कानपुर : कोरोना से मौत के बाद जब घरवाले भी बरतते हैं दूरी, तो उन शवों का जिम्मा उठा लेते हैं धनीराम

बौद्ध घाट पर अंतिम संस्कार कराते धनीराम.

बौद्ध घाट पर अंतिम संस्कार कराते धनीराम.

समाजसेवी धनीराम बौद्ध घाटों में कोविड से मरनेवालों के शवों की चिताएं सजा रहे हैं. घाट पर वह यह सुनिश्चित करते हैं कि मृतक के धर्म के मुताबिक उनकी अत्येष्टि ससम्मान हो.

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कानपुर. कोविड महामारी (corona epidemic) के दौर में घरवाले भी शवों को छूने से परहेज कर रहे हैं. ऐसे में कानपुर (Kanpur) का एक शख्स मानवता की मिसाल कायम कर रहा है. समाजसेवी धनीराम (Dhaniram) बौद्ध घाट (bauddh Ghat) में कोविड से मरनेवालों के शवों की चिताएं सजा रहे हैं. घाट पर वह यह सुनिश्चित करते हैं कि मृतक के धर्म के मुताबिक उनकी अत्येष्टि ससम्मान हो. धनीराम वैसे तो कानपुर में लावारिस शवों का अंतिम संस्कार कराने का काम अपनी संस्था के जरिये पिछले कई वर्षों से लगातार कर रहे हैं. लेकिन कोविडकाल में कोरोना संक्रमितों के शवों का अंतिम संस्कार करवाना बड़ा जोखिम भरा काम है, जिसे वे जिम्मेदारी बखूबी उठा रहे हैं.

धनीराम की टीम कानपुर में कोविड से होने वाली मौतों के शवों का अंतिम संस्कार करा रही है. अस्पताल से घाट तक शवों को पहुंचाने की जिम्मेदारी भी उनकी टीम उठा रही है. पिछले कोविडकाल में भी ये जिम्मेदारी इन्होंने निभाई थी और इस बार भी ये जुटे हुए हैं.

भैरो घाट पर जल रहे शवों के सामने लाउडस्पीकर लिए हरे रंग का एप्रिन पहने और मास्क, कैप लगाए जो शख्स दिख रहा है, वह हैं धनीराम. वे पिछले कई दिनों से सुबह घाट पर आ जाते हैं और देर रात तक शवों के अंतिम संस्कार होने तक यहीं रहते हैं. अपनी जान की परवाह किए बिना धनीराम शवों के अंतिम संस्कार में जुटे रहते हैं. वैसे तो वे लावारिश शवों का अंतिम संस्कार कराने का काम वह वर्षों से कर रहे हैं, लेकिन इस कोरोनाकाल में जब कोविड से हुई मौतों पर परिजनों ने भी कतराना शुरू कर दिया, तो धनीराम ने खुद को इस मोर्चे पर लगा दिया.

वे समाज कल्याण सेवा समिति नाम की संस्था के सचिव हैं. वह 2008 से अब तक तकरीबन 14000 लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार करा चुके हैं. तकरीबन 400 ऐसे शवों का अंतिम संस्कार उन्होंने कराया, जिनके परिजन तो थे लेकिन उनके पास अंतिम संस्कार के लिए पैसे नहीं थे. अब इस कोरोनाकाल में उनकी संस्था ने एक नई भूमिका निभाई है. उन्होंने कहा कि अंतिम संस्कार कराने के लिए उन्हें समाज के लोगों और प्रशासन का सहयोग मिलता है. वह लोगों से कोई चंदा नहीं मांगते बल्कि लोगों से कफन के लिए कपड़ा और अर्थी के लिए बांस उपलब्ध कराने की अपील करते हैं.

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