बेटी ने जीती ब्लड कैंसर से जंग, अब परिवार ने छेड़ी ऐसे मरीजों को बचाने की मुहिम

मृतक के परिजनों की संवेदनाएं देखीं और दहाड़े मार-मार कर उन्‍हें रोते हुए भी देखा. अब बेटी के स्वस्थ होने के बाद पूरा परिवार जरूरतमंदों को ब्लड मुहैया कराता है.

मृतक के परिजनों की संवेदनाएं देखीं और दहाड़े मार-मार कर उन्‍हें रोते हुए भी देखा. अब बेटी के स्वस्थ होने के बाद पूरा परिवार जरूरतमंदों को ब्लड मुहैया कराता है.

मृतक के परिजनों की संवेदनाएं देखीं और दहाड़े मार-मार कर उन्‍हें रोते हुए भी देखा. अब बेटी के स्वस्थ होने के बाद पूरा परिवार जरूरतमंदों को ब्लड मुहैया कराता है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: July 16, 2018, 12:02 PM IST
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एक पिता ने बेटी को घुट-घुट कर जीते हुए देखा था. हालांकि पांच साल तक लखनऊ के पीजीआई में बेटी ने इलाज के दौरान ब्लड कैंसर से जंग जीत ली. इस जीत ने इस परिवार का जीवन बदल दिया है और अब वे दूसरे पीड़ि‍तों का जीवन बदलने में जुट गए हैं. परिवार ने अस्पताल में आए दिन लोगों को कैंसर के कारण दम तोड़ते हुए देखा. इन लोगों ने मृतक के परिजनों की संवेदनाएं देखीं और दहाड़ मार-मार कर रोते हुए देखा. इसे देखते हुए अब पूरा परिवार जरूरत मंदों को ब्लड मुहैया कराता है. अब तक हजारों जरूरत मंदों को ब्लड उपलब्‍ध कराकर ये परिवार कई लोगों की जान बचा चुके हैं. कानपुर के बर्रा थाना क्षेत्र स्थित बर्रा छह में रहने वाले संतोष सिंह चौहान खुद अबतक 400 लोगों को अपना खून दे चुके हैं.



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बेटी को था ब्लड कैंसर





संतोष सिंह चौहान अपनी पत्नी शैलजा, बेटे प्रबल (16) और बेटी राधा (15) के साथ बर्रा-6 इलाके में रहते हैं. पेशे से निजी कंपनी की रिकवरी एजेंसी चलाने वाले संतोष की जिंदगी में एक ऐसा दिन आया, जिससे उनके परिवार में मायूसी छा गई. संतोष ने न्यूज18 से बातचीत में बताया कि बेटी को बार-बार फीवर आता था. टेस्ट करवाया तो पता चला की बेटी को रीढ़ की हड्डी में ब्लड कैंसर है. साल 2011 केे जून महीने में हम अपनी पत्नी के साथ बेटी का इलाज कराने पीजीआई लखनऊ आ गए. जहां हमने चार साल तक पीजीआई के बाहर लाॅज में कमरा लेकर इलाज करवाया.
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ब्लड डोनेट करते संतोष[
मौत को किया महसूस



बेटी के इलाज के दौरान हमने देखा कि ब्लड नहीं मिल पाने के कारण कई लोगों की जान चली गई, क्योकि ब्लड कैंसर के दौरान सबसे ज्यादा ब्लड और प्लेटलेट्स की जरूरत पड़ती है. बकौल संतोष, एक मरीज को कम से कम 50 यूनिट तक ब्लड लग जाता है. उन्होंने बताया कि पीजीआई में हमने परिजनों की भावनात्मक संवेदनाओं को देखा और उनके दुःख को समझा है. लोगों को खून के लिए इधर-उधर भटकते हुए देखा है. मैंने इस बात की शपथ ली थी कि बेटी ठीक हो जाएगी तो जरूरत मंदों को ब्लड मुहैया कराएंगे. अपना पूरा जीवन दूसरों की मदद के लिए लगा देंगे.



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खुद डोनेट किया 400 लोगों को ब्लड



2015 में हम बेटी का आखिरी बोन मैरो टेस्ट करवाया. जहां रिपोर्ट पॉजिटिव आने के बाद हम दिसंबर महीने में संकल्प सेवा समिति की स्थापना करके एक मिशन के तहत खून देने के काम में जुट गए. इसके बाद हम जरूरतमंदों को ब्लड मुहैया कराने लगे. अभी तक 400 लोगों को खून देने वाले संतोष की आंखें ये सब बताते हुए नम हो जाती हैं. उन्होंने बताया कि बेटी की किस्मत अच्छी थी, जहां भी मैंने इलाज के पैसों की मांग की, पैसे मिलते चले गए. प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री कार्यालय से भी इलाज के लिए रुपए मिल गए. मुझे भी इस बात की जिद थी कि मैं अपनी बेटी को बचा कर रहूंगा. इसलिए हमारा आज एक ही मकसद है गरीबों और जरूरतमंदों को ब्लड मुहैया कराना.



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परिवार समेत 24 घंटे गरीबों की सेवा में खड़े रहने वाला यह परिवार आज कानपुर के लोगों के लिए मसीहा बन गया है. संतोष बताते हैं कि हमारे ब्लड कैम्प में बड़ी संख्या में लोग आते हैं और यहां मेडिकल टीम की निगरानी में ब्लड डोनेट करने का काम होता है, ताकि कभी कोई शिकायत का मौका ना मिले. AB निगेटिव ब्लड बैंकों में बहुत कम मिलता है. इसलिए हमारे पास 5-6 ऐसे डोनर हैं जिनको हम रिजर्व रखते हैं.



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पीएम मोदी और सीएम योगी से गुहार लगाते हुए संतोष चौहान ने कहा कि मेरी एक ही मांग है कि कैंसर के मरीजों का इलाज सरकार को बिल्कुल फ्री कर देना चाहिए, जिससे रुपये के अभाव में किसी भी मरीज की मौत ना हो. खुद संतोष ने अपनी बेटी के इलाज में 40 लाख रुपये खर्च किए हैं. ब्लड कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जंग जीतने वाला चौहान परिवार दावे के साथ कहता है कि 24 घंटे में किसी वक्त भी अगर मुझसे मदद मांगी जाती है तो मैं उसकी हर संभव मदद करूंगा.



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