फेफड़े के कैंसर में कीमोथेरेरी का विकल्प बनेगी कीमो टैबलेट

News18 Uttar Pradesh
Updated: August 19, 2019, 2:31 PM IST
फेफड़े के कैंसर में कीमोथेरेरी का विकल्प बनेगी कीमो टैबलेट
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कीमो टैबलेट फेफड़ों में कैंसर कोशिकाओं के विकास को पूरी तरह रोक देती है. इसमें एपिडर्मल ग्रोथ फैक्टर नाम का एक प्रोटीन होता है जो कोशिकाओं का विकास करता है.

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फेफड़े के कैंसर (Lung Cancer) रोगियों को अब तकलीफदेह कीमोथेरपी (Chemotherapy) से राहत मिल सकेगी. मरीजों को अब टेबलेट के रूप मे दवा दी जाएगी. कानपुर के मुरारी लाल चेस्ट अस्पताल और जेके कैंसर संस्थान के विशेषज्ञों ने मरीजों पर कीमो टैबलेट का ट्रायल शुरु कर दिया है. पहले चरण के नतीजे काफी अच्छे आए हैं. इसकी विस्तृत रिपोर्ट नवंबर मे जारी होगी. इसके बाद यह टैबलेट तकलीफदेह कीमोथेरपी के विकल्प के रूप में प्रयोग होने लगेगी. शोधकर्ता डाक्टर एवं चेस्ट अस्पताल के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. अवधेश कुमार और जेके कैंसर संस्थान के कैंसर रोग विशेषज्ञ डॉ जीतेन्द्र वर्मा का कहना है कि देश के चुनिंदा संस्थानों में कीमो टैबलेट का प्रयोग किया जा रहा है.

उन्होंने कहा कि कानपुर (Kanpur) के इन दोनों संस्थानों में हो रहे ट्रायल में सिर्फ यूपी के मरीजों को शामिल किया गया है. मरीजों के दो समूह बनाए गए हैं. एक मरीज जिन्हे इंजेक्शन से कीमोथेरपी हो रही हैं और दूसरे ऐसे मरीज हैं जिन्हे कीमो टैबलेट दी जा रही है. दोनों मरीजों में देखा जा रहा है कि कौन सा तरीका सुरक्षित आसान और कारगर है. डॉ जीतेन्द्र वर्मा के मुताबिक, कीमो टेबलेट सभी मरीजों के लिए उपयुक्त नहीं है. इसे विशेष जांच के बाद ही दिया जाता है.

टैबलेट जीवन भर चल सकता है
इंजेक्शन की अपैक्षा 250 मिलीग्राम की कीमो टैबलेट जीवन भर इंसान खा सकते हैं .या जब तक बीमारी है तब तक इंजेक्शन में एक दो कोर्स लगाने के बाद मरीजों की स्थिति आगे इंजेक्शन बर्दाश्त करने की नहीं रह जाती है.

ट्यूमर के विकास को रोक देती है
कीमो टैबलेट फेफड़ों में कैंसर कोशिकाओं के विकास को पूरी तरह रोक देती है. इसमें एपिडर्मल ग्रोथ फैक्टर नाम का एक प्रोटीन होता है जो कोशिकाओं का विकास करता है. यह शरीर में प्राकृतिक रूप से पाया जाता है, लेकिन ट्यूमर कोशिकाएं इस प्रोटीन के निर्माण को तेज कर देती है. इसके चलते ही नहीं ट्यूमर कोशिकाएं बनने लगती हैं और कैंसर फैलने लगता है. कीमो टैबलेट मे ईजीएफ और अन्य तत्व हैं. यह खून मे घुलते ही प्रतिरोधी तंत्र ईजीएफ के बढ़ते असर को रोकने के लिए एंटीबॉडीज बनाने लगता है. इससे ट्यूमर का विकास बंद हो जाता है. खास बात यह है कि यह सीधे ट्यूमर कोशिकाओं पर हमला नहीं करती है.

कीमो टैबलेट के साइड इफेक्ट कम
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कैंसर विशेषज्ञ डॉ जीतेन्द्र वर्मा के मुताबिक, फेफड़े के कैंसर से पीड़ित मरीजों के लिए परंपरागत कीमोथेरपी में साइडइफेक्ट अधिक है. एक तो 21 दिन पर इंजेक्शन लगाने की जरूरत पड़ती है. इस दौरान मरीज को तीन दिन भर्ती रखा जाता है. अगर एक बार दवा शुरु हो गई और कोई साइडइफेक्ट है तो उसका असर छह सप्ताह तक मरीज के शरीर मे रहता है. कीमोथेरपी से कैंसर सेल के साथ सामान्य कोशिकाएं भी जल जाती है. इससे बाल झड़ने लगते हैं. रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है और मरीज चिड़चिड़ और दुबला होने लगता है. कीमो टेबलेट में इन समस्याओं से बचा जा सकता है.

मुरारी लाल चेस्ट अस्पताल के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ अवधेश कुमार ने बताया कि फेफड़े के कैंसर के चार स्टेज होते हैं. शुरुआती दो स्टेज में इसकी पहचान नहीं हो पाती है. टीबी और लंग कैंसर के एक्सरे में धब्बे एक जैसे दिखते हैं. इस कारण अक्सर डॉक्टर शुरुआत में टीबी का इलाज करते रहते हैं. ऐसे में मरीज तीसरी और चौथी स्टेज मे इलाज के लिए पहुंचते हैं.

रिपोर्ट - अमित गंजू 

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First published: August 19, 2019, 1:27 PM IST
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