Kanpur Encounter: यूपी में अपराधियों को सियासत का साथ, बेबात जान गंवाए खाकी!
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Kanpur Encounter: यूपी में अपराधियों को सियासत का साथ, बेबात जान गंवाए खाकी!
(फाइल फोटो)

कानपुर देहात (Kanpur Dehat) में बदमाशों से मुठभेड़ में 8 पुलिसकर्मियों के शहीद होने के मामले में जिस अपराधी विकास दुबे (Vikas Dubey) का नाम सामने आ रहा है वह यूपी में राजनीति व अपराध के नापाक गठजोड़ की एक और बानगी भर है.

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कानपुर. उत्तर प्रदेश के कानपुर देहात (Kanpur Dehat) में बदमाशों से मुठभेड़ में एक डीएसपी समेत 8 पुलिसकर्मियों के शहीद होने के मामले में जिस अपराधी विकास दुबे (Vikas Dubey) का नाम सामने आ रहा है वह यूपी में राजनीति व अपराध के नापाक गठजोड़ की एक और बानगी भर है. यह ऐसा मर्ज है जिसने गए करीब दो-ढाई दशक से यूपी की सियासत को लगातार अपनी चपेट में लेते रहना जारी रखा है. राजनेताओं के संरक्षण में फले-फूले मन बढ़ अपराधियों ने पहले भी पुलिस वालों को अपना निशाना बनाया है. अतीत में जब-जब ऐसा हुआ, खासा हो-हल्ला मचा कि हालात सुधारने होंगे, लेकिन हुआ कभी कुछ नहीं. नतीजतन कानपुर देहात का वाकया अगली कड़ी के रूप में सामने है.

दो दशक से आतंक फैला रखा था
विकास दुबे का ही मामला देखें तो यह गए करीब दो दशक से कानपुर देहात और आसपास के इलाकों में कानून को चुनौती देता रहा है. इसके खिलाफ साठ मुकदमे दर्ज हैं फिर भी बेखौफ होकर उसने अपने गिरोह के साथ मिलकर आठ पुलिस वालों को गोलियों से भून दिया. जानकारों का कहना है कि इस दु:स्साहस के पीछे राजनेताओं, जिनमें कई सत्तारूढ़ पाले के भी हैं, का संरक्षण ही सबसे बड़ी वजह है.

ये भी बताया जाता है कि जिस मामले में उसे गिरफ्तार करने पुलिस जा रही थी उसमें पर्दे के पीछे कुछ राजनेता यह सुनिश्चित कर रहे थे कि सम्मानजनक तरीके से आत्मसमर्पण हो जाए. इधर पुलिस वाले दलबल के साथ उसके गांव पहुंचे लेकिन शातिर विकास को इसकी भनक थी लिहाजा उसने रास्ते पर व्यवधान लगवाकर पुलिस टीम को रुकने पर मजबूर किया और छतों पर पहले से मौजूद उसके लोगों ने पुलिस वालों पर गोलियों की बौछार कर दी.
मथुरा जवाहर बाग में एसपी सिटी की हत्या हुई थी


अपराधियों को नेताओं के संरक्षण व उस संरक्षण के जरिए खुद बाहुबलियों का राजनेता बन जाने के कई उदाहरण उत्तर प्रदेश में हैं और ऐसे मामलों में पुलिस वालों की पहली भी शहादत हो चुकी है. मथुरा के जवाहरबाग पर वर्षों से कब्जा जमाए बैठे रामवृक्ष यादव को भी राजनेताओं व सत्ता के करीबी लोगों के संरक्षण का ही गुमान था कि बाग को खाली करवाने पहुंची पुलिस टीम पर उसने हमला कर दिया था जिसमें मथुरा के एसपी सिटी मुकुल द्विवेदी व एक थानाध्यक्ष संतोष यादव की मौत हो गई थी.

कई पुलिस वाले घायल हुए थे. बाद में पुलिस से मुठभेड़ में रामवृक्ष भी मारा गया था. कानपुर के विकास दुबे की ही तरह नब्बे के दशक में राजनीतिज्ञों के संरक्षण में उभर कर दुर्दांत अपराधी बने श्रीप्रकाश शुक्ला ने लखनऊ में एक सब इंस्पेक्टर की गोली मारकर हत्या कर दी थी. यह वह दौर था जब श्रीप्रकाश से नज़दीकियों के लिए राजनेताओं का एक तबका लालायित रहता था. श्रीप्रकाश पुलिस से एनकाउंटर में मारा गया.

पुलिस की क्या है रणनीति
कानपुर देहात का वाकया हो या जवाहरबाग या श्रीप्रकाश शुक्ला का, इनमें यह भी दिखता रहा है कि पुलिस ने भी तभी पूरे जोरशोर से पलटवार किया जब अपराधी ने पुलिस को ही निशाना बना दिया. नि:संदेह प्रत्येक पुलिस वाले की जान अनमोल है और किसी की भी शहादत बेहद अफसोसनाक, लेकिन यूपी में अपराधियों का खौफ आम लोगों पर चलना जारी रहता है, इसपर निर्णायक लगाम लगाने को पुलिस तभी तत्पर होती है जब अपराधी पुलिस पर ही हमलावर हो जाता है. राजनेताओं के दवाब में शायद पुलिस की यह मजबूरी होती हो या कई मामलों में खुद ही नजरअंदाज करने की प्रवृत्ति भी ऐसे अपराधियों का हौसला बढ़ाती रही है.

मसलन एक जमाने में बुंदेलखंड की राजनीति में भरपर दखल रखने वाला दुर्दांत डकैत ददुआ. यह दस्यु भी राजनेताओं के संरक्षण में ही लगातार ताकतवर बनता चला गया. इस हद तक कि कुछ राजनेनेताओं की ही आंखों का किरकिरी बन गया. पुलिस से एनकाउंटर में ददुआ के मारे जाने के बाद जब यूपी पुलिस की स्पेशल टास्क फोर्स के सदस्य जंगल के रास्ते लौट रहे थे तो इलाके के एक और कुख्यात डकैत ठोकिया ने एसटीएफ की गाड़ी पर हमला कर एसटीएफ के आधा दर्जन सदस्यों को मार डाला था. ददुआ की तरह ठोकिया भी राजनीतिज्ञों के संरक्षण में लगातार ताकत पाता रहा.

प्रतापगढ़ में डिप्टी एसपी की हत्या हुई थी
राजनीति में सक्रिय इलाकाई बाहुबलियों से संरक्षण पाकर बेखौफ बने अपराधियों के हौसले का ही नतीजा था कि प्रतापगढ़ के कुंडा में साल 2013 में एक डिप्टी एसपी जियाउल हक की हत्या कर दी गई थी. हत्या भीड़ ने की थी, लेकिन इलाके के जानकारों का मानना है कि भीड़ को उकसाने के पीछे इलाके में राजनीति और अपराध का गठबंधन ही काम कर रहा था. ऐसे ही एक वाकए में साल 2018 में बुलंदशहर में एक इंस्पेक्टर सुबोध सिंह को भी जान गंवानी पड़ी थी.
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