ही संकेत देना शुरू देती हैं.

4200 साल पुराना इतिहास

बताया जाता है कि यह मंदिर कई बार टूटा और बना. कई बार मंदिर का जीर्णोद्धार भी किया गया है. जब देश में बौद्धधर्म चरम पर था, उस वक्त की स्थापत्य कला भी मंदिर के निर्माण में देखने को मिलती है. मंदिर के पत्थरों की कार्बन डेटिंग से पता चला है कि यह 4 हजार 2 सौ साल पुराना है. यह मंदिर तीन भागों में बना हुआ है. गर्भगृह का एक छोटा भाग है और फिर बड़ा भाग है. ये तीनों भाग अलग-अलग काल में बने हैं. यहां भगवान विष्णु की प्रतिमा स्थापित है. यहां विष्णु के 24 अवतारों की, पद्मनाभ स्वामी की मूर्ति स्थापित हैं. मंदिर की देखरेख करने वाले केपी शुक्ला ने बताया कि मंदिर के इतिहास को लेकर कई मतभेद हैं. पुराने समय में अलग-अलग राजाओं ने मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया है. मंदिर में पत्थर का पद्म चिह्न भी लगा हुआ है. ऐसी मान्यता है कि चिह्नों और प्रतीकों की पूजा सिंधुघाटी सभ्यता के दौरान की जाती थी.

रिसर्च के लिए आते रहे हैं वैज्ञानिक

मंदिर को जहां मॉनसून और बारिश की भविष्यवाणी के लिए जाना जाता है, वहीं मंदिर के शिखर पर लगे सूर्य चक्र का भी विशेष महत्व बताया जाता है. ऐसी मान्यता है कि इस सूर्य चक्र की वजह से इलाके में कभी बिजली नहीं गिरती. इस मंदिर को रथ के आकार में बनाया गया है. क्षेत्र के ही नहीं, दूर-दूर से श्रद्धालु यहां पर दर्शन करने के लिए आते हैं. भारतीय पुरातत्व विभाग को ओर से मंदिर की देखरेख के लिए तैनात केयर टेकर का कहना है कि दो तीन साल पहले तक लगातार यहां पर वैज्ञानिकों का आना-जाना लगा रहता था. कई बार यहां पर वैज्ञानिक रिसर्च के लिए आ चुके हैं, लेकिन कुछ खास जानकारी नहीं जुटा पाए. कोरोना की वजह से फिलहाल यह मंदिर सुबह और शाम एक एक घंटे के लिए ही खुलता है.
Published by:Anurag Anveshi
First published: