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शादी से बचने के लिए कानपुर आए थे भगत सिंह और बन गए थे पत्रकार 

शादी से बचने के लिए कानपुर आए थे भगत सिंह और बन गए थे पत्रकार 

फीलखाना

फीलखाना इलाके की प्रताप प्रेस बिल्डिंग के इसी कमरे से प्रकाशित होता था प्रताप 

आज़ादी की लड़ाई में बार-बार भगत सिंह की शादी आड़े आ रही थी. जिससे बचने के लिए वह 1926 में कानपुर भाग आए. यहां आकर उन्होंने पत्रकार शिरोमणि पं. गणेश शंकर विद्यार्थी से मुलाक़ात की. उनसे मुलाक़ात के बाद उन्होंने प्रताप अख़बार में लेख लिखने शुरू कर दिए और उसे ही अपना ठिकाना बना लिया.

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    स्वतंत्रता की हर एक लड़ाई का कानपुर से गहरा नाता रहा है. यहां की धरती कई स्वतंत्रता सेनानियों की जन्मस्थली और कर्मस्थली रही है. शहीद-ए-आजम भगत सिंह भी उनमें से एक है. उन्होंने कानपुर आकर क्रांति की अलख जगाई और स्वतंत्रता के आन्दोलनों को जन-जन तक पहुंचाया था. इस दौरान वह अपना भेष बदल चुके थे. इस दौरान उन्होंने प्रताप अख़बार में कई लेख भी लिखे.

    प्रताप अख़बार को बनाया था ठिकना
    इस बारे में इतिहासकार अनूप शुक्ला बताते हैं कि आज़ादी की लड़ाई में बार-बार भगत सिंह की शादी आड़े आ रही थी. जिससे बचने के लिए वह 1926 में कानपुर भाग आए. यहां आकर उन्होंने पत्रकार शिरोमणि पं. गणेश शंकर विद्यार्थी से मुलाक़ात की. उनसे मुलाक़ात के बाद उन्होंने प्रताप अख़बार में लेख लिखने शुरू कर दिए और उसे ही अपना ठिकाना बना लिया.

    बलवंत के नाम से लिखते थे लेख
    अनूप शुक्ला जगमोहन विकसित की स्मृति याद करते हुए बताते है कि वह भगत सिंह के साथ प्रताप में नौकरी करते थे. लेकिन, वह उन्हें कई दिनों तक पहचान नहीं पाए. इस दौरान उन्होंन अपना नाम बलवंत रख लिया था और इसी छद्म नाम से प्रताप में लेख लिखने लगे थे. असेंबली बम कांड के बाद जब उनका व बट्केश्वर दत्त का फ़ोटो सार्वजनिक हुआ तब वह उन्हें पहचान पाए.यहां उन्होंने क़रीब नौ माह तक काम किया था

    माता- पिता के शादी के आश्वासन के बाद गए थे वापस
    उन्होंने बताया कि भगत सिंह के घर छोड़कर जाने से उनके माता-पिता काफ़ी परेशान थे. जब उन्हें पता चला कि भगत कानपुर में हैं तो उन्होनों पं. गणेश शंकर से संपर्क साधा और उन्हें वापस भेजने को कहा. लेकिन, भगत वापस जाने को तैयार न हुए.जब उनके माता-पिता ने शादी न कराने का आश्वासन दिया. तब वह वापस गए.

    कानपुर में लेनिन व मार्क्स को पढ़कर तीव्र हो गई थी आज़ादी की मशाल
    कानपुर पूरब का मैनचेस्टर कहा जाता है. यही पर आज़ादी के पहले से ही बड़े पैमाने पर उद्योग धंधे लगे थे. जिसके चलते यहां लेबर यूनियनें का काफ़ी सक्रिय थीं और उन पर मार्क्स व लेनिन का काफ़ी प्रभाव था. भगत सिंह भी यहां आकर उनसे प्रभावित हुए और कानपुर में ही उनके बारे में पढ़ा. उन्हें पढ़ने के बाद उनके अंदर जल रही आज़ादी की आग मशाल बनकर भड़क उठी थी.

    कानपुर से बिठूर तक थी सुरंग
    प्रताप प्रेस बिल्डिंग में रहने वाले ओम प्रकाश शर्मा बताते हैं. उनके सामने यहां से प्रताप अख़बार निकलता था. उस दौरान प. गणेश शंकर विद्यार्थी के पास कई क्रांतिकारी आते थे और छिपकर इसी बिल्डिंग में रहा करते थे. वह बताते हैं कि उस समय पुलिस क्रांतिकारी को ढूंढ कर पकड़ रही थी. इसलिए वह यहां सड़क मार्ग से नहीं बल्कि सुरंग से आते थे. उनकी माने तों तब प्रताप प्रेस बिल्डिंग की नीचे से एक सुरंग बनी हुई थी. जो शहर के बाहर बिठूर इलाक़े में निकलती थी. जिस मार्ग से क्रांतिकारी आते-जाते रहते थे.
    न्यूज 18 लोकल के लिए आलोक तिवारी की रिपोर्ट

    Tags: Kanpur news

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